जब हम सनातनधर्मी श्रीकृष्ण के जीवन और उनके लीलामय व्यक्तित्व की चर्चा करते हैं, तो श्रीराधारानी का नाम स्वयं ही मनःपटल पर आ जाता है। श्रीराधा रानी प्रेम भक्ति की ऐसी जाज्वल्यमान ज्योति हैं जो चिरकाल से हर प्रेमी भक्त के हृदय को आलोकित करती आ रही हैं। श्रीराधा ने अपने दिव्य आचरण से संसार को यह सिखाया कि ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम, भक्ति और समर्पण है। हमारे शास्त्रों में राधा जी को श्रीकृष्ण की परमाशक्ति माना गया है। स्कंद पुराण के अनुसार श्रीराधा श्रीकृष्ण की आत्मा हैं।
इसी कारण भक्तजन श्रीकृष्ण को ‘राधारमण’ कहकर पुकारते हैं। जिस प्रकार बिना शक्ति के शिव शून्य हो जाते हैं, उसी प्रकार राधा के बिना श्रीकृष्ण अधूरे माने जाते हैं। राधा जी के बिना श्रीकृष्ण की महिमा अधूरी है और श्रीकृष्ण के बिना राधा का अस्तित्व। शास्त्र कहते हैं कि जो भक्त राधा का नाम लेता है भगवान श्री कृष्ण सिर्फ उसी की पुकार सुनते हैं। इसलिए कृष्ण को बुलाना है तो पहले राधा को पुकारना होगा। जहां श्री भगवती राधा होंगी वहां कृष्ण खुद ही चले आएंगे। तत्वदृष्टि से राधा और कृष्ण का संबंध वस्तुतः आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।
निष्काम प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक
हमारी सनातन हिंदू संस्कृति में युगल सरकार यानी श्रीराधा-कृष्ण को निष्काम प्रेम का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। सोलह कलाओं के पूर्णावतार श्रीकृष्ण संसार को मोहित करते हैं लेकिन उनका मन मोहती हैं श्रीराधा- ‘’वन्दौं राधा के परम पावन पद अरविन्द। जिनको मृदु मकरन्द नित चाहत स्याम मिलिन्द।।‘’ श्रीकृष्ण जहां प्रेम का मूल स्रोत हैं, वहीं राधा जी उस प्रेम का शुद्धतम स्वरूप। योगेश्वर श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा रानी समूचे ब्रजमंडल की स्वामिनी हैं। यदि श्रीकृष्ण के जीवन से श्रीराधा को हटा दिया जाए तो श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व माधुर्यहीन हो जाएगा। पद्म पुराण में श्रीकृष्ण स्वयं भगवान शिव से कहते हैं कि वृन्दावन मेरा निज धाम है; जहाँ मैं अपनी आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा के साथ नित्य वास करता हूँ । मेरे इस निज धाम में प्रवेश मात्र से ही जीव सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाता है।
श्री राधारानी के नाम की अनंत महिमा
शास्त्रज्ञ कहते हैं कि श्री राधा रानी के नाम की महिमा अनंत है। श्री राधा का नाम स्वयं में ही महामन्त्र है। राधा का उल्टा होता है धारा। धारा का अर्थ है जीवनी शक्ति। पमात्मा की जीवनी शक्ति श्रीराधा हैं। कृष्ण देह हैं तो श्रीराधा आत्मा। कृष्ण शब्द है तो राधा अर्थ। श्रीराधा के ही कारण श्रीकृष्ण रासेश्वर माने जाते हैं। जो व्यक्ति राधा का नाम नहीं लेता है सिर्फ कृष्ण-कृष्ण रटता रहता है, वह उसी प्रकार अपना समय नष्ट करता है जैसे कोई रेत पर बैठकर मछली पकड़ने का प्रयास करता है।
श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति का मूल रहस्य समझाते हुए महर्षि शाण्डिल्य जी कहते हैं, ‘’ब्रह्म की तीन मुख्य शक्ति हैं-द्रव्य शक्ति, क्रिया शक्ति और ज्ञान शक्ति। द्रव्य शक्ति यानि महालक्ष्मी, क्रिया शक्ति यानि महाकाली और ज्ञान शक्ति यानि महासरस्वती। लेकिन यह तीनों ब्रह्म की वाह्य शक्तियां हैं। किन्तु इन तीनों से ऊपर ब्रह्म की एक प्रधान दिव्य शक्ति है जिसे वे अत्यंत गोपनीय रखते हैं और वह है उनकी आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा। इस कारण जो भी मनुष्य श्रद्धा प्रेमभाव से श्रीराधा नाम श्रवण व चिन्तन मनन करता है, उसके हृदय में प्रेम का प्राकट्य होकर श्रीराधा रानी की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
क्यों लेते हैं श्रीकृष्ण के पहले श्रीराधा का नाम
