समाज का शिक्षा के प्रति क्या दायित्व है? आप शिक्षा के क्षेत्र में गैर-सरकारी प्रयासों को कैसे देखते हैं?
हमारा देश युवाओं का है। शिक्षा के क्षेत्र में गैर-सरकारी और निजी क्षेत्र का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। उच्च माध्यमिक या महाविद्यालय या विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी महत्वपूर्ण है। यह देश की आवश्यकता भी है। शिक्षा में 1991 में निजी क्षेत्र का प्रवेश हुआ, जब उदारीकरण की नीति लागू हुई। पूरे भारत में अलग-अलग संगठनों और अलग-अलग विचारधाराओं से प्रेरित संस्थानों के विद्यालय संचालित हैं। इसे शिक्षा का व्यवसायीकरण कहना उचित नहीं होगा। मुझे लगता है कि शिक्षित भारत, मजबूत भारत, विकसित भारत के लिए सबसे बड़ा पायदान और सबसे आधारभूत जिम्मेदारी शिक्षण संस्थानों की है। शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वह युवा पीढ़ी को विकास करने का अवसर दें ताकि विकसित भारत के संकल्प को देश पूरा कर सके।
क्या आपको लगता है कि आज भी देश के सामने चुनौती है, छात्रों को शिक्षित करने और उन छात्रों को रोजगार मुहैया करवाने की?
हमारे समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। विशेषकर उच्च शिक्षा के प्रति छात्रों में रुझान बढ़ा है। आज की तारीख में छात्रों को रोजगार देने के बजाय हम नए रोजगार के सृजन को अधिक प्राथमिकता देते हैं। हम नौकरी की तलाश के बजाय, खुद ही नौकरी का सृजन करने पर जोर दे रहे हैं। इसे युवाओं को भी समझना होगा।
हम स्टार्टअप और एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा दे रहे हैं। आज देश में दो लाख से अधिक स्टार्टअप का पंजीकरण हो चुका है। सरकार की ओर से इन एमएसएमई को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है। हमारे कुछ युवा एक ओर स्काई रुट कंपनी के रूप में राॅकेट को लांच कर रहे हैं तो दूसरी ओर कुछ दिग्भ्रमित भी हो रहे हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थानों और माता-पिता की जिम्मेदारी बढ़ गई है। इस बात को युवाओं को बताने और समझाने की आवश्यकता है।
क्या निजी या गैर-सरकारी संस्थान शिक्षा के उद्धारक हैं?
अक्सर, गैर-सरकारी और निजी क्षेत्र की भागीदारी, उनकी गुणवत्ता, उनकी महंगी व्यवस्था को लेकर प्रश्न उठाए जाते हैं। मेरा मानना है कि सरकारी विश्वविद्यालयों की अपेक्षा गैर-सरकारी विश्वविद्यालय सस्ते हैं। आईआईटी या एमआईटी की पढ़ाई का खर्च बहुत अधिक है। वहां दाखिला पाना भी कठिन है। यह भी महत्वपूर्ण है कि निजी संस्थानों के शिक्षकों का वेतन सरकारी शिक्षकों से कम होता है। लेकिन, उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता एवं उत्पादकता अधिक है। वैश्विक स्तर पर गैर-सरकारी संस्थाओं ने अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता को स्थापित किया है।
सरकारी संस्थान हों या गैर-सरकारी संस्थान सभी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की नैतिक जिम्मेदारी है कि हम छात्रों को देश का जिम्मेदार नागरिक बनाएं। हमारा लक्ष्य होना चाहिए है कि हमारी भावी पीढ़ी में राष्ट्र प्रथम की भावना हो। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब राष्ट्र प्रथम और युवाओं के जीवन का लक्ष्य एक-दूसरे के पूरक होंगे।

















