
महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह
वसंत की विदाई पर, सुनहरी धूप में जब पंजाब के विशाल सरसों के खेत पीले सागर में बदल जाते हैं और फसल कटाई के उल्लास में डूबे ग्रामीणों के लोकगीतों से दिशाएं गूंज उठती हैं, ठीक उसी पावन बेला में आगमन होता है बैसाखी का। बैसाखी केवल पंजाब का फसल उत्सव नहीं है; यह गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा 1699 में आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना का ऐतिहासिक दिन भी है। किंतु 13 अप्रैल 1919 की उस उत्सवमयी दोपहर का पल भारतीय इतिहास में एक अमिट करुण क्रंदन और रक्तिम नरसंहार की दास्तान बनकर दर्ज हो गया। कुख्यात रोलेट एक्ट और अपने जनप्रिय नेताओं की असंवैधानिक गिरफ्तारी के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों मेले से लौटे आम जन, किसान और श्रद्धालु परिवार एकत्र हुए थे। परंतु जनरल डायर ने उस उत्सव के प्रांगण को गोलियों की अंधी बौछार से ढहा दिया। पीली मिट्टी हजारों निर्दोषों के रक्त से लाल हो गई। इस ऐतिहासिक बैसाखी मेले और जलियांवाला बाग के भीषण नरसंहार का जीवंत विवरण प्रख्यात इतिहासकार कामा मैक्लीन की चर्चित पुस्तक ‘ए रिवोल्यूशनरी हिस्ट्री ऑफ इंटरवार इंडिया: वायोलेंस, इमेज, वॉयस एंड टेक्स्ट’ में मिलता है, जहां वे इस खूनी पर्व को भारतीय राष्ट्रवाद का एक निर्णायक मोड़ मानती हैं।
बैसाखी की यह रक्त-रंजित माटी भारत के क्रांतिकारी इतिहास का एक युगांतरकारी मोड़ सिद्ध हुई। घटना के अगले दिन, ग्यारह वर्ष का एक बालक लाहौर से पैदल चलकर जलियांवाला बाग के उस मूक श्मशान में आ खड़ा हुआ। उस बालक का नाम था भगत सिंह। मेले से छूटे बच्चों के टूटे खिलौने, मिठाई के दोने और चारों ओर जमे खून के काले धब्बों को देखकर उस बालक के हृदय में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध एक प्रचंड ज्वाला धधक उठी। उसने उस लहू से भीगी पवित्र मिट्टी को उठाकर कांच की एक शीशी में भर लिया। घर लौटकर अपनी बहन के सामने उस शीशी को लहराते हुए बालक भगत सिंह ने कसम खाई थी कि वह इस रक्त की हर एक बूंद का बदला लेगा और भारत भूमि को फिरंगियों के चंगुल से आजाद कराएगा। इस प्रकार, पंजाब के एक हर्षोल्लास भरे उत्सव के कारुणिक अंत ने भारत के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी को जन्म दिया। बैसाखी अब भगत सिंह के लिए केवल फसल का पर्व या कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही; वह गुलामी की बेड़ियां काटने और सर्वोच्च बलिदान की एक शाश्वत मशाल बन गई। अमर बलिदानी के इस बाल्यकाल के संकल्प और लहू से भीगी मिट्टी की घटना का वर्णन जितेंद्र नाथ सान्याल द्वारा 1931 में लिखित पहली जीवनी ‘सरदार भगत सिंह’ में दर्ज है, जिसे तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने तत्काल प्रतिबंधित कर दिया था।
एक अत्यंत विलक्षण सत्य यह है कि भगत सिंह भारत के स्वाधीनता समर के सबसे स्पष्टवादी और अडिग नास्तिक थे। फिर भी, उनके जीवन का प्रत्येक महत्वपूर्ण पड़ाव भारत के पारंपरिक पर्व-त्योहारों से आत्मीय रूप से जुड़ा रहा। उन्होंने धार्मिक उत्सवों को किसी अंधविश्वास या कर्मकांड के दृष्टिकोण से नहीं देखा, अपितु उन्हें ब्रिटिश साम्राज्यवाद की फूट डालो और राज करो की नीति के विरुद्ध जन-जागरण और सांप्रदायिक सौहार्द का एक शक्तिशाली शस्त्र बनाया। परंतु इतिहास की विडंबना देखिए, भारत के कम्युनिस्टों ने भगत सिंह की इस महान विरासत को कलंकित करने, विकृत करने और हड़पने का घृणित षड़यंत्र रचा। जब भगत सिंह लाहौर जेल की काल कोठरी में फांसी के फंदे का सामना कर रहे थे, तब कम्युनिस्ट पत्रों में उन्हें ‘पेट्टी-बुर्जुआ उग्रवादी’ कहा जा रहा था और उनके सशस्त्र प्रतिरोध को ‘प्रतिशोध की राजनीति’ बताकर नीचा दिखाया जा रहा था। आज जब बैसाखी के पावन पर्व पर हम भगत सिंह के जीवन और विचारों का पुनरावलोकन करते हैं, तो वामपंथियों की इस ऐतिहासिक शत्रुता, दुष्प्रचार और बाद के अवसरवादी वैचारिक अधिग्रहण का भंडाफोड़ करना अनिवार्य हो जाता है। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस मोफेट ने अपनी शोध पुस्तक ‘इंडियाज़ रिवोल्यूशनरी इनहेरिटेंस: पॉलिटिक्स एंड द प्रॉमिस ऑफ भगत सिंह’ में लिखा है कि यद्यपि भगत सिंह ने व्यक्तिगत स्तर पर धर्म को खारिज कर दिया था, किंतु सामाजिक स्तर पर उन्होंने धार्मिक उत्सवों को औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सांस्कृतिक हथियार के रूप में ढाला।
