नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर को हुए ब्रिक्स सम्मेलन में चीन, रूस, ईरान, यूएई समेत 11 देशों के नेता एक साथ बैठे। बाहर दुनिया में तनाव है, युद्ध हैं, व्यापार को लेकर खींचतान है और अमेरिका की ‘टैरिफ’ नीति ने कई देशों की चिंता बढ़ा रखी है। ऐसे समय में दिल्ली में हुआ यह सम्मेलन केवल एक बैठक नहीं था। यह भारत के लिए अपनी कूटनीतिक ताकत दिखाने का भी अवसर था। दो दिन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि भारत ने अलग-अलग सोच वाले देशों को एक मंच पर साथ बैठाया और अंत में नई दिल्ली घोषणा पर सहमति बन गई। भारत के लिए यह अपने आप में बड़ी बात है।
पहले दिन यानी 12 सितंबर को अलग-अलग सत्रों में दुनिया की समस्याओं पर चर्चा हुई और भारत ने अपनी प्राथमिकताएं सामने रखीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा कि विकासशील देश दुनिया के संकटों को सबसे अधिक झेल रहे हैं, लेकिन निर्णय लेने की जगह पर उनकी आवाज अभी भी कम है। उनका जोर इस बात पर रहा कि वैश्विक दक्षिण केवल नियम मानने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने में भी हिस्सेदार बने।
भारत के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उपस्थिति भी विशेष रही। मोदी और शी की भेंट में दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने और सीमा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत जारी रखने पर चर्चा हुई। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भी मोदी की मुलाकात हुई। यानी सम्मेलन के मंच के साथ-साथ भारत ने द्विपक्षीय रिश्तों के लिए भी इस अवसर का प्रयोग किया।
दूसरे दिन यानी 13 सितंबर को नई दिल्ली घोषणा को स्वीकृति मिली। इसमें व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य, तकनीक, ऊर्जा, खेती और वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी जैसे मुद्दों को जगह मिली। आतंकवाद के मुद्दे पर भी भारत को महत्वपूर्ण समर्थन मिला। घोषणा में पहलगाम आतंकवादी हमले की निंदा की गई। भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि आतंकवाद को किसी भी बहाने सही नहीं ठहराया जा सकता। ब्रिक्स के मंच से इस बात का दोहराया जाना भारत के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
















