ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स राजनीति के जरिए संगठित की गई सामूहिक हिंसा का एक बड़ा उदाहरण माना जाता है। इन हत्याओं ने 1945 से 1947 के बीच हुए विभाजन के दंगों के एक लंबे और हिंसक दौर की शुरुआत कर दी थी। यह हिंसा धीरे-धीरे इतनी बढ़ी कि आखिरकार देश के क्षेत्रीय विभाजन की मांग को मजबूती मिली।
मई 1946 में आई कैबिनेट मिशन योजना में पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे मनाने का फैसला किया। यही फैसला कलकत्ता में होने वाली हिंसा का सबसे बड़ा तात्कालिक कारण बना। 16 अगस्त से 19 अगस्त 1946 के बीच कलकत्ता में जो भयानक हिंसा हुई, उसने पूरे शहर को हिला दिया। इस घटना का भारत में ब्रिटिश शासन के अंत और देश के विभाजन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान है।
कलकत्ता में जो कुछ हुआ, उसे केवल हिंदू-मुस्लिम दंगे कहकर समझना काफी नहीं होगा। इसके पीछे उस समय की राजनीति, अलग-अलग राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष, मंत्रालयों की भूमिका, चुनावी राजनीति और केंद्र तथा प्रांतों के बीच मौजूद राजनीतिक असमानताएं भी जुड़ी हुई थीं। हिंसा के दौरान लोगों की हत्या, संपत्तियों की लूट, आगजनी और लोगों को उनके घरों से निकालना इसके प्रमुख तरीके बन गए। इस अर्थ में कलकत्ता आने वाले समय में होने वाले विभाजन के दंगों की एक तरह की तस्वीर बन गया था।
कैबिनेट मिशन और पाकिस्तान की मांग
कैबिनेट मिशन भारत में कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक समझौता कराने के उद्देश्य से आया था। 16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन ने अपनी योजना सामने रखी। इस योजना में मुस्लिम लीग की सबसे महत्वपूर्ण मांग—एक अलग और पूरी तरह स्वतंत्र पाकिस्तान—को स्वीकार नहीं किया गया। यह फैसला मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए बड़ा राजनीतिक झटका था। लीग के लिए यह केवल एक मांग के खारिज होने की बात नहीं थी, बल्कि उसके राजनीतिक भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल बन गया था। इसी के बाद 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग की काउंसिल ने डायरेक्ट एक्शन डे मनाने का फैसला किया। इसके तहत देशभर में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई गई। कलकत्ता को इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बनाया गया।
कलकत्ता को ही इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया?
इसका एक कारण यह था कि उस समय कलकत्ता भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और व्यापारिक शहरों में से एक था। बंदरगाह, व्यापार, उद्योग और आर्थिक गतिविधियों के कारण इसका बहुत बड़ा महत्व था। जिन्ना और मुस्लिम लीग के लिए पूरे बंगाल पर राजनीतिक नियंत्रण और कलकत्ता पर पकड़ दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण थे।
1946 में बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और हुसैन सुहरावर्दी बंगाल के प्रीमियर थे। उस समय बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था पर मुस्लिम लीग का प्रभाव था। इसी दौरान बंगाल पहले से ही कई गंभीर समस्याओं से गुजर रहा था। 1943 के भयानक अकाल का असर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। युद्ध के वर्षों की महंगाई, आर्थिक संकट और युद्ध के बाद रोजगार तथा श्रम व्यवस्था में आए बदलावों ने भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। इन आर्थिक और सामाजिक परेशानियों के साथ-साथ राजनीतिक और साम्प्रदायिक तनाव भी लगातार बढ़ रहा था।
मुस्लिम लीग ने किया था डायरेक्ट एक्शन डे
मुस्लिम लीग की ओर से डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा के बाद माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। जिन्ना का यह बयान कि अब संवैधानिक तरीकों को छोड़कर सीधी कार्रवाई की जाएगी, आने वाली घटनाओं का संकेत माना गया।
16 अगस्त की तारीख क्यों चुनी गई?
