राजनीति में विपक्ष का काम है सरकार को कटघरे में खड़ा करना. नीतियों पर सवाल उठाना. जनता के सामने बेहतर विकल्प रखना. लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी की राजनीति विपक्ष की मर्यादाओं से बहुत आगे निकल गई है. उनकी विरोध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी तक सीमित नहीं रह गया है. खुद उनके शब्दों में उनकी लड़ाई “भारत राष्ट्र (इंडियन स्टेट)” से है, जो अब साफ नजर आती है. मामला अब उनके बयानों, भाषणों को लेकर बनने वाले मीम्स से आगे निकल चुका है.
लगातार चुनावी हार की हताशा में मानो उन्होंने राष्ट्रीय अखंडता के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ दिया है. वह सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर उतारू हैं. विदेशी धरती से भारत की संप्रभुता पर हमला करते हैं. जातीय और क्षेत्रीय विद्वेष भड़काने का काम करते हैं. इसी क्रम में अब वह उत्तराखंड में हल्द्वानी में हाथ जला बैठे हैं. हर मसले को जातीय रंग देकर आग लगाने की कोशिश में उनके खिलाफ अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारक अधिनियम की विभिन्न धाराओं में रिपोर्ट दर्ज हो गई है. अब समय आ गया है कि राहुल गांधी की पूरी राजनीति को समग्रता में देखना होगा. हमें हल्द्वानी के साथ लंदन के कैंब्रिज से लेकर बीजिंग के कम्युनिस्ट पार्टी हेडक्वार्टर तक फैले उनके राष्ट्रविरोधी जाल को समझना होगा. एजेंडा सामाजिक न्याय नहीं, सामाजिक विखंडन है. लेकिन अब देश और समाज इसका जवाब देने की ठान चुका है. क्या राहुल गांधी की विध्वंसकारी राजनीति को इस देश की जनता के जवाब की शुरुआत हल्द्वानी से हो चुकी है.
बात शुरू होती है 8 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के रामलीला ग्राउंड में हुई कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली से. इस रैली में खड़गे ने तमाम आरोप लगाए. कुछ ऐसी बातें भी कथित तौर पर हुई, जिनकी स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया हुई. इसके तीन दिन बाद यानी 11 अगस्त को उसी मैदान पर कुछ लोगों द्वारा एक ‘शुद्धिकरण यज्ञ’ और सफाई अभियान चलाया गया. इस पूरे कार्य में हल्द्वानी के वाल्मीकि समाज के लोग मुख्य रूप से शामिल थे. राहुल गांधी ने अपने एजेंडा के अनुसार इसे जातीय रंग देने की कोशिश की. 29 अगस्त को उन्होंने दिल्ली में एक प्रेस कान्फ्रेंस करके कहा कि खड़गे दलित हैं और इसलिए ये शुद्धिकरण किया गया. उन्होंने इसे दलितों का अपमान और छुआछूत करार दिया. उन्होंने मांग की कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर एससी-एसटी एक्ट में रिपोर्ट दर्ज की जाए.
राहुल गांधी के इस बयान का सबसे कड़ा विरोध स्थानीय वाल्मीकि समाज ने किया. वाल्मीकि समाज के युवाओं ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि वहां मल्लिकार्जुन खड़गे का कोई विरोध नहीं था और न ही छुआछूत जैसी कोई भावना थी. यह उनकी दैनिक स्वच्छता और धार्मिक दिनचर्या का एक हिस्सा था. राहुल गांधी ने उनके पवित्र धार्मिक कार्य को राजनीतिक हथियार बनाकर पूरे वाल्मीकि समाज को अपमानित करने का काम किया है. वाल्मीकि समाज के स्थानीय प्रतिनिधि अमित कुमार ने हल्द्वानी थाने में राहुल गांधी के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने मामले की संवेदनशीलता, सामाजिक शांति भंग करने के प्रयास और झूठे तथ्यों के आधार पर विद्वेष भड़काने के जुर्म में राहुल गांधी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 (विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना), धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की. राहुल गांधी जिस दाव में उत्तराखंड की राज्य सरकार और भाजपा को फंसाने चले थे, उसी में फंस गए.
हल्द्वानी का प्रकरण तो खैर उलटा पड़ गया, लेकिन राहुल गांधी का प्रयास जातीय आग लगाने का ही था. यदि राहुल गांधी के पिछले कुछ समय के भाषणों, बयानों और दौरों का सिलसिलेवार विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ हो जाता है कि वे भारत के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के लिए एक गहरी साजिश पर काम कर रहे हैं. कभी दलित, कभी पिछड़े (ओबीसी), तो कभी आदिवासी (एसटी) और महिलाओं के नाम पर वह ऐसे बयान दे रहे हैं, जिससे जातीय संघर्ष की स्थिति बनाई जा सके.
