Kathmandu में Gen Z आंदोलन के बाद एक बार फिर राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। राजधानी के पूर्व मेयर बालेन्द्र शाह या बालेन शाह की अगुआई में बनी केबिनेट ने पहले ही दिन कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। दूसरी तरफ पूर्व प्रधानमंत्री केपीएस शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखाक को गिरफ्तार करके जांच शुरू कर दी गई है, अदालत ने फिलहाल उन्हें 5 दिन के रिमांड पर भेजा है। साथ ही, सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा, पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड और पूर्व मंत्रियों आरजू राणा देउबा और दीपक खड़का के खिलाफ मनी लॉड्रिंग के आरोपों की जांच शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री बालेन तेजी से काम करने की छवि बनाते दिख रहे हैं। उनके नेतृत्व वाली नई सरकार ने एक महत्वाकांक्षी 100-सूत्री एजेंडा सामने रखा है। यह एजेंडा बालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के चुनावी घोषणा पत्र से मेल खाता है। इसमें समयबद्ध सुधारों, सेवा वितरण में सुधार और जन शिकायतों के समाधान पर खास जोर दिया गया है। वर्तमान परिस्थितियों के बीच अहम सवाल है कि क्या नेपाल की जड़ बना दी गई नौकरशाही इस एजेंडे पर फौरन काम शुरू कर पाएगी?
चुनावी पृष्ठभूमि और एजेंडा
आरएसपी ने चुनाव से पहले ऐसे 100 कामों की एक सूची जारी की थी, जो देश में तत्काल प्रभाव से किए जाने हैं। गत 5 मार्च को हुए संसदीय चुनावों में पार्टी ने प्रतिनिधि सभा में 182 सीटें जीतीं और यह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सरकार गठन के बाद पहली कैबिनेट बैठक में यह एजेंडा पारित किया गया। इसमें 15 से 100 दिन के बीच अनेक लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इसमें जिम्मेदार अधिकारियों के नाम, मापने योग्य संकेत और प्रधानमंत्री कार्यालय को नियमित रिपोर्टिंग का प्रावधान है। योजना में सभी दलों से ‘राष्ट्रीय प्रतिबद्धता’ से काम करने, एक सप्ताह में संवैधानिक संशोधन पर चर्चा पत्र तैयार करने जैसे कदम भी हैं। मुख्य ध्यान सेवा प्रबंधन में सुधार और आम जनता की समस्याओं को दूर करने पर है।

पिछली सरकारों से फर्क
हालांकि कागजों पर तो यह एजेंडा बहुत दमदार लगता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि नेपाल में योजनाओं की तो कमी कभी नहीं रही। सल समस्या तो संसाधनों की कमी, कानूनी बाधाएं और नौकरशाही का सुस्त रवैया है। पूर्व सचिव कृष्णा ज्ञवाली कहते हैं, “पिछली सरकारें ऊपर से आदेश जारी करती रहीं, लेकिन निगरानी की कमी, सिविल सेवा में इच्छा की कमी और समन्वय न होने से उन पर अमल न हो सका।” फिर भी, वे मानते हैं कि शाह सरकार इस ओर अधिक गंभीर लगती है।
नई कानून मंत्री सोबीता गौतम का कहना है कि यह एजेंडा चुनावी वादों का प्रतिबिंब ही है। आखिरी फैसला तो जनता ही करेगी, इसलिए सरकार अपेक्षाओं पर खरी उतरने को प्रतिबद्ध है। कल उन्होंने अपने मंत्रालय के अधिकारियों से चर्चा की, जो समन्वय के लिए तैयार हैं। कानूनी बाधाओं पर कानून मंत्रालय कार्रवाई करने की बात कर रहा है।

नौकरशाही, संसाधन और केंद्रीकरण
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि समयबद्ध एजेंडे की सफलता राजनीतिक और प्रशासनिक सामंजस्य पर निर्भर करेगी। नौकरशाही का विश्वास जीतना और संवाद बनाए रखना जरूरी है, वरना योजना घोषणा मात्र रह जाएगी। पूर्व प्रशासनिक सुधार निगरानी समिति के अध्यक्ष काशी राज दहाल कहते हैं कि 15 दिन जैसी छोटी समय सीमाएं योजना की व्यावहारिकता पर सवाल उठाती हैं। डिजिटल सेवाएं बढ़ाना, रोजगार सृजन, स्वास्थ्य सुधार और बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए फंडिंग और क्षमता चाहिए।