इसके पीछे के कारण पूर्णत: सांप्रदायिक था। 16 अगस्त 1946 की तारीख भी मजहबी संदर्भों को ध्यान में रखकर चुनी गई थी। यह तारीख 1365 हिजरी के रमज़ान महीने में 18वें दिन पड़ रही थी और शुक्रवार का दिन था। इसी दिन मक्का फतेह करने के लिए काफिरों का नरसंहार हुवा था। इसे पाकिस्तान के लिए संघर्ष के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। 16 अगस्त को बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार ने सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। इसके कारण बड़ी संख्या में लोगों के सड़कों पर आने की संभावना बढ़ गई। कलकत्ता में डायरेक्ट एक्शन डे की तैयारियां पहले से ही शुरू हो चुकी थीं। कई मुस्लिम संगठनों, छात्रों और व्यापारिक समूहों को इसमें शामिल किया गया। उस समय के कलकत्ता के मेयर एस. एम. उस्मान पर भी उत्तेजक पर्चे बांटने के आरोप लगाए गए।
जिसमें लिखा था, “यही वह पवित्र महीना है जब इस्लाम और काफिरों के बीच पहला युद्ध शुरू हुआ। इसी रमजान महीने में हमने मक्का फतेह कर ली और मूर्तिपूजकों को खदेड़ दिया। इस्लाम की स्थापना इसी रमजान महीने में हुई। अल्लाह की मर्जी के अनुसार, ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के लिए रमजान के महीने में जिहाद का नारा दिया।”
मुसलमानों की दुकानों पर निशान लगाए गए ताकि उन्हें लूटपाट से बचाया जा सके और मुस्लिम लीग की सरकार ने लीग के कार्यकर्ताओं को पेट्रोल और केरोसिन की सप्लाई की। मस्जिदों में लगातार बैठकें होती रहीं और ज़्यादातर पुलिस स्टेशनों में अहम पदों से हिंदू पुलिस अधिकारियों को सुनियोजित तरीके से हटा दिया गया। “डायरेक्ट एक्शन डे” का मकसद पाकिस्तान को एक अलग देश के तौर पर हासिल करने के साथ-साथ कलकत्ता को पाकिस्तान में शामिल करना और शहर की जनसांख्यिकी बदलना था।
16 अगस्त 1946: कलकत्ता में हिंसा की शुरुआत
कलकत्ता में तैनात ब्रिटिश अधिकारी मेजर एल. ए. लिवरमोर ने अपनी डायरी में 16 अगस्त की सुबह के माहौल को असामान्य शांति के रूप में दर्ज किया था। वातावरण में एक अजीब तरह की खामोशी थी, जबकि शहर में तनाव पहले से मौजूद था।
16 अगस्त से पहले के लगभग दो हफ्तों में कई पर्चे और अखबारों के संपादकीय प्रकाशित हुए थे। इनमें राजनीतिक संघर्ष को मजहबी भाषा में पेश किया जा रहा था। लोगों को अस्तित्व, सम्मान और मजहब के नाम पर जिहाद के लिए तयार किया जा रहा था। इसी वजह से शहर का माहौल धीरे-धीरे बेहद तनावपूर्ण हो गया।
सुहरावर्दी और ख्वाजा नाज़िमुद्दीन के बुलावे पर शहीद मीनार पर तलवारों, धारदार हथियारों और दंगा भड़काने के लिए ज़रूरी दूसरी चीज़ों के साथ मुस्लिम भीड़ के जमा हुई। तत्कालीन रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 5 लाख के करीब भीड़ इकट्ठा हुई। ‘हाथ में बीड़ी मुह में पान, लढ़ कर लेंगे पाकिस्तान’, ‘अल्लाह हु अकबर’ जैसे नारों से भीड़ उत्तेजित हो गई। हिंदू बहुल इलाकों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। दुकानों में तोड़फोड़ की गई, सामान लूटा गया और कई जगहों पर आग लगा दी गई। इसके बाद हिंसा ने और अधिक गंभीर रूप ले लिया।
हिंसा का फैलाव