भगत सिंह के क्रांतिकारी व्यक्तित्व के प्राथमिक बीज उनके पारिवारिक माहौल में ही रोपे गए थे। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था। उनका जन्म का वर्ष पंजाब के किसान आंदोलन का उथल-पुथल भरा समय था, जब उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह ने ब्रिटिश सरकार के ‘कैनाल कॉलोनाइजेशन एक्ट’ के विरुद्ध प्रचंड आंदोलन छेड़ रखा था। भगत सिंह का बचपन का धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश आर्य समाज के सुधारवादी आंदोलन और पारंपरिक सिख संस्कृति के अद्भुत संगम से निर्मित हुआ था। भगत सिंह ने अपने विश्वप्रसिद्ध और कालजयी निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में अपने बचपन के धार्मिक विश्वासों को खुलकर स्वीकार किया है। फांसी से कुछ समय पूर्व अक्टूबर 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में लिखे गए इस निबंध में उन्होंने उल्लेख किया है कि उनके दादा अर्जुन सिंह एक कट्टर आर्य समाजी थे। अपने दादा के प्रभाव में ही भगत सिंह का दाखिला लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (डीएवी) स्कूल में कराया गया था, जहां वे प्रतिदिन घंटों निष्ठापूर्वक गायत्री मंत्र का जाप करते थे। उस आयु में वे ईश्वर के अनन्य भक्त थे। यह निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लाला लाजपत राय के प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक ‘द पीपल’ में 27 सितंबर 1931 को मरणोपरांत प्रकाशित हुआ था।
भगत सिंह के दादा अर्जुन सिंह 1877 के आसपास स्वामी दयानंद सरस्वती के आर्य समाज आंदोलन से जुड़े थे, जो मूर्तिपूजा और जाति-पांत का विरोधी था। उनका परिवार सिख परंपराओं का भी गहरा सम्मान करता था। ‘खालसा क्रॉनिकल’ में दर्ज पारिवारिक इतिहास के अनुसार, हर वसंत में होला मोहल्ला पर्व पर सिख बालकों को आनंदपुर साहिब ले जाकर ‘पाहुल’ (खालसा दीक्षा) दिलाने की परंपरा भगत सिंह के परिवार में अटूट रूप से निभाई जाती थी। इन बाल्यकाल के उत्सवों ने भगत सिंह को पंजाब की ग्रामीण संस्कृति की सामाजिक चेतना से परिचित कराया। आर्य समाज की नैतिक निष्ठा और खालसा के त्याग के आदर्शों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। परंतु जैसे-जैसे वे युवावस्था की ओर बढ़े और कार्ल मार्क्स, बकुनिन, लेनिन तथा ट्रॉटस्की के विचारों का गहन अध्ययन किया, ईश्वर के प्रति उनका विश्वास तार्किक रूप से समाप्त हो गया। फिर भी, उन्होंने धर्म के मानवीय मूल्यों—जैसे सत्य, दया और पीड़ितों की सेवा—को कभी नकारा नहीं। वे पंजाबी कवि वारिस शाह की ‘हीर’ और मिर्ज़ा ग़ालिब की उर्दू ग़ज़लों के मुरीद थे। जेल में वे सस्वर ‘हीर’ गाते थे। उनके लिए नास्तिकता कोई शुष्क धर्म-विरोध नहीं, बल्कि मानव-मुक्ति का एक उच्च दार्शनिक मार्ग थी। सिख लोक संस्कृति में बैसाखी और होला मोहल्ला के सामाजिक रूपांतरण पर शोध करते हुए इतिहासकार ईश्वर दयाल गौर ने अपनी पुस्तक ‘मार्टर एज़ ब्राइडग्रूम: ए लोक रिप्रेजेंटेशन ऑफ भगत सिंह’ में दर्शाया है कि सिख शूरवीरता की परंपरा भगत सिंह के अचेतन मन में बचपन से ही रच-बस गई थी।
