संत श्रीहित प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार श्री राधा तत्व संपूर्ण ब्रह्मांड और भगवत्प्रेम का सबसे दुर्लभ, सर्वोच्च और रहस्यमयी तत्व है। लाल जू (श्री कृष्ण) की आह्लादिनी शक्ति श्रीजी (राधा रानी) समूचे ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री हैं। जहाँ कृष्ण हैं, वहीं राधा हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वृंदावन की रज रानी श्री राधा का तत्व इतना गुप्त और अगाध है कि इसे साधारण बुद्धि से नहीं; वरन वृंदावन के रसिक संतों की कृपा और उनके सत्संग से ही अनुभव किया जा सकता है।
राधावल्लभ संप्रदाय के सिद्धांतों के अनुसार श्रीकृष्ण स्वयं ब्रह्म तत्व हैं लेकिन श्रीकृष्ण को भी आकर्षित करने और उन्हें आनंदित करने वाला परम तत्व श्री राधा तत्व है। श्री राधा और कृष्ण अलग नहीं हैं, बल्कि वे एक ही तत्व के दो रूप हैं। एक प्राण, एक मन, एक स्वभाव और एक रुचि वाले दो शरीर हैं। राधा रानी की कृपा होने पर श्रीकृष्ण की प्राप्ति स्वतः हो जाती है।
ब्रह्मसूत्र और श्रीमद्भागवत के अनुसार, भगवान के तीन मुख्य स्वरूप हैं-
1. सन्दिनी शक्ति – अस्तित्व प्रदान करने वाली,
2. सम्वित शक्ति – ज्ञान देने वाली,
3. ह्लादिनी शक्ति – आनंद देने वाली।
जो शक्ति श्रीकृष्ण को आनंद देती हैं, वही श्री राधारानी हैं। कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम हैं और राधा उनकी प्राणवल्लभा। कृष्ण बिना राधा के अधूरे हैं, और राधा बिना कृष्ण के अधूरी।
वैष्णव आचार्य कहते हैं कि राधा व कृष्ण एक ही सत्ता के दो स्वरूप हैं। कृष्ण प्रेम के आस्वादक हैं और राधा प्रेम की आस्वादिनी। राधा का प्रेम ही कृष्ण को बांधता है। वेदान्त दर्शन के अनुसार राधा भक्ति का मूल स्वरूप हैं। भक्ति मार्ग में राधा वह सेतु हैं जो जीवात्मा (भक्त) को परमात्मा (कृष्ण) से जोड़ता है। जीव जब राधा के चरणों से प्रेम करता है तो वह सीधा कृष्ण की कृपा का अधिकारी हो जाता है। राधा अर्थात प्रेम की पराकाष्ठा। राधा का प्रेम निष्काम और अहंकार रहित है। उन्होंने कभी अपने सुख के लिए कृष्ण को चाहा ही नहीं, केवल कृष्ण की प्रसन्नता ही उनका जीवन है। यही कारण है कि भक्त जब “राधे राधे” पुकारते हैं तो कृष्ण तुरंत पिघल जाते हैं।
महाप्रभु चैतन्य कहते हैं, “राधा भाव से युक्त कृष्ण ही चैतन्य महाप्रभु हैं।” स्वामी हरिदास जी (निधिवन, वृन्दावन) कहते हैं, “राधा कृष्ण एक हैं, परन्तु लीलाओं के लिए उन्होंने दो रूप धारण किए।” जयदेव की गीता गोविन्द और गोस्वामियों की रचनाएँ भी राधा तत्व का रस बिखेरती हैं।
राधा जी केवल कृष्ण की प्रिया नहीं, बल्कि कृष्ण के हृदय की आत्मा हैं। राधा तत्व हमें यह सिखाता है कि भक्ति केवल प्रेम है – न अपेक्षा, न अहंकार, न स्वार्थ। राधा तत्व परम प्रेम का शुद्धतम रूप है जो जीव को सीधे भगवान से जोड़ता है।” ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि –
राधा कृष्ण प्राणाधारौ, राधा कृष्णप्रिया सदा।
राधाया: प्रियतमो नान्यो, नास्ति धात्री चतुष्पथे॥
अर्थात श्री राधा कृष्ण की प्राणाधार हैं और कृष्ण सदैव राधा के प्रिय हैं। राधा से बढ़कर कृष्ण के लिए कोई अन्य प्रिय नहीं है। राधा रानी के प्रेम की गहराई को मापना असंभव है। पौराणिक आख्यान है कि एक बार श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी जी के आमंत्रण पर राधा रानी द्वारिका पधारीं। रुक्मिणी जी ने उनका स्वागत करते हुए उनको दूध पीने को दिया। यद्यपि दूध बहुत गर्म था किन्तु राधा जी ने कृष्ण का स्मरण कर उसे एक सांस में पी लिया। कुछ ही देर में रुक्मिणी जी ने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में छाले पड़ गए हैं। कारण पूछने पर श्रीकृष्ण ने कहा,” प्रिये! मैं राधा के हृदय में हूँ। तुम्हारे मन की जिस जलन (गर्म दूध) को राधा ने चुपचाप पी लिया, वही मेरे तन से फूटी है।” निष्कर्ष यह कि जहाँ कृष्ण तहाँ राधा, जहाँ राधा तहाँ कृष्ण। राधा प्रेम का वह महासागर है जिसमें स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण भी डूब जाना चाहते हैं।
राधा नाम है महामंत्र
वृन्दावन के सिद्ध संत प्रेमानंद जी महराज के अनुसार श्री राधा रानी के नाम की महिमा अनंत है। श्री राधा नाम को कोई मन्त्र नहीं अपितु स्वयं में ही महामन्त्र है। राधा रानी भक्ति का स्वरूप हैं और कृष्ण स्वयं भगवान हैं। जब भक्ति और भगवान मिलते हैं, तभी पूर्ण प्रेम प्रकट होता है। राधा नाम का स्मरण, जप और चिंतन मन के भीतर छिपे विकारों को धीरे-धीरे पिघला देता है। जो राधा तत्व का आश्रय लेता है, वह आसानी से कृष्ण को प्राप्त कर लेता है। इसलिए ब्रज में सबसे पहले “राधे-राधे” बोला जाता है।