हिंसा केवल एक-दो इलाकों तक सीमित नहीं रही। कलकत्ता के कई हिस्सों में हिन्दुओं की हत्या, लूटपाट और आगजनी होने लगी। हिन्दू धार्मिक स्थलों और प्रतीकों को भी नुकसान पहुंचाया गया। मंदिरों के पुरोहित, पंडितों को जलाया गया। सभी आयु की हिन्दू महिलाओं के साथ अत्याचार किए गए। कई लोगों के शव चौराहे पर लटकाए गए।
कलकत्ता म्युनिसिपल गॅजेट (24 अगस्त, 1946) के अनुसार, कलकत्ता और हावड़ा की सड़कों से 3,468 लाशें बरामद की गई थीं। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी इसलिए मृतकों के आकड़े दबाए गए, लेकिन अख़बारों की रिपोर्ट बताती है कि स्ट्रैंड रोड की गलियाँ खून-खराबे से भरी हुई थीं और हावड़ा ब्रिज के नीचे सड़कों पर लाशों के ढेर लगे हुए थे। विभिन्न स्रोतों द्वारा अनुमानित मृतकों के आकड़े लगभग दस हजार बताए जाते है। कलकत्ता के कई हिंदू घरों और संपत्तियों को लूटा गया। प्रसिद्ध चिकित्सक और बाद में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने डॉ. बिधान चंद्र रॉय का घर भी हिंसा से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सका।
सुहरावर्दी और पुलिस की भूमिका
हुसैन सुहरावर्दी की भूमिका को लेकर सबसे गंभीर आरोप सामने आए। वह खुद लालबाजार पुलिस मुख्यालय में मौजूद थे। पुलिस को हिंसा रोकने के लिए प्रभावी तरीके से काम करने से रोका गया। इसके कारण कई इलाकों में मुस्लिम लीग की दंगाई भीड़ को खुली छूट मिल गई और हिंसा तेजी से फैलती चली गई। इसी वजह से सुहरावर्दी को बाद में उनके आलोचकों द्वारा ‘कलकत्ता का कसाई’ कहा गया।
गवर्नर [फ्रेडरिक] बरोज़ के अनुसार, “उन्होंने सुहरावर्दी को यह समझाने की कोशिश की कि स्थिति बहुत चिंताजनक है, लेकिन सुहरावर्दी ने कोई कार्रवाई नहीं की।” बेलगाछिया, शोवाबाज़ार, बोउबाज़ार, कॉलेज स्ट्रीट, सियालदह, मेचुआ बाज़ार, माणिकतला, एंटाली, राजाबाज़ार, पार्क सर्कस, ज़कारिया स्ट्रीट, मेटियाब्रुज़, स्ट्रैंड रोड और खिदिरपुर जैसे इलाके हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल थे।
हिंदुओं का जवाबी प्रतिरोध
हिंसा बढ़ने के बाद हिंदू समुदाय भी संगठित होकर जवाब देने लगा। इस प्रतिरोध से जुड़े प्रमुख नामों में गोपाल मुखर्जी, जिन्हें ‘गोपाल पाँठा’ के नाम से जाना जाता था, का नाम सामने आता है। गोपाल मुखर्जी बाउबाजार में मांस की दुकान चलाते थे। उन्होंने स्थानीय हिंदू युवाओं को संगठित किया और हिंसा का सामना करने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध शुरू किया। 17 अगस्त 1946 से भवानीपुर में रहने वाले बिहारी और सिख समुदाय के लोगों ने भी अपने इलाकों की रक्षा के लिए जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद उत्तरी कलकत्ता के कांकुड़गाछी, बुर्रा बाजार और श्यामबाजार जैसे इलाकों में भी हिंसक जवाबी हमले शुरू हुए। धीरे-धीरे हिंदू समुदाय का प्रतिरोध पूरे शहर के कई हिस्सों में फैल गया। जब मुस्लिम पक्ष को भी भारी नुकसान होने लगा, तब सुहरावर्दी ने पुलिस को स्थिति पर नियंत्रण करने के निर्देश दिए।
बदरुद्दीन अहमद ने अपनी किताब ‘स्वाधीनता संग्रामेर नेपथ्य कहानी’ में बताया है कि अविभाजित बंगाल के मुस्लिम लीग अध्यक्ष ख्वाजा नज़ीमुद्दीन ने घोषणा की थी:
“हमारी लड़ाई अंग्रेजों के खिलाफ नहीं, बल्कि हिंदुओं के खिलाफ है।”
निर्मल कुमार बोस ने अपनी किताब ‘माई डेज़ विद गांधी’ में लिखा है: “हमला मुस्लिम भीड़ की तरफ से शुरू हुआ; लेकिन कुछ ही घंटों में हिंदुओं ने भी जवाबी हमला किया।”
