‘छत्रपति संवाद: मुंबई संकल्प’ में फरीदाबाद स्थित माता अमृतानंदमयी मठ द्वारा संचालित अमृता अस्पताल के प्रशासनिक निदेशक स्वामी निजामृतानंद पुरी और सीमांत सेवा फाउंडेशन के सचिव सिद्धार्थ पाटनी से वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्यांश
फरीदाबाद में आपका 2600 बेड का आधुनिक अस्पताल है, इसे बनाने का मूल उद्देश्य क्या था ?
स्वामी निजामृतानंद पुरी : उद्देश्य भारत था। भारत की नींव अध्यात्म है। गीता का संदेश है-“यज्ञार्थ कर्म”। यज्ञ के भाव से किया गया कर्म व्यक्ति को ऊंचाई की ओर ले जाता है, जबकि स्वार्थ का कर्म बांधता है। इसलिए सेवा ही हमारा आधार है। अम्मा के लिए अस्पताल केवल अस्पताल नहीं है। करीब 4000 महिलाओं के सेल्फ हेल्प ग्रुप, लगभग 15 प्रशिक्षण केंद्र, गांव की महिलाओं द्वारा परिसर में इलेक्ट्रिक बग्गियां चलाना और स्थानीय महिलाओं को नि:शुल्क नर्सिंग असिस्टेंट प्रशिक्षण जैसे काम भी चलते हैं। आश्रम देशभर में करीब 2800 गांवों में अलग-अलग स्तर पर काम करता है।
सीमावर्ती क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा की जरूरत क्यों महसूस हुई और वहां की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सिद्धार्थ पाटनी: सीमा केवल सैनिकों से सुरक्षित नहीं होती। अगर स्थानीय लोग वहां नहीं रहेंगे, गांव खाली होंगे और पलायन होगा तो सीमा कमजोर होगी। हमारे क्षेत्र में 13 जिले, 95 ब्लॉक और नौ पहाड़ी जिले हैं। 15,000-16,000 फीट तक अस्पताल और क्लिनिक चल रहे हैं, जहां चीन, तिब्बत और नेपाल की सीमाएं मिलती हैं। वहां तीन महीने भारी बर्फबारी, करीब ढाई महीने भारी बारिश और बाकी समय सड़क निर्माण चलता है। हार्ट अटैक या प्रसव जैसी स्थिति में समय का अभाव होता है। हाल में ढाई दिन सड़क बंद रही और उसी सुबह खुली। आईटीबीपी, एसएसबी, वायुसेना और सेना के मुख्यालय भी इन क्षेत्रों में हैं। उन्हें भी बुनियादी सर्जरी की जरूरत होती है, लेकिन उनकी अपनी सीमाएं हैं। इसलिए सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल जरूरी है। नेपाल करीब 22 किलोमीटर दूर है और वहां से भी मरीज आते हैं।
आपकी सेवा अभी कितने क्षेत्र और गांवों तक पहुंच रही है?
सिद्धार्थ पाटनी: सीधे पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा और बागेश्वर-चार जिलों में काम है। नेपाल के महाकाली अंचल और चीन सीमा तक भी सेवाएं पहुंचती हैं। दो मेडिकल मोबाइल यूनिट 104 गांवों को कवर कर रही थीं। इनमें डिजिटल एक्स-रे, लैब जांच और ईसीजी की सुविधा है। अब दो एंबुलेंस 200 से ज्यादा गांवों तक जाएंगी। शहर और पहाड़ की परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। सीमाएं तभी सुरक्षित रहेंगी जब लोग वहां रहेंगे। संघ की प्रेरणा से यह चिकित्सालय 2023 से चल रहा है।
इतने बड़े अस्पताल की अर्थव्यवस्था कैसे संभलती है ?
स्वामी निजामृतानंद पुरी : कोच्चि का अस्पताल अटल जी ने 26 साल पहले शुरू किया था। अगर वहां से बचा पैसा फरीदाबाद में लगाया जाता तो अलग बात थी, लेकिन फरीदाबाद का अस्पताल दुनिया भर से 15-20 वर्षों में जुटाए गए धन से बना है। केरल में करीब 900 करोड़ रुपये का नि:शुल्क उपचार हो चुका है। फरीदाबाद का परिसर करीब 125 एकड़ में है, लगभग 60 लाख वर्गफीट में निर्माण कार्य है। इसमें विश्वविद्यालय व अस्पताल दोनों हैं। इतने बड़े परिसर के संचालन का खर्च आप समझ सकते हैं। आश्रम का अपना पैसा नहीं है, यह जनता का पैसा है। हम केवल ट्रस्टी हैं और व्यक्तिगत रूप से कोई लाभ नहीं है। निर्माण का पूरा खर्च आश्रम ने उठाया है, इसलिए वह संचालन के खर्च में नहीं आता।
आपकी संस्था यह आर्थिक मॉडल कैसे चलाती है?
