उज्जैन (मध्य प्रदेश)। सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय उपक्रम ‘युवा धर्म संसद-2026 अवन्तिका’ का भव्य शुभारंभ उज्जैन के ऐतिहासिक गीता भवन में हुआ. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने दीप प्रज्ज्वलन और भारत माता तथा स्वामी विवेकानंद के चित्रों पर माल्यार्पण कर युवा धर्म संसद का विधिवत उद्घाटन किया. इस गरिमामय आयोजन में सेवाज्ञ संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी और सेवाज्ञ संस्थानम् के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष कुमार आशु सहित देशभर के 25 राज्यों से आए लगभग 1,600 युवा प्रतिभागी, 300 से अधिक शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं धर्माचार्य उपस्थित रहे.

उद्घाटन सत्र में स्वागत वक्तव्य देते हुए आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण जी महाराज ने युवाओं को आत्मनिर्माण और भारत-बोध का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि भारतीय युवा केवल आयु से युवा होने तक सीमित न रहे, बल्कि अपनी आंतरिक चेतना को जागृत करते हुए भारत को पहचाने.

“धर्म को केवल ‘रिलीजन’ के अर्थ में समझना उचित नहीं”- डॉ. मोहन भागवत
युवाओं को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने समाज में व्याप्त उस आम धारणा को सिरे से खारिज किया जिसमें धर्म को केवल वृद्धावस्था या कुछ सीमित धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित मान लिया जाता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म जीवन के प्रारंभ से अंत तक मनुष्य के आचरण, विचारों और निर्णयों को दिशा देने वाला शाश्वत तत्व है.
“धर्म को अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ के रूप में समझना उचित नहीं है। धर्म ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है—’धारण करना’। धर्म वह अनुशासन है जो व्यक्ति और समाज को आपस में जोड़े रखता है, उन्हें बिखरने से बचाता है और निरंतर उन्नति के पथ पर आगे ले जाता है। धर्म जीवन से दूर भागने या सब कुछ छोड़ देने का नाम नहीं, बल्कि भौतिक जीवन के साथ आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन है।” – डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, RSS
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे व्यक्तिगत सफलता को हमेशा व्यापक सामाजिक सफलता से जोड़कर देखें. मनुष्य की जीत तभी वास्तविक और सार्थक है, जब उसकी सफलता में दूसरों का भी कल्याण और सहभागिता शामिल हो.

दैनिक जीवन के आचरण में निहित है धर्म का वास्तविक स्वरूप
सरसंघचालक जी ने बहुत ही सरल और व्यावहारिक उदाहरण देते हुए समझाया कि धर्म केवल बड़े-बड़े सिद्धांतों या ग्रंथों के वाचन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के आचरण से झलकता है.

धर्म के व्यावहारिक आयाम:
- दैनिक कर्तव्य पालन: भोजन के उपरांत कचरा न फैलाना, यातायात के नियमों का पूर्ण पालन करना, किसी को कष्ट न पहुँचाना और अपने सामाजिक दायित्वों को निभाना भी धर्म का ही आचरण है।
- सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व: मनुष्य अपनी बुद्धि के बल पर सृष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए प्रकृति और समाज के प्रति उसकी जवाबदेही और भी बढ़ जाती है।
- सर्व-पंथ आदर: अपनी उपासना पद्धति और परंपरा के प्रति पूर्ण रूप से दृढ़ रहते हुए अन्य सभी उपासना पद्धतियों का सम्मान करना भारतीय जीवन-दृष्टि का मूल आधार है।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भी अपने संबोधन में युवाओं को ‘इंडिया से भारत’ की ओर ले जाने वाली चेतना के साथ आत्मवान बनने और अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़ने का संदेश दिया.
छठा राष्ट्रीय आयोजन: तीन दिनों तक चलेगा मंथन
उल्लेखनीय है कि सेवाज्ञ संस्थानम् के तत्वावधान में आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ का यह छठा संस्करण है. इससे पूर्व काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और कांचीपुरम में इसके सफल आयोजन हो चुके हैं.

तीन दिनों तक चलने वाले इस राष्ट्रीय समागम में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, चारित्रिक उत्तरदायित्व, भारतीय संस्कृति, शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और तकनीक, सूचना एवं विचार का संघर्ष, मानवीय मूल्य तथा राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका जैसे समसामयिक और दूरगामी विषयों पर विभिन्न सत्रों में गहन विचार-मंथन जारी है.