भगत सिंह के जीवन और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पर्व-त्योहारों का सबसे नाटकीय और दूरगामी मोड़ 13 अप्रैल 1919 को आया। वह बैसाखी का पवित्र दिन था-पंजाब का फसल उत्सव और 1699 में गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना का ऐतिहासिक पर्व। परंतु ब्रिटिश साम्राज्यवाद की क्रूरता ने उल्लास के उस दिन को चीखों और लाशों के ढेर में बदल दिया। रोलेट एक्ट के विरोध में और डॉ. सत्यपाल तथा डॉ. सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के खिलाफ जलियांवाला बाग में हजारों निर्दोष ग्रामीण और मेले के श्रद्धालु एकत्रित हुए थे। जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों पर 1,650 गोलियां बरसाई गईं, जिसमें एक हजार से अधिक लोग बलिदान हो गए। इस वीभत्स नरसंहार से ठीक एक दिन पूर्व 9 अप्रैल 1919 को मनाए गए रामनवमी उत्सव का वर्णन करते हुए इतिहासकार एस. इरफान हबीब ने अपनी पुस्तक ‘इंकलाब: भगत सिंह ऑन रिलिजन एंड रिवोल्यूशन’ में लिखा है कि वह राष्ट्रीय एकता का एक अभूतपूर्व दृश्य था, जहां मुसलमानों ने अपने हिंदू भाइयों को प्रेम से शरबत पिलाया था।
इतिहास के प्रोफेसर चमन लाल ने अपने आलेख ‘जलियांवाला बाग – ब्लडी बैसाखी ऑफ 1919’ में लिखा है कि घटना के अगले ही दिन ग्यारह वर्षीय भगत सिंह लाहौर से पैदल चलकर उस खूनी बाग में पहुंचे। उन्होंने वहां की लहू से भीगी मिट्टी को एक कांच की बोतल में संजोया और शहीदों के खून की कसम खाकर अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। खटकर कलां संग्रहालय में आज भी सुरक्षित वह मिट्टी भारत के स्वाधीनता समर की अत्यंत पावन धरोहर है। रामनवमी के जुलूस में हिंदू-मुस्लिम एकता को देखकर ही बौखलाए ब्रिटिश शासन ने किचलू और सत्यपाल को गिरफ्तार किया था, जिसका परिणति बैसाखी के दिन नरसंहार में हुई। इस घटना ने बालक भगत सिंह के मन में यह बात बैठा दी कि भारत के पारंपरिक त्योहार ही जन-एकता के सबसे बड़े मंच हैं और फिरंगी हुकूमत इसी एकता से सबसे ज्यादा थर्राती है।
आगे चलकर 1923-24 में जब गुरुद्वारों के भ्रष्ट महंतों और ब्रिटिश शह के खिलाफ अकाली दल का ‘जैतो मोर्चा’ आंदोलन शुरू हुआ, तो युवा भगत सिंह ने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेज सरकार ने अकाली जत्थों को भोजन और पानी देने पर धारा 144 लगाकर प्रतिबंध लगा दिया था। भगत सिंह ने अपने गांव के युवाओं को संगठित कर गुप्त रूप से एक विशाल ‘लंगर’ (सिखों की पारंपरिक रसोइया) सेवा शुरू की और अकाली सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था की। यह आध्यात्मिक आतिथ्य की परंपरा को अंग्रेजी कानूनों के खिलाफ एक सफल लॉजिस्टिक रसद-लाइन में बदलने का अनूठा राजनीतिक उदाहरण था। अकाली सत्याग्रहियों को लंगर के जरिए रसद पहुंचाने की इस गुप्त रणनीति का प्रामाणिक विवरण पंजाब के वरिष्ठ क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट नेता सोहन सिंह जोश के संस्मरण ‘माई मीटिंग्स विद भगत सिंह एंड अदर अर्ली रिवोल्यूशनरीज़’ में मिलता है।
भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों का त्योहारों के साथ सीधे जुड़ने का एक और चर्चित प्रकरण अक्टूबर 1926 का लाहौर दशहरा बमकांड था। बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक दशहरा मेले में हजारों हिंदू और मुस्लिम एकत्र थे। वहां एक अनपेक्षित बम विस्फोट में बारह नागरिक मारे गए। ब्रिटिश पुलिस और सीआईडी ने इस घटना का फायदा उठाकर मई 1927 में भगत सिंह को बिना किसी ठोस साक्ष्य के गिरफ्तार कर लिया और उन पर साठ हजार रुपये की भारी जमानत राशि थोप दी।
प्रख्यात विधिवेत्ता और शोधकर्ता ए.जी. नूरानी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द ट्रायल ऑफ भगत सिंह: पॉलिटिक्स ऑफ जस्टिस’ में उजागर किया है कि लाहौर पुलिस ने चन्नादीन नामक एक अपराधी को रिश्वत देकर वह विस्फोट करवाया था ताकि ‘नौजवान भारत सभा’ जैसे उभरते प्रगतिशील युवा संगठन को बदनाम किया जा सके और भगत सिंह को सांप्रदायिक दंगों में फंसाया जा सके। लगभग पांच सप्ताह जेल में बिताने के बाद भगत सिंह जमानत पर रिहा हुए। इस घटना ने भगत सिंह को यह सबक दिया कि कैसे ब्रिटिश हुकूमत भारत के धार्मिक त्योहारों का इस्तेमाल सांप्रदायिक विद्वेष भड़काने और क्रांतिकारियों के दमन के लिए करती है।
