भोपाल में 'श्रम साधक संगम' का भव्य आयोजन: दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा- "श्रम साधकों के मजबूत होने से सुदृढ़ होगा समाज"
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भोपाल में ‘श्रम साधक संगम’ का भव्य आयोजन: दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा- “श्रम साधकों के मजबूत होने से सुदृढ़ होगा समाज”

भोपाल के रवीन्द्र भवन में संत रविदास जयंती पर 'श्रम साधक संगम' आयोजित। RSS सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा- "कर्म की महानता उसके बाहरी आवरण से नहीं, बल्कि उसे करने वाले व्यक्ति की पवित्र दृष्टि और समर्पण भाव से तय होती है"

Written byShivam DixitShivam Dixit
Sep 19, 2026, 09:39 pm IST
inभारत, संघ @100, मध्य प्रदेश
bhopal shram sadhak sangam dattatreya hosabale ravidas jayanti

भोपाल (मध्य प्रदेश)। समाज की वास्तविक ताकत उसके भौतिक संसाधनों से नहीं, बल्कि उसके प्रत्येक व्यक्ति की सक्रिय भागीदारी, श्रम और आपसी आत्मीयता से बनती है. जिस समाज में परिश्रम करने वाले हाथों को पूरा सम्मान मिलता है, कमजोर वर्गों को संबल प्राप्त होता है और हर बच्चे को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलते हैं, वही समाज अपने भविष्य को सर्वथा सुरक्षित और मजबूत कर सकता है.

इसी मूल भाव को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने भोपाल में आयोजित एक विशाल कार्यक्रम में कहा कि “श्रम साधक मजबूत होंगे तो समाज और भविष्य दोनों मजबूत होंगे।”

उन्होंने दो टूक कहा कि समाज में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि कर्म के प्रति अटूट निष्ठा, मन की पवित्रता और कर्तव्यबोध ही किसी व्यक्ति के कार्य को वास्तविक गरिमा प्रदान करते हैं.

bhopal shram sadhak sangam dattatreya hosabale ravidas jayanti

संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की 650वीं जयंती के पावन अवसर पर भोपाल के ऐतिहासिक रवीन्द्र भवन में विराट ‘श्रम साधक संगम’ का आयोजन किया गया, जिसमें एक हजार से अधिक विभिन्न क्षेत्रों के श्रम साधकों और प्रबुद्ध समाजजनों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की.

इस गरिमामय कार्यक्रम में मध्यभारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडेय, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले और भोपाल विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर मंच पर आसीन रहे.

इस दौरान भोपाल शहर में चलाए जा रहे ‘श्रम साधक मिलनों’ के अनुभव और उनके जरिए समाज में विकसित हो रहे संपर्क व आत्मीयता के प्रयासों का विस्तृत विवरण भी साझा किया गया.

52 प्रकार के श्रम से जुड़े लोगों तक पहुंच बनाने का अनूठा उपक्रम

कार्यक्रम में ‘श्रम साधक कार्य’ का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए विक्रम सिंह ने जानकारी दी कि समाज का कोई भी वर्ग आपसी संपर्क और संवाद से वंचित न छूट जाए, इसी दूरदर्शी उद्देश्य के साथ श्रम साधकों के बीच संपर्क का यह उपक्रम आरंभ किया गया था.

इसके लिए समाज में विभिन्न प्रकार के शारीरिक और कलात्मक श्रम से जुड़े लोगों की व्यापक सूची तैयार की गई, जिसमें कुल 52 प्रकार के विभिन्न कार्य सामने आए.

इन सभी श्रम साधकों तक निरंतर पहुंच और संवाद बनाने के लिए विशेष ‘मिलनों’ की व्यवस्था विकसित की गई, और वर्तमान में केवल भोपाल शहर में लगभग 40 श्रम साधक मिलन नियमित रूप से संचालित हो रहे हैं.

संत रविदास जी के जीवन में श्रम, साधना, समानता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का जो महान संदेश झलकता है, वही इस पूरे उपक्रम की प्रेरणा का मुख्य आधार है.

“मिलन केवल औपचारिक मुलाकात या मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यहां श्रम साधक एक-दूसरे के सुख-दुख में सच्चे साथी बनते हैं, अपने कार्य के प्रति निष्ठा को और अधिक मजबूत करते हैं तथा समाज के सामने मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों पर खुलकर विचार-विमर्श करते हैं। नशे से दूर रहना, बच्चों के भविष्य की चिंता करना और जरूरत के वक्त एक-दूसरे के साथ खड़ा होना इस आत्मीय प्रक्रिया का हिस्सा है।” – श्रम साधक मिलन अनुभव

कर्म ही पूजा है: भारतीय सनातन दृष्टि और संतों के उदाहरण

मुख्य वक्ता के रूप में अपने विस्तृत संबोधन में सरकार्यवाह जी ने संत रविदास जी के जीवन दर्शन और भारतीय संस्कृति में श्रम की उच्च प्रतिष्ठा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे मनीषियों और संतों ने सदैव ‘कर्म को ही पूजा’ माना है. शरीर से बहाया जाने वाला पसीना और श्रम भी ईश्वर की आराधना का ही एक रूप है. पूजा केवल मंदिर के गर्भगृह में जाकर पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं है; जब कोई भी व्यक्ति अपने निर्धारित कर्म को पूर्ण निष्ठा, शुद्ध अंतःकरण और सेवा भाव से करता है, तो वही साधारण कर्म सर्वोच्च पूजा बन जाता है.

