
विदेशी आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी द्वारा उत्तर में पंजाब से सुदूर दक्षिण तक दिल्ली सल्तनत का विस्तार किए जाने के बाद मेवाड़ के राणा हम्मीर की 1326 की चित्तौड़ विजय को 700 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस विजय के बाद मेवाड़ की बढ़ती शक्ति से चिंतित होकर दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने 1336 में मेवाड़ पर आक्रमण किया। हम्मीर ने सिंगोली के युद्ध में सल्तनत की सेना को पराजित कर सुल्तान को भी बंदी बना लिया। चित्तौड़ में छह माह तक बंदी रहे सुल्तान को छुड़ाने के लिए दिल्ली सल्तनत को अजमेर, रणथम्भौर, नागौर और सोपोर के क्षेत्र मेवाड़ को सौंपने पड़े। साथ ही 50 लाख रुपए, 100 हाथी और बड़ी मात्रा में सोना-चांदी का सामान दंड के रूप में देना पड़ा।
मोहम्मद बिन तुगलक को हम्मीर द्वारा बंदी बनाए जाने के बाद देशभर में बड़ी संख्या में हिन्दुओं की घर वापसी हुई। बुक्क राय और हरिहर राय को मुसलमान बनाए जाने के बाद तुगलक ने अपना सेनापति नियुक्त किया था और उन्हें दक्षिण में होयसाल साम्राज्य पर आक्रमण के लिए भेजा था। तुगलक के हम्मीर की कैद में रहने के दौरान विद्यारण्य स्वामी ने उन दोनों की शुद्धि कर उन्हें विजयनगर जैसे विशाल और सशक्त साम्राज्य की स्थापना की प्रेरणा दी। विद्यारण्य स्वामी के शृंगेरी के शंकराचार्य बनने के बाद उनके भाई सायणाचार्य ने विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक महामात्य और प्रधान सेनापति का पद संभाला तथा साम्राज्य का विस्तार किया। विजयनगर के साथ ही चौदहवीं सदी में कई हिन्दू रियासतें पुनर्जीवित हुईं।
मेवाड़ के सिसौदा गांव में हम्मीर का जन्म 1303 में हुआ था। इसी वर्ष अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था। रावल रत्नसिंह के चित्तौड़ का शासक बनने के छह माह के भीतर ही खिलजी ने चित्तौड़ को घेर लिया था। आठ माह के घेरे के बाद महारानी पद्मिनी और अनेक अबोध शिशुओं सहित 16,000 वीरांगनाओं ने जौहर किया और वीरों ने साका किया। इसके बाद खिलजी के सैनिकों ने चित्तौड़ क्षेत्र में 30,000 हिन्दुओं का कत्ल कर दिया। हम्मीर के पिता अरिसिंह, दादा लक्षसिंह और उनके सात पुत्र भी उसी युद्ध में बलिदान हुए। उनके चाचा अजय सिंह ने हम्मीर का पालन-पोषण किया।
हम्मीर ने किशोरावस्था से ही चित्तौड़ सहित मेवाड़ को सल्तनत से मुक्त कराने के लिए सैन्य शक्ति जुटानी शुरू कर दी थी। 18 वर्ष की आयु में, 1321 तक, उन्होंने मेवाड़ के बड़े भाग पर नियंत्रण कर खैरवाड़ा को अपना केंद्र बना लिया। 20 वर्ष की आयु से चित्तौड़ पर आक्रमण शुरू किए। 1326 में एक सिद्ध चारण महिला और उनके पुत्र बरू जी के चारण सैनिकों के सहयोग से हम्मीर ने मेवाड़ की सेना के साथ मिलकर चित्तौड़ को मुक्त करा लिया। ऐसे समय में, जब देश का बड़ा भाग सल्तनती आतंक और गुलामी के अधीन था, हम्मीर की चित्तौड़ विजय से स्वायत्त हिन्दू साम्राज्यों का दौर फिर शुरू हुआ।
