
प्रतीकात्मक तस्वीर
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के चलते हालात खराब हैं। तेल की सप्लाई में रुकावटों के बाद भी भारत सरकार लगातार देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में लगी है। इसका असर ये हुआ है कि भारत के कच्चे तेल आयात में सितंबर में अच्छी-खासी बढ़ोतरी देखी गई। साल 2026 में यह आंकड़ा अब तक का सबसे ऊंचा स्तर पर पहुंच गया।
सितंबर 2026 में भारत ने रोजाना औसतन 5.26 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया। यह पूरे साल का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। इससे पहले के महीनों में आयात थोड़ा कम रहा था, लेकिन सितंबर में अचानक उछाल आ गया। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से खाड़ी देशों से आने वाले तेल की वजह से हुई।
सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कुवैत, ओमान और कतर—इन सबने मिलकर भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 39 प्रतिशत हिस्सा दिया।
इराक इस बार रूस के बाद दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर बन गया। फरवरी में शुरू हुए अमेरिकी-ईरान टकराव के बाद पहली बार ऐसा हुआ। इससे पहले इराक और कुवैत की सप्लाई कई महीनों तक लगभग बंद सी पड़ गई थी।
रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर है। हालांकि सितंबर में रूसी तेल का आयात थोड़ा घटा। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक यह करीब 1.7 से 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन रहा, जो कुछ महीने पहले के ऊंचे स्तर से कम है। फिर भी रूस का हिस्सा कुल आयात का काफी बड़ा हिस्सा बना रहा।
होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल ले जाना जोखिम भरा माना जा रहा है क्योंकि फरवरी से अमेरिकी-ईरान विवाद चल रहा है। इस इलाके से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है। फिर भी खाड़ी देशों से सप्लाई बढ़ गई। वजह यह है कि उत्पादक और व्यापारी एक नया तरीका अपना रहे हैं। कई बड़े टैंकर होर्मुज से गुजरते समय अपना AIS ट्रांसपॉंडर बंद कर देते हैं। फिर यूएई या ओमान के पानी में जहाज-से-जहाज ट्रांसफर करके तेल आगे भेज दिया जाता है। इससे रिफाइनरियों तक तेल पहुंचने का रास्ता खुल गया।
आयात बढ़ने का सबसे बड़ा कारण खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई में अचानक सुधार है। पहले अमेरिकी-ईरान विवाद के चलते होर्मुज से गुजरना मुश्किल हो गया था, इसलिए इराक, सऊदी और कुवैत जैसे देशों से तेल कम आने लगा था। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल पर ज्यादा निर्भरता बढ़ा दी थी।
अब होर्मुज से गुजरने का वैकल्पिक तरीका काम कर रहा है। इससे खाड़ी का तेल फिर से आसानी से उपलब्ध हो गया। रिफाइनरियां भी अच्छी क्षमता से चल रही हैं और मेंटेनेंस का काम कुछ कम हो गया है, इसलिए कुल मांग बढ़ी। साथ ही रूसी तेल को लेकर कुछ दबाव भी है, इसलिए सप्लाई के स्रोत बढ़ाने की कोशिश चल रही है।