त्योहारों के इस सांप्रदायीकरण के विरोध में भगत सिंह ने अपनी कलम को ही ढाल बनाया। कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के राष्ट्रीय पत्र ‘प्रताप’ में काम करते हुए भगत सिंह ने छद्म नाम ‘बलवंत सिंह’ से 15 मार्च 1926 को एक अत्यंत मार्मिक लेख लिखा, जिसका शीर्षक था-‘होली के दिन रकत के छीटके’। इस आलेख में उन्होंने होली के रंगों की तुलना क्रांतिकारियों के खून से की। उन्होंने देशवासियों की उदासीनता पर प्रहार करते हुए लिखा कि जब पूरा देश रंगों के उत्सव में डूबा है, तब लाहौर सेंट्रल जेल में किश्न सिंह गढ़गज्ज, संता सिंह, दिलीप सिंह, नंद सिंह, करम सिंह और धर्म सिंह-इन छह बीर बब्बर अकाली क्रांतिकारियों के शव फांसी के फंदे से उतारे जा रहे हैं। उन्होंने होली के त्योहार को संकीर्ण धार्मिकता से बाहर निकालकर सर्वोच्च बलिदान को एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में स्थापित कर दिया।
मार्च 1926 में भगत सिंह द्वारा स्थापित ‘नौजवान भारत सभा’ भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक अत्यंत क्रांतिकारी कदम था। भगत सिंह ने देखा कि पारंपरिक राजनीतिक दल जनता को केवल धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से लामबंद करने का प्रयास कर रहे हैं, जो अंततः देश को विभाजन की ओर धकेल रहा है। इसके तोड़ के रूप में नौजवान भारत सभा ने गांवों के पारंपरिक मेलों और त्योहारों के मैदानों को वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष प्रचार का मंच बनाना शुरू किया। पंजाब के ग्रामीण मेलों में सभा के कार्यकर्ता ‘मैजिक लालटेन’ (स्लाइड प्रोजेक्टर) के माध्यम से दुनिया भर के स्वतंत्रता संग्रामों और भारतीय शहीदों के चित्रों का प्रदर्शन करते थे। इसके साथ ही, होली और ईद जैसे पर्वों पर नौजवान भारत सभा सहभोजों का आयोजन करती थी, जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और तथाकथित अछूत (दलित) युवा एक साथ बैठकर भोजन करते थे। समाज से छुआछूत का कलंक मिटाने के लिए भगत सिंह ने होली को एक समतावादी, समाजवादी उत्सव में बदल दिया। इस अभिनव सामाजिक और राजनीतिक प्रयोग की भूरि-भूरि प्रशंसा प्रख्यात इतिहासकार कुलदीप नैयर ने अपनी शोध पुस्तक ‘द मार्टर: भगत सिंह – एक्सपेरिमेंट्स इन रिवोल्यूशन’ में की है।
साथ ही, उन्होंने पारंपरिक धार्मिक त्योहारों के समांतर एक नया ‘क्रांतिकारी कैलेंडर’ तैयार किया। नौजवान भारत सभा ने 10 मई को ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के स्मृति दिवस’ के रूप में मनाना शुरू किया। 13 सितंबर 1929 को जब लाहौर जेल में 63 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल के बाद जतिन दास शहीद हुए, तो उनका अंतिम संस्कार जुलूस भारत के इतिहास का एक विशाल नागरिक जन-उत्सव बन गया। लाखों लोगों का वह शोक-जुलूस दुर्गा पूजा या मुहर्रम की भीड़ को भी पीछे छोड़ देने वाला एक पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष जन-सैलाब था।
वामपंथी इतिहासकारों द्वारा भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों को एक संकीर्ण वैचारिक दायरे में सीमित करने का कुप्रयास उस समय पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है जब हम स्वयं शहीद द्वारा लिखे गए पत्रों और लेखों का तटस्थ अध्ययन करते हैं। विशेष रूप से, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के अमर गीत ‘वंदे मातरम’ के प्रति भगत सिंह का अगाध सम्मान और अपने व्यक्तिगत जीवन में इस नारे का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि वे भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जड़ों से कभी अलग नहीं हुए थे। उनके विचार-प्रवाह के इस पक्ष को वामपंथी इतिहासकारों ने बड़ी चतुराई से छिपाने का प्रयास किया है।