पौराणिक कथानक के अनुसार गोलोक (राधा-कृष्ण का परमधाम) में राधा रानी के विशेष निकुंज (बगीचे) के एक शुक (तोते) पर राधारानी का विशेष स्नेह था। वह तोता उस निकुंज में गोप सखियों साथ खेलते हुए सारा दिन राधा-राधा रटता रहता था। एक दिन श्रीराधा ने उस तोते को अपने पास बुलाया और प्यार से उसे अपने हाथ में उठाकर कृष्ण के परमात्म तत्व का ज्ञान देकर कहा कि अब से तू राधा-राधा नहीं वरन कृष्ण-कृष्ण बोला कर। इस तरह श्रीराधा ने उस शुक को गुरु रूप में परमात्मा की परम भक्ति प्रदान की। श्रीराधा के आदेश पर वह तोता कृष्ण-कृष्ण बोलने लगा। उस तोते के मुख से कृष्ण-कृष्ण सुनकर राधा की सभी सखी सहेलियां भी कृष्ण-कृष्ण जपने लगीं और देखते देखते पूरा गोलोक कृष्णमय हो गया। पर कृष्ण को तो राधा नाम से ही आनन्द मिलता था; इस कारण वे उदास हो गये।
उसी दौरान एक दिन नारद जी गोलोक आये तो कृष्ण के उदास चेहरे को देखकर प्रभु से उदासी का कारण पूछा। इस पर कृष्ण ने कहा कि राधा ने सभी को कृष्ण-कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है, कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर ही सुख मिलता है। कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर राधा रानी की आंखें भर आयीं और उन्होंने तोते से कहा कि अब से तुम फिर पहले की तरह राधा-राधा जपना शुरू कर दो। यह सुनकर श्रीजी की सखियाँ बोलीं- अब यदि तू इससे अपना नाम बुलवाएगी तो सब तुझको घमण्डी कहेंगे। इस पर श्री जी बोलीं- प्रियतम के सुख के लिए लोग मुझे कितना भी बुरा भला कहें; मुझे सब सहज स्वीकार है। कहा जाता है कि तभी से राधा कृष्ण पुकारने की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है।
‘श्रीमद्भागवत’ में क्यों नहीं है राधा नाम, जानें कारण
हमारे समाज का एक वर्ग तर्क देता है कि ‘राधा’ वास्तविक नहीं वरन कृष्ण कथा का एक काल्पनिक पात्र हैं। यदि वास्तव में उनका अस्तित्व होता तो श्रीकृष्ण की लीलाओं के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ ‘श्रीमद्भागवत’ और पंचम वेद के नाम से प्रसिद्ध ‘महाभारत’ में राधा रानी के नाम का उल्लेख क्यों नहीं मिलता! क्या यह महज एक भूल है या फिर इसके पीछे कोई रहस्य है! इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए ब्रजभूमि के सुप्रसिद्ध भागवत कथावाचक इन्द्रेश उपाध्याय कहते हैं कि श्रीमद्भागवत में 335 अध्याय, 18,000 श्लोक और 12 स्कंध हैं, लेकिन इनमें कहीं भी राधा नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हाँ!
यह बात सच है। किन्तु तत्व दृष्टि से विचार करें तो वस्तुस्थिति स्पष्ट सामने दिखायी देने लगेगी। श्रीमद्भागवत नाम में श्री नाम राधा का ही पर्याय है। दरअसल इस ग्रन्थ में राधा नाम का उल्लेख न करने का मुख्य कारण शुकदेव मुनि की आत्मिक स्थिति थी। वे राजा परीक्षित को मोक्ष दिलाने के लिए श्रीमद्भागवत कथा सुनाने आये थे और उन्हें केवल सात दिन का समय मिला था। पौराणिक मान्यता के अनुसार शुकदेव जी ने स्वयं कहा था कि जैसे ही राधा नाम मेरी जिह्वा पर आएगा, मैं समाधि में चला जाऊंगा। फिर कथा कौन सुनाएगा? इसलिए उन्होंने राधा नाम का प्रत्यक्ष उच्चारण नहीं किया, बल्कि प्रतीकों, भावों और ‘श्री’, ‘रमा’, ‘गोपिका’, ‘श्यामा’, ‘किशोरी’ जैसे उपनामों के माध्यम से राधा रानी की उपस्थिति को व्यक्त किया। श्रीमद्भागवत में राधा रानी के अप्रत्यक्ष उल्लेख की दूसरी मूल वजह गुरु के प्रति सम्मान भाव है। हमारी सनातन संस्कृति में गुरु, संतों व पूज्य जनों का नाम न लेने की परम्परा है। पौराणिक कथानक के अनुसार श्री राधा रानी शुकदेव मुनि की आध्यात्मिक गुरु थीं। शुकदेव मुनि पूर्व जन्म में गोलोक में राधा रानी के निकुंज के तोते थे जहाँ स्वयं श्रीराधा ने उन्हें कृष्ण रस और आनंद की शिक्षा दी थी। यही कारण है कि वे उनके नाम का उच्चारण करने मात्र से प्रेमरस के अलौकिक आनंद में डूबकर गहरी समाधि में चले जाते थे। यदि भागवत कथा सुनाते समय अगर शुकदेव जी राधा नाम ले लेते तो वे लम्बे समय के लिए गहरी समाधि में चला जाता तब राजा परीक्षित का उद्धार कैसे होता?