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उन्होंने महाभारत काल की कथा का संदर्भ देते हुए धर्मव्याध का उल्लेख किया और कहा कि धर्म का संबंध किसी विशिष्ट कार्य या उच्च सामाजिक पहचान तक सीमित नहीं है. व्यक्ति जिस भी कर्म में संलग्न है, उसे पूरी ईमानदारी और कर्तव्यबोध के साथ करना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है. कर्म की महानता उसके बाहरी आवरण से नहीं, बल्कि उसे करने वाले व्यक्ति की पवित्र दृष्टि और समर्पण भाव से तय होती है.

सरकार्यवाह जी के संबोधन के प्रमुख वैचारिक बिंदु:

  • महर्षि वेदव्यास का उदाहरण: महानता कभी भी जन्म या पेशे से निर्धारित नहीं होती। एक मछुआरे परिवार में जन्म लेने वाले महान संत अपने असीम ज्ञान और कर्म के बल पर ‘महर्षि वेदव्यास’ बन गए। अतः किसी के कार्य से उसकी योग्यता आंकना दृष्टिदोष है।
  • हम सभी ‘राष्ट्रांगभूता’: राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, श्रम और संस्कारों का समुच्चय है। हम सब इस राष्ट्र के अभिन्न अंग हैं, इसलिए राष्ट्र के प्रति प्रत्येक नागरिक का प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व है।
  • श्रम की प्रतिष्ठा: समाज में हर स्तर पर श्रम का सम्मान बढ़ना चाहिए। शरीर से काम करने वाले और मस्तिष्क से सोचने वाले दोनों ही राष्ट्र निर्माण की गाड़ी के दो समान पहिए हैं।

सामाजिक समरसता और आत्मीयता बढ़ाने पर जोर

सरकार्यवाह जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाज में समय के साथ जो ऊंच-नीच के विकृत भाव आ गए हैं, उन्हें सही दृष्टि, सद्भाव और आपसी समन्वय से पूरी तरह दूर करना होगा। इसके लिए विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच आत्मीयता का विस्तार करना अनिवार्य है। सामाजिक समरसता कभी भी केवल भाषणबाजी से नहीं आ सकती, इसके लिए लोगों को एक-दूसरे के जीवन, संघर्ष और श्रम की परिस्थितियों से गहराई से जुड़ना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि मिलन केवल मिलने की एक शुरुआत है; निरंतर संपर्क से परिचय ‘संबंध’ में और संबंध प्रगाढ़ ‘आत्मीयता’ में बदल जाता है। यही आत्मीयता आगे चलकर समाज में स्थायी और सकारात्मक बदलाव लाने का बड़ा माध्यम बनती है। उन्होंने समाज के संपन्न और समर्थ वर्ग से आह्वान किया कि वे अपनी क्षमता के अनुसार वंचित वर्ग का सहयोग करें, तथा जरूरतमंद वर्ग से भी अपना आत्मविश्वास और परिश्रम सतत बनाए रखने की अपेक्षा की।

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“श्रमिक का बच्चा भी बन सकता है वैज्ञानिक और संत”

भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए सरकार्यवाह जी ने कहा कि किसी भी बच्चे की वर्तमान आर्थिक स्थिति देखकर उसके भविष्य की सीमाएं तय नहीं की जानी चाहिए। एक श्रमिक का बच्चा अपनी मेधा के बल पर महान वैज्ञानिक बन सकता है और श्रमजीवी परिवार की संतान संत या मार्गदर्शक बन सकती है। इसलिए परिवार और समाज का समग्र वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ हर बच्चे को अपनी प्रतिभा दिखाने के समान अवसर मिल सकें। आर्थिक तंगी कभी भी किसी बच्चे की अंतिम पहचान नहीं बननी चाहिए।

कार्यक्रम के अंत में उन्होंने बल देते हुए कहा कि केवल आर्थिक मदद पर्याप्त नहीं है, बल्कि श्रम साधक परिवारों को नशे जैसी सामाजिक कुप्रथाओं से बचाना भी हम सबका सामूहिक दायित्व है। महिला सुरक्षा और पारिवारिक संस्कारों को सुदृढ़ करते हुए उन्होंने संत रविदास जयंती के इस पवित्र अवसर पर श्रम और साधना के समन्वय को आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया। कार्यक्रम का समापन भव्य कल्याण मंत्र के साथ संपन्न हुआ।

Topics: दत्तात्रेय होसबालेDattatreya HosabaleRavidas Jayantiसंत रविदास जयंतीभोपाल श्रम साधक संगमBhopal Shram Sadhak SangamRavindra BhavanRSS Sarkaryavah Dattatreya HosabaleShram Sadhak Milan Bhopal
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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