चाय की दुकानों पर ‘कप-भेदभाव
राहुल गांधी अपने इस प्रयास में तर्क की सीमा को लांघकर हास्यास्पद स्थिति तक जा पहुंचे हैं. 29 अगस्त को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने सामाजिक विषमता का ऐसा काल्पनिक विवरण प्रस्तुत किया, जिस पर सिर्फ हंसा जा सकता है. लेकिन बात हास्य भर की नहीं. बात नीयत की है. उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के गांवों और कस्बों में आज भी चाय की दुकानों पर दो अलग-अलग तरह के कप रखे जाते हैं—एक कांच का कप और दूसरा डिस्पोजेबल पेपर कप. सामान्य वर्ग के लोगों को कांच के कप में चाय दी जाती है, जबकि दलितों को डिस्पोजेबल पेपर कप में चाय दी जाती है. यह छुआछूत है. उन्होंने यह भी दावा किया कि गांवों में आज भी दलितों को आम कुओं से पानी नहीं लेने दिया जाता और दलित दूल्हों को शादी में हेलमेट पहनकर निकलना पड़ता है. यह तो सबको पता है कि राहुल गांधी धरातल की सच्चाई से कटे हुए हैं. लेकिन उनके इन काल्पनिक दावों व आरोपों को सिर्फ उनकी नासमझी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता. इसके पीछे की मंशा और पैटर्न को समझना होगा.
भारतीय परिवार व्यवस्था पर सीधा आघात
22 अगस्त 2026 को पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी ने भारतीय सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पारिवारिक मूल्यों पर सीधा हमला बोला. उन्होंने युवाओं के सामने मनुस्मृति और भारतीय पारिवारिक परंपराओं को निशाना बनाते हुए कहा कि मनुस्मृति की सोच महिलाओं को पूरी जिंदगी गुलाम बनाकर रखने की सोच है. उसमें लिखा है कि महिला बचपन में पिता के, युवावस्था में पति के और बुढ़ापे में बेटे के नियंत्रण में रहे. उन्होंने इसे घटिया और शोषक ढांचा बताते हुए पितृसत्ता पर प्रहार का नारा दिया. उन्होंने कहा कि महिलाओं को यह समझना होगा कि वे किसी पिता, पति या पुत्र की संपत्ति नहीं हैं. राहुल गांधी ने यह नहीं बताया कि हिंदू समाज कहां और कब मनु स्मृति के नियमों पर चल रहा है. साथ ही उनका परिवार बोध पश्चिम के टूटे व बिखरे हुए परिवारों से प्रभावित है, यह भी उनके इस दावे के साथ सार्वजनिक हो गया. इसके साथ ही इस पैटर्न पर आपको गौर करना होगा कि राहुल गांधी मूल रूप से हिंदू मान्यताओं, परिवारों व सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं. क्योंकि इसी कार्यक्रम में मुसलिम महिलाओं से बातचीत में हिजाब को उन्होंने उनकी पसंद करार दिया. भारतीय परिवारों के लिए ये दोहरे मानक उनके वामपंथी मार्गदर्शक मंडल उपज व रणनीति का ही हिस्सा है.
राहुल गांधी को न तो ये समझ है और न ही वह कभी समझेंगे कि भारतीय संस्कृति में परिवार एक सुरक्षा चक्र और भावनात्मक आश्रय स्थल रहा है. जहां पिता का संरक्षण, पति का सहचर्य और पुत्र का दायित्व परिवार की अखंडता को बनाए रखता है. पश्चिमी ‘रेडिकल फेमिनिज्म’ के विभाजनकारी मॉडल को भारतीय संदर्भ पर थोपते हुए राहुल गांधी ने पिता-पुत्री, पति-पत्नी और मां-बेटे के पवित्र संबंधों को ‘शोषक’ करार दिया. मनुवाद का डर दिखाकर वह भारतीय समाज के मूल आधार, परिवार प्रणाली को ही ध्वस्त कर देना चाहते हैं. इसके ध्वस्त हुए बिना समाज में स्थायी असंतोष और अराजकता की स्थिति बन ही नहीं सकती. प्रकारांतर में राहुल गांधी बेटियों को वह अपशब्द मॉडल अपनाने के लिए कह रहे हैं, जो हमने कुछ दिन पहले जंतर-मंतर पर देखा.
