
निदाल हसन
अभी तक ईरान और अफगानिस्तान जैसे मुल्कों में ही मौत की सजा को जनता के सामने दिखाया जाता था, और उसे जाहिल या पिछड़ा कहा जाता था। मगर अब कथित सभ्य कहे जाने वाले अमेरिका में भी यही होने जा रहा है। 9 अक्टूबर को पेंटागन ने यह कहा कि वह उस आदमी को मौत की सजा का सीधा प्रसारण कर सकता है, जिसने वर्ष 2009 में फोर्ट हुड मिलिटरी बेस पर हमला किया था।
अब इस घोषणा को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है कि क्या यह वैध है? और यदि यह वैध तो इसे किया क्यों नहीं जा सकता है और अंतत: राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस योजना को वापस क्यों लिया?
यह भी जानना आवश्यक है कि आखिर मौत की सजा किसे दी जा रही है? और उसका अपराध इतना जघन्य कैसे है? दरअसल यह सजा अमेरिका के मेजर निदाल हसन को दी जा रही है। हसन एक अमेरिकी मुसलमान था और उसका जन्म एक रूढ़िवादी कट्टर फिलिस्तीनी – अमेरिकी मुसलमान परिवार में हुआ था। कहने के लिए वह अमेरिकी था, मगर वह अपनी मूल जड़ें मध्य पूर्व और इस्लाम में खोजता था। उसे अमेरिका से प्यार नहीं था।
साल 2001 में उसकी माँ की मौत हुई और उसके बाद वह कट्टरता की ओर झुकने लगा।
वह अमेरिका में सेना में था, मगर उसके दिमाग में कट्टरता पनपने लगी और देखते ही देखते वह सेना में रहते हुए खुलेआम अमेरिकी विदेश नीति और अफगानिस्तान और इराक युद्ध की आलोचना करने लगा था। उसने अपने साथी मुसलमान सैनिकों को भी भड़काना आरंभ कर दिया था। अपने आपको गह अल्लाह का सिपाही कहने लगा था और अमेरिकी सैनिकों की हत्या को जिहाद मानने लगा था। जबकि वह सेना में मनोचिकित्सक था। वर्ष 2009 में उसे फोर्ट हुड सैन्य बेस भेजा गया।
वहीं पर उसने 5 नवंबर 2009 को दोपहर के लगभग 1.30 बजे सोल्जर रेडीनेस प्रोसेसिंग सेंटर में गोलीबारी करना आरंभ कर दिया। उसने उससे पहले अल्लाह हू अकबर का नारा लगाया था। वह कमरा सैनिकों से खचाखच भरा हुआ था और देखते ही देखते उसके द्वारा चलाई गई 200 राउंड गोलियों के चलते वहाँ पर लोग गिरने लगे।
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उस दिन उसकी गोलियों से 13 लोगों की मौत हुई थी। 12 अमेरिकी सैनिक थे और एक आम नागरिक।
मगर हसन को भी बदले में गोलियां लगीं और उसके चलते उसका नीचे का हिस्सा बेकार हो गया और उसके बाद से ही वह अपाहिज का जीवन जी रहा था। उसके द्वारा चलाई गई गोलियों में एक गर्भवती महिला की भी मौत हुई थी। तो एक अजन्मे बच्चे की भी मौत हुई थी। जांच में सामने आया था कि वह अलकायदा के कुख्यात आतंकी और कट्टरपंथी मौलवी अनवर अल-अवलाकी (Anwar al-Awlaki) के संपर्क में था।
उस पर मुकदमा चला और उसने खुद माना कि उसे अपनी करनी पर कोई पछतावा नहीं है और उसने जानबूझकर ही ये हत्याएं की थीं। उसे मौत की सजा सुनाई गई थी और वर्ष 2026 में आकर अब ट्रम्प प्रशासन ने तमाम अपीलों को खारिज करते हुए 3 दिसंबर 2026 को उसे मौत की सजा देनी तय की है।
निदाल को मौत की सजा गोली मारकर दी जाएगी। अब उसकी मौत की सजा के सीधे प्रसारण का प्रस्ताव है और जिसे अब कुछ लोगों द्वारा रिलीजियस रंग दिया जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि यह बाइबिल में लिखा है कि अपने दुश्मन को मौत की सजा सबके सामने दी जानी चाहिए।
ट्रम्प के समर्थक माने जाने वाले डलास के पादरी रॉबर्ट जेफ्रेस का कहना है कि यह बाइबिल के अनुसार पूरी तरह से ठीक है। क्योंकि उनके अनुसार ईश्वर ने स्वयं ही समाज को सुरक्षित रखने के लिए हत्यारों को मौत की सजा का प्रावधान किया है और अगर इसका सीधा प्रसारण किया जाएगा, तो लोगों के मन में डर बैठेगा और वे गलत काम करने से पहले सोचेंगे।
दरअसल यह प्रस्ताव रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ लाए थे, जो कि Communion of Reformed Evangelical Churches से जुड़े हैं, और यह ईसाई राष्ट्रवाद का समर्थन करता है। और वह समाज को पुराने कड़े रिलीजियस नियमों के अनुसार ही संचालित करना चाहता है।
मगर जहां ट्रम्प के समर्थक कहे जाने वाले पादरी रॉबर्ट रक्षामंत्री द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव के पक्ष में हैं तो वहीं तमाम अन्य रिलीजियस नेता, इस पक्ष में नहीं हैं कि निदाल की सजा का सीधा प्रसारण किया जाए। कैथोलिक नेताओं ने इस योजना को पूरी तरह से नकार दिया है।
वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी इस योजना को लेकर अभी तक कोई निर्णय इसलिए नहीं लिया था क्योंकि ट्रम्प को लगता है कि ऐसा करने से मुस्लिम चरमपंथी और भी ताकतवर हो जाएंगे। मीडिया के अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प को उनके सलाहकारों ने यह चेतावनी दी है कि यदि इसका सीधा प्रसारण होता है तो यह हमेशा के लिए रिकार्ड में रह जाएगा, और जिसके चलते आईएसआईएस या अलकायदा जैसे संगठन लोगों का ब्रेनवाश और भी सरलता से कर सकते हैं।
वहीं यहूदी धर्मगुरुओं ने भी इस योजना का विरोध किया था। और चौतरफा विरोध के चलते संभवतया अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने मौत की सजा के सीधे प्रसारण को रद्द कर दिया है, हालांकि उसे मौत की सजा नियत समय पर ही दी जाएगी।