यह प्रसिद्ध श्लोक प्राचीन ग्रंथ महाभारत के शान्तिपर्व (मोक्षधर्म पर्व / पराशर गीता) से लिया गया है।
श्लोक :
नायं परस्य सुकृतं दुष्कृतं चापि सेवते।
करोति यादृशं कर्म तादृशं प्रतिपद्यते।।
भावार्थ :
सामान्यतया प्राणी न तो किसी दूसरे के पुण्यों का फल प्राप्त करता है और न ही पापों का। वह तो स्वयं जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है।
श्लोक की प्रासंगिकता (Relevance):
यह श्लोक कर्म के सिद्धांत (Law of Karma) के सबसे महत्वपूर्ण और शाश्वत सत्य को उजागर करता है। इसकी प्रासंगिकता निम्नलिखित बिंदुओं से समझी जा सकती है:
कर्म की व्यक्तिगत जवाबदेही: यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य अपने अच्छे या बुरे कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी है। कोई अन्य व्यक्ति किसी के अच्छे (पुण्य) या बुरे (पाप) कर्मों का फल सीधे तौर पर नहीं भोग सकता।
नैतिक जीवन की प्रेरणा: यह हमें यह सिखाता है कि हम दूसरों पर दोष मढ़ने या दूसरों के भरोसे रहने के बजाय अपने आचरण और कर्मों को सुधारें, क्योंकि जैसा बीज बोएंगे वैसा ही फल प्राप्त होगा।

