इसका सबसे अकाट्य प्रमाण 16 मई 1925 को कोलकाता के प्रसिद्ध हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र ‘मतवाला’ में प्रकाशित एक लेख में मिलता है। ‘मतवाला’ अपने समय का एक अत्यंत प्रभावशाली राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक मंच था, जिससे महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ भी गहरे जुड़े हुए थे। इस पत्रिका में भगत सिंह ने ‘बलवंत सिंह’ छद्म नाम से ‘युवक’ शीर्षक से एक अत्यंत ओजस्वी और प्रेरणादायक आलेख लिखा। इस निबंध में बंगाल के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और पंजाब की युवा शक्ति का अद्भुत मेल दिखाई देता है। युवकों के कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए और मातृभूमि की मुक्ति के लिए सर्वस्व न्योछावर करने का आह्वान करते हुए भगत सिंह ने आलेख के अंत में एक प्रचंड राष्ट्रीय हुंकार भरी। उन्होंने देश के युवाओं को ललकारते हुए लिखा: “उच्चारित करो – वंदे मातरम!” इस रचना के ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए वरिष्ठ शोधकर्ता वीरेंद्र सिसौदिया अपनी पुस्तक ‘मतवाला और हिंदी नवजागरण’ में लिखते हैं कि बलवंत सिंह नाम से लिखा गया यह आलेख प्रमाणित करता है कि भगत सिंह के शुरुआती क्रांतिकारी राष्ट्रवाद पर बंगाल के ‘वंदे मातरम’ नारे और ऋषि बंकिम चंद्र के राष्ट्रीय पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था।
दूसरा ऐतिहासिक दस्तावेज़ और भी अधिक व्यक्तिगत और भावुक है, जो भगत सिंह के पारिवारिक संस्कारों और राष्ट्रीय पहचान के सुंदर सामंजस्य को उजागर करता है। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में सांकेतिक बम फेंकने के बाद भगत सिंह गिरफ्तार कर लिए गए। मुकदमों का दौर शुरू हुआ। असेंबली बमकांड के ठीक अठारह दिन बाद, 26 अप्रैल 1929 को उन्होंने दिल्ली जेल से अपने पिता सरदार किशन सिंह को एक अत्यंत महत्वपूर्ण पत्र लिखा। इस पत्र का अंग्रेजी अनुवाद इतिहास के प्रोफेसर चमन लाल द्वारा संपादित प्रामाणिक ग्रंथ ‘द भगत सिंह रीडर’ में संकलित है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस पत्र की शुरुआत ही जिन शब्दों से हुई थी, वे थे-“वंदे मातरम।” एक पुत्र ने अपने क्रांतिकारी पिता को देश के सबसे पावन राष्ट्रीय नारे के साथ प्रणाम किया था। फांसी के फंदे के साये में जेल की कोठरी से लिखे गए इस पत्र से स्पष्ट होता है कि भगत सिंह के लिए “वंदे मातरम” केवल कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्र-भक्ति और आदर का एक अटूट सांस्कृतिक पर्याय था।
जब भगत सिंह अपनी स्वतंत्र क्रांतिकारी चेतना से भारत की धरा को आंदोलित कर रहे थे, तब नवगठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) उनके प्रति एक अत्यंत संकीर्ण और शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण रखे हुए थी। 1925 में कानपुर में गठित यह पार्टी पूरी तरह मॉस्को के ‘कॉमिन्टर्न’ (कम्युनिस्ट इंटरनेशनल) के इशारों पर संचालित होती थी। 1928 में मॉस्को में कॉमिन्टर्न की छठी कांग्रेस में तय की गई औपनिवेशिक नीति के अनुसार, भारतीय कम्युनिस्टों को निर्देश दिया गया था कि वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर हमला करें और किसी भी सशस्त्र क्रांतिकारी धारा को ‘पेट्टी-बुर्जुआ उग्रवाद’ कहकर खारिज करें।
कॉमिन्टर्न के विचारक ऑटो कुसिनन ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि भारतीय कम्युनिस्टों का कर्तव्य भारत के सशस्त्र क्रांतिकारियों का नकाब उतारना है। इस फरमान के तहत भारतीय कम्युनिस्टों ने भगत सिंह और उनकी संस्था ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (एचएसआरए) के सशस्त्र प्रतिरोध पर भीषण हमले शुरू कर दिए, और उनके आंदोलन को ‘व्यक्तिगत आतंकवाद’ तथा ‘प्रतिशोध की मानसिकता’ करार दिया। इसका सबसे शर्मनाक ऐतिहासिक दस्तावेज़ 13 नवंबर 1930 को कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘वर्कर्स वीकली’ में प्रकाशित एक लंबा संपादकीय है, जिसका शीर्षक था—’लाहौर: द सिनोश्योर ऑफ द पेट्टी बुर्जुआ’। जब भगत सिंह लाहौर जेल में मौत का इंतजार कर रहे थे, तब यह कम्युनिस्ट मुखपत्र उनके सर्वोच्च बलिदान का मखौल उड़ाते हुए लिख रहा था कि यह कोई क्रांति नहीं, बल्कि ‘प्रतिशोध की उथली राजनीति’ है। कम्युनिस्टों की नजर में यह सशस्त्र प्रतिरोध केवल मध्यवर्गीय युवकों का दुस्साहस था जो मजदूर वर्ग के आंदोलन को नुकसान पहुंचा रहा था। यहां तक कि दिसंबर 1951 में कोलकाता में आयोजित सीपीआई के विशेष सम्मेलन में स्वीकृत ‘टेक्निकल लाइन’ दस्तावेज़ में भी भगत सिंह के क्रांतिकारी रास्तों को ‘मार्क्सवाद-विरोधी और हानिकारक’ कहकर पुनः निंदित किया गया।
