यह श्लोक संस्कृत के पारंपरिक सुभाषित-संग्रह (नीति-साहित्य) से लिया गया है। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों की व्यक्तिगत क्षमताओं और सांगठनिक शक्ति (टीम-वर्क) के महत्व का तुलनात्मक वर्णन किया गया है।
श्लोक :
विदुषां शास्त्रतः शक्तिः वीराणां सा च शस्त्रतः।
घनश्रमादितोऽन्येषां शक्तिः सर्वस्य संघतः॥
भावार्थ :
विद्वान लोग शास्त्रों से. जिस शक्ति को प्राप्त करते हैं, वीरों को वह शक्ति शस्त्रों द्वारा मिलती है (अन्य) लोग धन और श्रम से शक्ति को प्राप्त करते हैं, परन्तु संगठन द्वारा यह सभी शक्तियां सबको प्राप्त होती हैं।
आज के युग में प्रासंगिकता :
कॉर्पोरेट जगत और टीम-वर्क : आज के समय में किसी भी सफल कंपनी या प्रोजेक्ट में अलग-अलग विधाओं के विशेषज्ञों की जरूरत होती है। डेटा साइंटिस्ट और रिसर्चर्स, रणनीति बनाने वाले लीडर्स, फाइनेंस और ऑपरेशन्स टीम जब एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो कंपनी हर क्षेत्र में सफलता हासिल करती है।
बहुआयामी राष्ट्रीय विकास : एक मजबूत राष्ट्र के निर्माण के लिए केवल सेना (शस्त्र), केवल थिंक-टैंक/वैज्ञानिक (शास्त्र) या केवल उद्योगपति व मजदूर (धन व श्रम) काफी नहीं हैं। जब ये सभी घटक एक राष्ट्रीय संगठन/एकता के सूत्र में पिरोए जाते हैं, तभी देश सर्वशक्तिमान और आत्मनिर्भर बनता है।
वैश्विक मंच और बहुपक्षीय नीतियां : वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया भर के विशेषज्ञों, निवेशकों और प्रशासकों को एकजुट होना पड़ता है। श्लोक दर्शाता है कि संगठन के माध्यम से ज्ञान, शक्ति और संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग संभव होता है।
सामूहिक समस्या-समाधान : व्यक्तिगत स्तर पर किसी के पास ज्ञान हो सकता है तो किसी के पास संसाधन, लेकिन जब समाज या संस्था के रूप में लोग संगठित होते हैं, तो हर व्यक्ति को एक-दूसरे की शक्तियों का लाभ मिलता है।


