सिद्धार्थ पाटनी: हम भी दानदाताओं के पैसे से काम करते हैं और हमें आयुष्मान का भुगतान मिलता है, जो राज्य सरकार की व्यवस्था पर निर्भर करता है। अगर सेवा को पैसे के आधार पर चलाएंगे तो नुकसान होगा, लेकिन सेवा को आधार बनाएंगे तो सहयोग मिलता रहेगा। कई बार लगा कि अब काम कैसे चलेगा, तभी कोई व्यक्ति आया और सहयोग कर गया। कहां से और कब आएगा, पता नहीं होता। अच्छे उद्देश्य और निःस्वार्थ भाव से काम हो तो लोग जुड़ते हैं। स्वामी जी और आश्रम की प्रेरणा से हम भी काम कर रहे हैं। मेरा मानना है कि जितना बड़ा सेवा कार्य होता है, उतने ही लोग सहयोग के लिए आते हैं।
क्या इस तरह का मॉडल दूसरी जगह भी बनाया जा सकता है? इसके लिए क्या जरूरी है?
स्वामी निजामृतानंद पुरी : हमारे हर काम के पीछे माता अमृतानंदमयी देवी यानी अम्मा की प्रेरणा और प्रेम है। आश्रम में पहले हम खुद निर्माण करते थे-टॉयलेट और सेप्टिक टैंक तक। अम्मा कहती थीं कि ईंट और सीमेंट ब्लॉक खुद बनाओ। जितना अपनी जरूरत के लिए चाहिए, उससे ज्यादा समाज के लिए बनाओ।
आश्रम में कोई मुफ्त में नहीं खाता, सभी काम करते हैं। अम्मा का सवाल था, अगर एक जेब से पैसा निकालकर दूसरी जेब में डाल दिया तो योगदान क्या हुआ? 10 रुपये आएं तो उन्हें 20 रुपए के सामाजिक प्रभाव में बदलकर समाज को लौटाना चाहिए।
लोग देना और काम करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सही माध्यम नहीं मिलता। भरोसेमंद संस्था उन्हें बताएं कि कहां क्या करना है तो लोग बहुत योगदान कर सकते हैं। इसलिए छोटे स्तर से शुरुआत कर धीरे-धीरे काम बढ़ाना चाहिए।
हिमालय के दूसरे दुर्गम क्षेत्रों में यह मॉडल कैसे बढ़ सकता है?
सिद्धार्थ पाटनी: यह अच्छे लोगों और अच्छे नेतृत्व पर निर्भर करता है। व्यक्ति खड़ा होता है तो संसाधन भी जुटते हैं। संघ का काम भी व्यक्ति निर्माण का है। अगर लोग समझें कि “पहाड़ की पीड़ा पहाड़ से भी बड़ी है” और उसके लिए खड़े हों तो रास्ता निकलता है। आयुष्मान भारत में 60 करोड़ लोग पंजीकृत और 13 करोड़ लाभार्थी बताए गए हैं। योजना अच्छी है, लेकिन दूरदराज क्षेत्रों में सबसे बड़ी समस्या पहुंच की है।
मैं झारखंड के जनजातीय क्षेत्र में सात दिन काम कर चुका हूं। हमारे क्षेत्र में आयुष्मान से इलाज के लिए भी कई बार आठ घंटे की यात्रा करनी पड़ती है। हिमालय क्षेत्र में ढाई महीने अत्यधिक ठंड और बाकी समय बारिश-भूस्खलन की समस्या रहती है। इसलिए स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण जरूरी है। अभी करीब 50 प्रतिशत सेवाएं सरकारी, 40 प्रतिशत निजी और 3-4 प्रतिशत चैरिटेबल ट्रस्ट अस्पतालों से आती हैं। दुर्गम क्षेत्रों में नॉट-फॉर-प्रॉफिट संस्थान विकसित करने होंगे। कैंप जरूरी हैं, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए स्थायी संस्थान चाहिए।
गढ़वाल में श्री विवेकानंद हेल्थ मिशन के 12 अस्पताल काम कर रहे हैं। कुमाऊं में श्री सीमान्त सेवा फाउंडेशन का चौथा अस्पताल चल रहा है और भविष्य में 150 बेड के अस्पताल की योजना है। सरकार की योजनाओं के साथ जनसहयोग और सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। “जहां कम, वहां हम” की भावना से ऐसे क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाई जा सकती है।
क्या एआई के दौर में मानवीय संवेदना की जरूरत बनी रहेगी?
एआई डॉक्टरों सहित कई नौकरियां ले सकता है, लेकिन मानवीय संवेदना का स्थान कौन लेगा? इन सेवा कार्यों से यही सामने आता है कि तकनीक के साथ मानवीय संवेदना भी जरूरी है। बड़े अस्पताल बनना एक पक्ष है, लेकिन असली चुनौती यह है कि उनकी चिकित्सा सुविधा आम आदमी तक कितनी दूर पहुंचे। दूरदराज क्षेत्रों की यही सबसे बड़ी चुनौती और इस पूरे संवाद का मूल बिंदु है।
