चार दिनों तक चलता रहा खूनी संघर्ष
16 अगस्त से 19 अगस्त 1946 तक कलकत्ता में हिंसा का भयानक दौर चला। उस समय के अखबारों ने इस हिंसा को प्रमुखता से प्रकाशित किया। द स्टेट्समैन, हिंदुस्तान स्टैंडर्ड, अमृत बाजार पत्रिका और स्टार ऑफ इंडिया जैसे अखबारों में कलकत्ता की स्थिति की विस्तृत खबरें प्रकाशित हुईं।
20 अगस्त 1946 को हिंदुस्तान स्टैंडर्ड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की हत्या की गई और हिंसा के दौरान बेहद क्रूर दृश्य देखने को मिले।“
लंदन टाइम्स ने कहा कि लीग सरकार ने हिंदुओं की जान-माल की सुरक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाए। सार्वजनिक अवकाश की घोषणा, उकसावे और पुलिस की मिलीभगत के आरोपों पर ज़ोर दिया गया।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की चिंता
विधानसभा में बहस के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लीग सरकार पर कड़ा आरोप लगाया कि उसने कुछ दिनों के लिए शहर को गुंडों के हवाले कर दिया और लोगों की जान से खिलवाड़ किया। यह सुनकर सुहरावर्दी ने श्यामा प्रसाद को ही गुंडा कहा। श्यामा प्रसाद ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा, “मैं गुंडा हो सकता हूँ, लेकिन तुम गुंडों के सरगना हो।”
20 सितंबर 1946 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्हें डर था कि डायरेक्ट एक्शन डे के बाद भी हिंसा का सिलसिला खत्म नहीं होगा। उनकी आशंका सही साबित हुई। कलकत्ता की हिंसा के कुछ ही समय बाद बंगाल के नोआखाली में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई। इसके बाद बिहार और फिर पंजाब सहित दूसरे इलाकों में भी हिंदू-मुस्लिम हिंसा का दौर शुरू हुआ।
मुस्लिम लीग द्वारा कराए गए इन सांप्रदायिक दंगों ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिंदू, मुस्लिम लीग सरकार के अधीन बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं रह सकते। इन दंगों ने उनके काम करने के तरीके की सच्चाई को सबके सामने ला दिया।
ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स का ऐतिहासिक महत्व
ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स को केवल चार दिनों तक चले एक साम्प्रदायिक दंगे के रूप में देखना इस घटना के राजनीतिक और ऐतिहासिक महत्व को सीमित कर देता है। कलकत्ता की हिंसा यह दिखाती है कि ब्रिटिश शासन से सत्ता का हस्तांतरण कोई शांतिपूर्ण और सीधी राजनीतिक प्रक्रिया नहीं थी।
डायरेक्ट एक्शन डे केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। इसके जरिए मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को लेकर अपनी शक्ति और राजनीतिक दबाव दिखाने की कोशिश की।
‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ कोई बीता हुआ अध्याय नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े विस्थापनों में से एक का अहम हिस्सा होने के नाते ऐतिहासिक पड़ताल का एक लगातार चलने वाला विषय है, जिसमें 1.5 करोड़ से ज़्यादा लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ा था; साथ ही, यह हमारे देश को बांटने वाली ताकतों के प्रति हमेशा सावधान रहने का एक दर्दनाक, लेकिन सच्चा सबक भी है। भारत के असली इतिहास को सामने लाने की ज़रूरत है।