कम्युनिस्टों का यह हमला केवल सैद्धांतिक आलोचना तक सीमित नहीं रहा; यह व्यक्तिगत अपमान और चरित्र-हनन के स्तर तक गिर गया। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के संस्थापकों में से एक, मुजफ्फर अहमद ने काकोरी षड़यंत्र केस की सुनवाई के दौरान अदालत में खड़े होकर भगत सिंह और उनके साथियों की कटु आलोचना की थी। अपने अदालती बयान में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था: “सभी क्रांतिकारी भले ही आतंकवादियों के त्याग की प्रशंसा करें, लेकिन क्या आतंकवादियों को क्रांतिकारी कहा जा सकता है? मैं कतई नहीं कहूंगा-वे क्रांतिकारी नहीं हैं।” एक ब्रिटिश औपबंधिक अदालत के रिकॉर्ड में देश के महानतम शहीदों को ‘आतंकवादी’ घोषित करना भारतीय क्रांति-परंपरा का घोर अपमान था, जिसने परोक्ष रूप से ब्रिटिश शासन के दमनचक्र को ही सही ठहराया। मुजफ्फर अहमद के इस विवादित बयान का मूल पाठ कोलकाता के नेशनल बुक एजेंसी द्वारा प्रकाशित संकलित ग्रंथ ‘कम्युनिस्ट चैलेंज टू इम्पीरियलिज्म फ्रॉम द डॉक’ में दर्ज है, जो क्रांतिकारियों के प्रति कम्युनिस्टों के कटु रवैये का अकाट्य प्रमाण है।
इससे भी बड़ा ऐतिहासिक विश्वासघात भगत सिंह के ही कुछ उन सहयोगियों ने किया जो बाद में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। इनमें सबसे प्रमुख नाम शिव वर्मा का था। एचएसआरए में भगत सिंह के साथ काम कर चुके शिव वर्मा ने जेल से छूटने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी में अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए अपने पूर्व मृत साथियों के बलिदान को नीचा दिखाने हेतु एक कुत्सित सैद्धांतिक शब्द गढ़ा—’टेरो-कम्युनिज़्म’ (आतंकवादी-कम्युनिज़्म)। अपने शहीद साथियों के त्याग को कमतर बताने और मॉस्को के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया गया, जिसे बाद में भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने भगत सिंह के विचारों को हल्का करने के लिए अपने शोध पत्रों में बार-बार भुनाया।
किंतु इतिहास की विडंबना देखिए! जब 20 मार्च 1929 को ब्रिटिश सरकार ने ‘मेरठ षड़यंत्र केस’ बनाकर 32 कम्युनिस्ट और ट्रेड यूनियन नेताओं को गिरफ्तार किया, तो उनके समर्थन में और अंग्रेजों के काले कानूनों (पब्लिक सेफ्टी बिल व ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल) के विरोध में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में बम फेंका था। उन्होंने अदालत में गर्व से कहा था कि उन्होंने यह बम कम्युनिस्ट मजदूर नेताओं की अन्यायपूर्ण गिरफ्तारी के विरोध में फेंका है। यानी भगत सिंह ने कम्युनिस्टों के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, जबकि कम्युनिस्टों ने जेल में बंद भगत सिंह को ‘सिरफिरा हत्यारा’ और ‘प्रतिशोध का पुतला’ कहकर लांछित किया। कम्युनिस्टों ने मेरठ केस के आरोपियों के लिए देशव्यापी विधिक व प्रचार अभियान चलाया, परंतु भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी रोकने के लिए एक उंगली तक नहीं उठाई, क्योंकि कॉमिन्टर्न की नजर में वे सैद्धांतिक रूप से ‘अशुद्ध’ थे।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के पश्चात, और विशेष रूप से 1950 के दशक की शुरुआत में जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का राजनीतिक जनाधार खिसकने लगा, तो उन्होंने अपनी रणनीति रातों-रात बदल ली। दिसंबर 1950 में सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन के गुप्त निर्देशों के बाद कॉमिन्टर्न ने भारतीय कम्युनिस्टों को आदेश दिया कि वे भारत की आजादी को स्वीकार करें और अपना अस्तित्व बचाने के लिए देश के स्थानीय क्रांतिकारी प्रतीकों से खुद को जोड़ें। स्टालिन के इस फरमान के बाद सीपीआई ने भगत सिंह की लोकप्रियता को भुनाने के लिए एक शर्मनाक ‘यू-टर्न’ लिया।