सामाजिक विभाजन का चश्मा
राहुल गांधी इस समय जो जातिवादी चश्मा लगाए हैं, उसमें उन्हें हर सार्वजनिक संस्था, व्यवसाय और सांस्कृतिक गतिविधियों में केवल एक ही विमर्श नजर आता है. ‘संविधान सम्मान सम्मेलन’ में उन्होंने कहा कि उन्होंने मिस इंडिया की प्रतियोगिता की सूची निकाली और उसमें देखा कि कोई दलित, आदिवासी या ओबीसी महिला शामिल है या नहीं. उनका दावा था कि उस सूची में 90 प्रतिशत आबादी का एक भी चेहरा नहीं मिला और देश की न्यायपालिका, कॉरपोरेट जगत, मीडिया और सुंदरता प्रतियोगिताओं तक में नब्बे प्रतिशत लोगों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. राहुल गांधी ने यह नहीं बताया कि आजादी के बाद साठ वर्ष के कांग्रेसी शासन के बावजूद ये स्थिति क्यों बनी हुई है. खुद कांग्रेस (यूपीए) सरकार के दस साल के कार्यकाल में उन्होंने इस दिशा में क्या पहल की. जाहिर है, वह जातीय दरारों को गहरा करना चाहते हैं. सामाजिक संघर्ष की स्थिति बनाकर वोटों की फसल काटना चाहते हैं.
बहुसंख्यक आस्था का निरंतर अनादर
राहुल गांधी का विभाजनकारी एजेंडा केवल जातियों को आपस में लड़ाने तक सीमित नहीं है. बात इससे कहीं आगे है. वह जातीय आधार बनाकर वार करते हैं और अपने समर्थकों सहयोगियों को सनातन धर्म और यहां तक कि भारत की मूल अवधारणा पर वार करने की सहमति व संरक्षण देते हैं. सितंबर 2023 में जब कांग्रेस के प्रमुख सहयोगी दल डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन ने सार्वजनिक मंच से बयान दिया कि “सनातन धर्म डेंगू, मलेरिया और कोरोना की तरह है, इसका केवल विरोध नहीं करना चाहिए बल्कि खत्म कर देना चाहिए”, तब राहुल गांधी ने इसका खंडन करने के स्थान पर पूर्ण मौन साध लिया. इसी प्रकार, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जब देशविरोधी नारे लगे, तो राहुल गांधी आधी रात को नारे लगाने वालों का साथ देने के लिए जेएनयू जा पहुंचे.
विभाजनकारी एजेंडे के पीछे की डोर
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राहुल गांधी अचानक इतने आक्रामक और आत्मघाती तरीके से भारतीय समाज और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार क्यों कर रहे हैं? इसका उत्तर घरेलू राजनीति के साथ-साथ उन अंतरराष्ट्रीय शक्तियों साजिशों में छिपा है, जो भारत के एक मजबूत, आत्मनिर्भर और वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरने से घबराई हुई हैं. राहुल गांधी के इस अभियान को समझने के लिए हमें विदेशी प्रेरणा, गुप्त समझौतों और संदिग्ध फंडिंग के नेटवर्क को समझना होगा. अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस खुले तौर पर भारत की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंकने का इरादा जता चुका है. उसने इसके लिए एक अरब डॉलर के वैश्विक फंड की घोषणा की थी. अब कड़ी पर गौर करें. राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में सलिल शेट्टी (एमनेस्टी इंटरनेशनल के पूर्व वैश्विक प्रमुख और सोरोस नेटवर्क से सीधे जुड़े व्यक्ति) और सुनीता विश्वनाथ (ओएसएफ समर्थित संगठनों की प्रमुख) जैसे चेहरे राहुल गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते देखे गए.
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गुप्त समझौता
भारतीय राजनीति के इतिहास में यह अपनी तरह का अभूतपूर्व मामला है. एक भारतीय राजनीतिक दल ने शत्रुतापूर्ण रुख रखने वाले पड़ोसी देश की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी से लिखित समझौता किया. 7 अगस्त 2008 को बीजिंग में कांग्रेस की ओर से तत्कालीन महासचिव राहुल गांधी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से वांग जियारुई ने एक सहमति प्रारूप (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए. इस दौरान सोनिया गांधी और शी जिनपिंग स्वयं उपस्थित थे. इस समझौते की शर्तें आज तक देश के सामने उजागर नहीं की गई हैं. बात बस इतनी नहीं है. वर्ष 2005-2006 के दौरान ‘राजीव गांधी फाउंडेशन’ (जिसके ट्रस्टी राहुल गांधी और सोनिया गांधी हैं) ने भारत स्थित चीनी दूतावास से लाखों रुपये का सहायता प्राप्त की. संदिग्ध लेन-देन के चलते ही 2022 में गृह मंत्रालय को इसका एफसीआरए लाइसेंस रद कर दिया. 2017 के डोकलाम संकट के समय राहुल गांधी ने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई से बंद कमरे में गुप्त मुलाकात की. गलवान संघर्ष के बाद राहुल गांधी ने बयान दिया कि “चीन हमारे जवानों को पीट रहा है”. राहुल गांधी के इस बयान का चीनी मीडिया ने भारत विरोधी प्रोपेगैंडा के लिए खुलकर इस्तेमाल किया.
