
डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, अमेरिका
अमेरिका लंबे समय से भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव बनाता रहा है। पिछले साल अतिरिक्त टैरिफ लगाए गए और हाल ही में एक कानून पास हुआ जिसमें ट्रंप को रूस का एनर्जी खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया। अमेरिकी दलील यह रही कि भारत रूस का तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध के लिए पैसे जुटा रहा है।
लेकिन अब ट्रंप ने खुद एक बड़ा ऐलान किया है। रूस अमेरिका और वैश्विक बाजारों को लाखों टन डीजल सप्लाई करेगा। यह फैसला अमेरिका की पहले वाली नीति से बिल्कुल उल्टा लगता है।
डीजल सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं है। इससे लंबे ट्रक, खेती के मशीन, निर्माण उपकरण और भारी इंडस्ट्री चलती है। दाम बढ़ने से महंगाई सीधे आम आदमी तक पहुंचती है।हाल के हफ्तों में अमेरिका और यूरोप में डीजल के दाम काफी चढ़ गए। कारण हैं होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई में रुकावट और रूस के ऑयल-गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले। स्टॉक कम हो गए हैं और खरीदार कहीं से भी ईंधन जुटाने की कोशिश में हैं।
अमेरिका में डीजल का भाव लगभग 6.5 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। मिडटर्म चुनाव नजदीक हैं, इसलिए प्रशासन दाम घटाने की कोशिश दिखा रहा है। ट्रंप पहले यूरोप से स्टॉक रिलीज करने को कह रहे थे और अमेरिका खुद डीजल एक्सपोर्ट बंद करने की बात भी कर चुके थे। पिछले हफ्ते जी-7 देशों ने 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स रिलीज करने का फैसला किया, जिसमें काफी डीजल भी शामिल है। उसके बाद ट्रंप ने एक्सपोर्ट रोकने वाला रुख बदला और शुक्रवार को रूसिन के साथ डील का ऐलान किया।
ट्रंप के मुताबिक रूस तुरंत 3 लाख टन से ज्यादा डीजल अमेरिका और दूसरे देशों को देगा। नवंबर में 5 लाख टन और उसके बाद तुरंत 10 लाख टन। रूस की रिफाइनरियों की स्थिति देखकर और 30 लाख टन जल्दी सप्लाई होगा। अमेरिकी ट्रेजरी के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने एक जनरल लाइसेंस जारी किया है, जो अप्रैल 2027 तक रूसी डीजल की खरीद-बिक्री, डिलीवरी और इंपोर्ट की अनुमति देता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये मात्राएं वैश्विक स्तर पर बाधित सप्लाई की तुलना में कम हैं। ऐलान से फौरन राहत मिल सकती है, लेकिन लंबी अवधि का समाधान नहीं है। रूस की एक्सपोर्ट पाबंदियां, यूक्रेनी ड्रोन हमलों से रिफाइनरियों को नुकसान और टैंकरों की कमी अभी भी बाधा बन सकती हैं।
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रूस का तेल भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगस्त में यह भारत के कुल तेल आयात का लगभग आधा था। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल खरीदना कम कर दिया, कीमतें गिरीं और भारत ने सस्ता तेल खरीदना शुरू किया।
बाद में अमेरिका ने रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए तो भारत का रूसी तेल आयात घटा। फरवरी में यह 2025 के पीक (2 मिलियन बैरल प्रतिदिन से ज्यादा) से आधा हो गया था, फिर भी रूस सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा। पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण होर्मुज से सप्लाई प्रभावित हुई तो भारत का रूसी आयात फिर बढ़ा। अमेरिका ने भी वैश्विक बाजार संभालने के लिए कुछ छूट दी थी।
पिछले महीने ट्रंप ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026’ पर दस्तखत किए। इसमें रूस का तेल-गैस खरीदने वाले देशों (भारत और चीन सहित) पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। राष्ट्रपति इसमें छूट भी दे सकते हैं। अब ट्रंप खुद रूसी डीजल अमेरिका में लाने की व्यवस्था कर रहे हैं। इससे भी रूस को रेवेन्यू मिलेगा, ठीक वैसे ही जैसे भारत के कच्चे तेल खरीदने से मिलता है। भारत विदेश मंत्रालय ने पिछले महीने कहा था कि इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर चर्चा हुई है और द्विपक्षीय संबंधों व अंतरराष्ट्रीय एनर्जी बाजार पर असर साफ बताया गया है।
अमेरिका इसे अस्थायी और आपात स्थिति का जवाब बता सकता है। लेकिन भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और 88 प्रतिशत से ज्यादा निर्भरता आयात पर है। अगर अमेरिका अपनी आर्थिक जरूरत के लिए रूसी ईंधन ला सकता है तो भारत अपनी एनर्जी सुरक्षा और लागत का तर्क भी दे सकता है।