जिन्होंने भगत सिंह को जीवनभर ‘आतंकवादी’ और ‘भटके हुए युवक’ कहा था, वे ही अब उन्हें अपना ‘सैद्धांतिक पूर्वज’ सिद्ध करने की होड़ में लग गए। इस वैचारिक डकैती के मुख्य सूत्रधार थे भगत सिंह के पूर्व साथी और बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने अजय घोष। अजय घोष ने अपने 1945 के संस्मरण ‘भगत सिंह एंड हिज कॉमरेड्स’ में लिखा था कि भगत सिंह को मार्क्सवादी कहना एक ऐतिहासिक अतिशयोक्ति होगी। परंतु 1953 में पार्टी महासचिव बनते ही उन्होंने कम्युनिस्ट लेखक जी.एम. तेलंग (छद्म नाम गोपाल ठाकुर) से ‘भगत सिंह: द मैन एंड हिज आइडियाज़’ नामक पुस्तक लिखवाई, जिसे पीपल्स पब्लिशिंग हाउस ने छापा। इस पुस्तक में भगत सिंह के जीवन और विचारों को पूरी तरह मरोड़कर सोवियत मार्क्सवादी सांचे में ढाल दिया गया। अजय घोष के 1945 के संस्मरण और 1953 की इस प्रचार पुस्तिका का तुलनात्मक अध्ययन कम्युनिस्टों के इस अवसरवादी यू-टर्न की पोल खोल देता है।
इसके बाद सोवियत विद्वान मित्रोखिन की तीन पुस्तकों—’एवरेस्ट अमंग मेन’ (1969), ‘लेनिन इन इंडिया’ (1981) और ‘लेनिन एंड इंडियन फ्रीडम फाइटर्स’ (1988)—के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भगत सिंह पर लाल रंग चढ़ाने का काम पूरा किया गया। शिव वर्मा, जिन्होंने भगत सिंह की फांसी के बाद उनके रास्ते को ‘टेरो-कम्युनिज़्म’ कहा था, उन्होंने भी 1986 में ‘सेलेक्टेड राइटिंग्स ऑफ शहीद भगत सिंह’ का संपादन करते हुए दावा ठोक दिया कि भगत सिंह अपनी मृत्यु से ठीक पहले पूरी तरह कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा में दीक्षित हो चुके थे।
यहां तक कि वामपंथी उग्रवादी दल सीपीआई (एमएल) के मुखपत्र ‘लिबरेशन’ ने अक्टूबर 2006 के अंक में यह दुस्साहस करते हुए लिखा कि “केवल क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को ही भगत सिंह की विरासत पर दावा करने का अधिकार है।” जिस पार्टी के वैचारिक पूर्वज भगत सिंह की फांसी के समय मूकदर्शक बने रहे, आज वही पार्टी भारत के अन्य सभी राजनीतिक दलों को भगत सिंह की याद मनाने से रोकने का फतवा जारी कर रही है।
कम्युनिस्टों द्वारा भगत सिंह का यह अनादर केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रहा; इसे भारत की शिक्षा प्रणाली और विश्वविद्यालयों के इतिहास पाठ्यक्रमों में बहुत सुनियोजित तरीके से जहर की तरह घोला गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) और दिल्ली विश्वविद्यालय के वामपंथी इतिहासकारों के सिंडिकेट ने भारतीय युवाओं के मन से भगत सिंह के वास्तविक राष्ट्रभक्ति के आदर्शों को मिटाने के लिए एक सुनियोजित बौद्धिक षड़यंत्र रचा।
इस षड्यंत्र का मुख्य स्तंभ 1988 में प्रकाशित पुस्तक ‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस’ थी, जिसके लेखक बिपान चंद्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, के.एन. पणिक्कर और सुचेता महाजन थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में संदर्भ पुस्तक के रूप में शामिल इस पुस्तक के बीसवें अध्याय में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सूर्य सेन (मास्टरदा) जैसे अमर नायकों को बार-बार ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ (Revolutionary Terrorist) कहकर संबोधित किया गया। यहां तक कि चटगांव शस्त्रागार छापे और लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए सांडर्स वध की घटना को ‘आतंकवादी कार्रवाई’ करार दिया गया। बिपान चंद्र और उनके साथी इतिहासकारों द्वारा लिखित इस पुस्तक के बीसवें अध्याय का एक-एक वाक्य भारतीय क्रांतिकारियों के प्रति मार्क्सवादी इतिहासकारों की कुंठा को उजागर करता है।