विदेशी दौरे और पश्चिमी देशों से हस्तक्षेप की गुहार
एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और विपक्षी नेता के रूप में राहुल गांधी का विदेशी दौरों को लेकर आचरण अत्यंत संदेहास्पद रहा है. संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, वर्ष 2015 से 2019 के बीच राहुल गांधी ने 500 से अधिक बार गुप्त विदेश यात्राएं की. ये यात्राएं सुरक्षा एजेंसियों को बिना सूचित किए, सुरक्षा कवर के बिना की गईं. मार्च 2023 में लंदन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में राहुल गांधी ने कहा था कि भारत में लोकतंत्र खत्म हो चुका है और अमेरिका व यूरोप जैसे देश इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. यह भारत के घरेलू मामलों में दखल के लिए अमेरिका और यूरोप को न्योते जैसा नहीं था क्या. इसके अलावा, तमाम भारत विरोधी जैसे लंदन में जेरेमी कार्बिन और अमेरिका इल्हान उमर से वह बंद कमरों में बैठक करते हैं, तो एजेंडा क्या होता है.
5. सैन्य बलों के शौर्य पर आघात
राहुल गांधी के इस विघटनकारी मॉडल का एक मुख्य निशाना भारत की सुरक्षा व्यवस्था के मनोबल को तोड़ना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख को समाप्त करना है. असल में दिमागी नक्सलियों की रणनीति यही है. संवैधानिक संस्थाओं को इतना कमजोर कर दो कि देश पर इनका नियंत्रण न रहे और अराजकता की स्थिति पैदा हो. भारतीय सेना द्वारा 2016 में की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राहुल गांधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पर “जवानों के खून की दलाली” करने का संगीन आरोप लगाया था. इसके पश्चात 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान भी उन्होंने वायु सेना द्वारा नष्ट किए गए आतंकवादी ठिकानों पर सवाल उठाते हुए “लाशों और सबूतों” की मांग की. राहुल गांधी के ये बयान पाकिस्तान में खूब वायरल हुए. अग्निवीर योजना को लेकर राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक रैलियों में तमाम ऐसा दुष्प्रचार किया, जिसका स्पष्टीकरण सेना को सामने आकर देना पड़ा. यह सीधे-सीधे भारतीय सेना में भर्ती की प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसा था. राफेल की खरीद पर सवाल उठाकर भारत की सैन्य क्षमता बढ़ाने की कोशिशों को पलीता लगाने की कोशिश करते हैं. चुनाव के नतीजे उनके मुताबिक नहीं आते, तो वह चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हैं. कभी ईवीएम को ब्लैक ब़ॉक्स बताते हैं, तो कभी वोट चोरी का प्रोपेगैंडा फैलाते हैं. न्यायपालिका पर जातीय हथियार से निशाना साधते हैं. संसद की कार्रवाई चलने नहीं देते. देश के संपत्ति सृजकों और बड़े उद्योगपतियों को चोर और लुटेरा बताकर व्यापार व निवेश का माहौल खराब करने की कोशिश करते हैं.
बड़ी करवट
उत्तराखंड के हल्द्वानी में जो एफआईआर हुई है, वह देश के हिंदू समाज में एक बड़ी करवट है. यह एफआईआर बस एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है. यह जनाक्रोश है, जो राहुल गांधी की देश की एकता और सामाजिक समरसता से खिलावाड़ की राजनीति के खिलाफ पैदा हो रहा है. बात बस लगातार चुनाव हारने की हताशा से भरे हुए एक विपक्षी राजनेता भर की नहीं है. दलित उत्पीड़न के झूठे शोर, चाय की दुकानों पर सामाजिक भेदभाव की मनगढ़ंत कहानियां, पितृसत्ता के नाम पर भारतीय परिवारों पर प्रहार, एक कालातीत ग्रंथ को लेकर पूरे हिंदू समाज को कटघरे में खड़े करने की षडयंत्रपूर्ण कोशिशों से अब ये देश आजिज आ चुका है. ये देश अब समझ रहा है कि बंद कमरे में चीन से समझौता और बाहर सेना पर सवाल उठाने का मकसद क्या हो सकता है. यह समाज समझ रहा है कि हर विदेश यात्रा के बाद एक नया नैरेटिव कहां से आ रहा है. एक बात तो समझनी होगी. यह नया भारत है. यह सिर्फ बाहरी दुश्मनों से ही घर में घुसकर निपटना नहीं जानता.
















