यह प्रसिद्ध श्लोक संस्कृत साहित्य के नैतिक एवं देशप्रेम से जुड़े सुभाषितों (नीति-श्लोकों) में से एक है।
श्लोक-
विपद्ग्रस्तस्य देशस्य ये न यान्ति सहायताम्।
ते नराऽपसदास्ते हि न संमान्याः कदाचन॥
भावार्थ-
जो लोग विपत्तिग्रस्त अपने देश की सहायता सामर्थ्य होने पर भी नहीं करते हैं, वे लोग नीच हैं। उनको किसी प्रकार सम्मानित नहीं करना चाहिए।
आज के समय में प्रासंगिकता- नागरिक कर्तव्य और राष्ट्र-प्रथम की भावना: आज जब कोई देश प्राकृतिक आपदा (बाढ़, भूकंप, महामारी) या आर्थिक-सामाजिक संकट से जूझता है, तब केवल सरकार पर निर्भर रहने के बजाय नागरिकों का आगे आना आवश्यक होता है। यह श्लोक सिखाता है कि संकट के समय देश की सेवा से पीछे हटना अनैतिक है।
सक्रिय योगदान की आवश्यकता: समर्थ (सक्षम) नागरिकों का दायित्व है कि वे अपने देश को संकट से उबारने में आर्थिक, बौद्धिक या शारीरिक योगदान दें। केवल दर्शक बने रहना या उदासीन रहना देशभक्ति नहीं है।

