2016 में भगत सिंह के परिजनों ने इस अपमानजनक शब्दावली के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई। भगत सिंह के भतीजे अभय सिंह संधू ने दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय को कड़ा पत्र लिखकर कहा: “जिस ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह को फांसी दी थी, उसने भी अपने फैसले में उन्हें ‘सच्चा क्रांतिकारी’ माना था और कहीं ‘आतंकवादी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया था। किंतु स्वतंत्र भारत के वामपंथी इतिहासकार अपने ही देश के नायकों को आतंकवादी बताकर भावी पीढ़ियों के मन में विष घोल रहे हैं।” राज्यसभा में भी इस मुद्दे पर जोरदार हंगामा हुआ। भारी जनाक्रोश के दबाव में आकर अंततः दिल्ली विश्वविद्यालय को इस पुस्तक को प्रतिबंधित करना पड़ा।
कम्युनिस्टों का यह दोहरा चरित्र तब और हास्यास्पद हो जाता है जब एक तरफ मार्क्सवादी इतिहासकार भगत सिंह को ‘आतंकवादी’ लिखने में संकोच नहीं करते, वहीं दूसरी तरफ वे सोवियत संघ में लाखों निर्दोषों के हत्यारे जोसेफ स्टालिन को अपनी विचारधारा का मसीहा मानकर पूजते हैं। इतना ही नहीं, जुलाई 2015 में पश्चिम बंगाल के विद्यासागर विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रश्नपत्र में और जम्मू विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के व्याख्यान में भगत सिंह को ‘आतंकवादी’ कहे जाने की घटनाएं यह साबित करती हैं कि वामपंथियों द्वारा बोया गया यह विषैला बीज भारतीय शिक्षा क्षेत्र में कितनी गहराई तक धंसा हुआ है। दिसंबर 2005 में लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका में भी भगत सिंह को “सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाला आतंकवादी” चित्रित किया गया था, जिस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी गहरा क्षोभ व्यक्त किया था।
भगत सिंह के जीवन और भारत के सांस्कृतिक पर्वों के जुड़ाव की गाथा आज एक अमर सत्य बन चुकी है। जिस नास्तिक क्रांतिकारी ने बाहरी धार्मिक आडंबरों को दरकिनार कर त्योहारों को जन-समरसता और क्रांति का माध्यम बनाया, इतिहास ने आज उन्हें राष्ट्रीय अखंडता के एक महान राष्ट्र-नायक के रूप में स्थापित कर दिया है। 23 मार्च 1931 को फांसी के बाद अंग्रेज पुलिस ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शवों को गुप्त रूप से फिरोजपुर के हुसैनीवाला में सतलुज नदी के तट पर जला दिया था। आज हर साल 23 मार्च को उस समाधि स्थल पर जुटने वाला लाखों लोगों का ‘शहीदी मेला’ भारत के किसी भी विशाल धार्मिक पर्व के वैभव को पीछे छोड़ देता है। यह इतिहास का एक अद्भुत न्याय है-जिस व्यक्ति ने खुद को नास्तिक कहा था, भारत की जनता ने आज उसी की समाधि को एक पवित्र राष्ट्रीय तीर्थ में बदल दिया है।
दूसरी ओर, जिन कम्युनिस्ट दलों ने भगत सिंह को जीवनकाल में त्यागा, अपशब्द कहे और उनकी मृत्यु के बाद उन्हें धोखे से मार्क्सवादी सांचे में ढालने की कोशिश की, वे आज भारत की राजनीति में अप्रासंगिक और हाशिये पर चले गए हैं। भगत सिंह ने अपने 23 वर्षों के जीवन में जो नैतिक ऊंचाई और जन-प्रियता हासिल की, कम्युनिस्ट एक सदी का आंदोलन चलाकर भी उसका एक अंश प्राप्त नहीं कर सके। प्रख्यात नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी 1935 की कालजयी पुस्तक ‘द इंडियन स्ट्रगल’ में कराची कांग्रेस के संदर्भ में लिखा था कि उस समय भगत सिंह की लोकप्रियता का ज्वार इतना ऊंचा था कि वह महात्मा गांधी की लोकप्रियता के समकक्ष आ खड़ा हुआ था। यह अंतिम सत्य प्रमाणित करता है कि भगत सिंह किसी संकीर्ण राजनीतिक दल की बपौती नहीं हैं; वे किसी वामपंथी वैचारिक दीवारों के कैदी नहीं हैं। वे मां भारती के अमर सपूत हैं, जिनके हृदय में “वंदे मातरम” था और अधरों पर “इंकलाब जिंदाबाद”।