लेकिन दहाल मानते हैं कि एजेंडा सकारात्मक है। वे सरकार के ‘घर की देहरी पर सेवा देने’ की सोच की सराहना करते हैं। पहले सरकारें स्पष्ट समय सीमाएं नहीं देती थीं, जिससे आदेश अमल में नहीं आते थे। नौकरशाही का राजनीतिकरण भी एक बड़ी बाधा था, लेकिन अब इसे उलटा जा सकता है। हालांकि, कृष्णा ज्ञवाली ज्यादा सतर्क हैं, लेकिन आशावादी हैं। वे मानते हैं, केंद्रीकरण से निर्णय प्रक्रिया धीमी हो सकती है। मंत्रालयों और स्थानीय सरकारों को सशक्त नहीं किया गया तो बाधाएं आएंगी। कठोर समय सीमाएं अगर तैयारी के बिना तय की गई हैं, तो यह बस एक सही सोच मात्र साबित हो सकती है।
प्रत्यक्षत: तो लगता है कि सरकार ने शुरुआती गति पकड़ी है और जनता का ध्यान आकर्षित किया है। जवाबदेही और मापने योग्य परिणामों पर जोर अतीत की अस्पष्ट नीतियों से अलग है। लेकिन सिर्फ महत्वाकांक्षा होना ही काफी नहीं रहता। संस्थागत जड़ता, संसाधन सीमाएं और नौकरशाही की अड़चनों को पार करना होगा। असली चुनौती है कि यह एजेंडा पूर्व सरकारों के दौरान हुए हाल की नकल बनकर न रह जाए।
बालेन शाह सरकार ने स्कूलों और पाठ्यक्रम से जुड़े शुरुआती निर्णय भी लिए हैं जिनकी फिलहाल तो तारीफ ही हो रही है। इनमें मुख्य रूप से परीक्षा‑तनाव कम करना, राजनीति निकाल बाहर करना और शिक्षा को बच्चों के अधिक अनुकूल बनाना जैसे बिन्दु हैं। हालांकि यह सब भी सरकार के 100‑सूत्री कार्य एजेंडे के तहत आता है।
प्राथमिक स्तर पर परीक्षा खत्म
बालेन सरकार ने आदेश दिया है कि प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5 तक) के छात्रों के लिए आंतरिक लिखित परीक्षाएं पूरी तरह समाप्त कर दी जाएंगी। बच्चों का आकलन अब होमवर्क, प्रोजेक्ट, चर्चा, निरीक्षण और मनोवैज्ञानिक तरीकों जैसी गैर‑परीक्षा विधियों से किया जाएगा, ताकि तनाव कम हो और सीखने का माहौल अधिक समग्र रहे।
नई नीति के तहत सभी सार्वजनिक कर्मचारियों और शिक्षकों के राजनीतिक दलों से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसका उद्देश्य शिक्षण संस्थानों (स्कूल‑कॉलेज और विश्वविद्यालय) को राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखना और शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना बताया गया है। साथ ही, सरकार ने स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों (कॉलेज‑यूनिवर्सिटी) में दल‑संबद्ध छात्र संगठनों पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। इनके स्थान पर 90 दिन के अंदर गैर‑राजनीतिक छात्र परिषद/काउंसिलें बनाई जाएंगी, जो छात्रों की समस्याओं को उठाएगी।
पाठ्यक्रम और शैक्षणिक व्यवस्था में बदलाव
जारी की गई नई योजना में यह भी कहा गया है कि परीक्षा परिणाम निर्धारित शैक्षणिक कैलेंडर के भीतर जारी किए जाएंगे, ताकि देरी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम हो। इसमें यह भी संकेत दिया गया है कि पाठ्यक्रम को अधिक व्यावहारिक, अंतरराष्ट्रीय मानकों के निकट और छात्रों की मानसिक‑सामाजिक सेहत को ध्यान में रखकर ढाला जाएगा, हालांकि विस्तृत पाठ्यक्रम‑पुनर्संरचना अभी चरणबद्ध तरीके से आनी बाकी है। ये निर्णय अभी शुरुआती चरण में हैं, असली परीक्षा तो इनके जमीन पर उतरने के बाद होगी।

