उस काल में सुल्तान की अनुमति के बिना हिन्दुओं के सामाजिक समारोह और उत्सव आयोजित करना वर्जित था। सैन्य अभियानों में पकड़े गए और कर न देने वाले लोगों को गुलाम बनाया जाता था। पुरुष गुलामों को बंदा, कैदी, गुलाम या बुरदा और महिला गुलामों को बंदी, कनीज या लौंडी कहा जाता था। अलाउद्दीन युद्धों के बाद जीते गए क्षेत्रों की जनता के प्रति क्रूरता के लिए भी जाना जाता था। इतिहासकार उसे अत्यंत अत्याचारी शासक बताते हैं। महिलाओं और बच्चों तक की हत्या की जाती थी। 1298 में दिल्ली के पास हाल में इस्लाम अपनाने वाले 15,000 से 30,000 लोगों को हिन्दुत्व में वापसी और विद्रोह के डर से एक ही दिन में मार डाला गया।
खिलजी और मलिक काफूर ने गुजरात, रणथम्भौर, मालवा, मेवाड़, जालोर, बंगाल, बिहार, आंध्र और तमिलनाडु तक 30 से अधिक राज्यों या साम्राज्यों को 1299 से 1315 के बीच एक-एक कर जीत लिया। यदि 2-3 राजाओं ने भी मिलकर उसका सामना किया होता तो उसका बचना कठिन था। राजाओं में सहयोग और एकता के अभाव में खिलजी की सल्तनत फैलती गई। अलाउद्दीन ने गुजरात (1299 में आक्रमण, 1304 में विलय), जैसलमेर (1299), रणथम्भौर (1301), चित्तौड़ (1303), मालवा (1305), सिवाना (1308) और जालोर (1311) पर विजय प्राप्त की।
इन विजयों के साथ परमार, वाघेला, रणस्तंभपुरा और जालोर के चाहमान, गुहिला वंश की रावल शाखा और संभवतः यज्वपाल जैसे कई राजपूत और हिन्दू राजवंशों का अंत हुआ। उसके दास सेनापति मलिक काफूर ने विंध्य के दक्षिण में अभियान चलाए और देवगिरि (1308), वारंगल (1310) तथा द्वारसमुद्र (1311) से भारी धन प्राप्त किया। यादव राजा रामचंद्र, काकतीय राजा प्रतापरुद्र और होयसाल राजा बल्लाल तृतीय अलाउद्दीन के अधीन हो गए। काफूर ने 1311 में पांड्य साम्राज्य पर भी आक्रमण किया और वहां से खजाना, हाथी तथा घोड़े प्राप्त किए। जीवन के अंतिम वर्षों में अलाउद्दीन बीमार पड़ा और प्रशासन के लिए मलिक काफूर पर निर्भर रहा। 1316 में उसकी मृत्यु के बाद 1320 में खिलजी सत्ता समाप्त हुई और तुगलक वंश सत्ता में आया।
आठवीं सदी के बप्पा रावल से लेकर 1711 के अंतिम मेवाड़-मुगल युद्ध तक मेवाड़ ने अरबी, तुर्की, मामलूक, गुलाम, घुरीड और मुगलों से अनगिनत युद्ध लड़े। हम्मीर से पहले जैत्र सिंह ने भी दो सुल्तानों को हराया था। राणा हम्मीर बप्पा रावल के कुल की 36वीं पीढ़ी के शासक थे। वे उदयपुर के पास सिसौदा गांव के थे, जो नाथद्वारा तीर्थ से 20 किमी दूर है। उनके बाद मेवाड़ राजकुल सिसोदिया कहलाया। हम्मीर के चाचा अजय सिंह के पुत्र सज्जनसिंह दक्षिण में महाराष्ट्र चले गए और उनके वंश में ही शिवाजी महाराज का जन्म हुआ। अजय सिंह ने पुत्र मोह छोड़कर योग्यता के आधार पर अपने पुत्र सज्जन सिंह के स्थान पर भतीजे हम्मीर को उत्तराधिकारी बनाया। उनके इस त्याग से राष्ट्रीय गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा संभव हुई। अरबी-तुर्की आक्रमणों की भीषणता को देखते हुए आठवीं सदी में बप्पा रावल के पालक विप्रकुल के ऋषियों ने साझा युद्धों के महत्व को समझा और मेवाड़ अर्थात श्री मेदपाट की परमेष्ठी राज्य के रूप में स्थापना की। तैत्तिरीय शाखा और तैत्तिरीयोपनिषद के अनुसार परमात्मा अधिष्ठित राज्य में राजा परमात्मा होते हैं और शासक उनके दीवान के रूप में शासन करते हैं।
मेवाड़ के अधिष्ठाता प्रारंभ से भगवान एकलिंगनाथ माने गए। बप्पा रावल से महाराणा भूपाल सिंह तक सभी शासक एकलिंगनाथ के दीवान के रूप में शासन करते रहे। इसलिए आठवीं सदी से भारत में विलय तक मेवाड़ परमेष्ठी राज्य कहलाता रहा। एकलिंग जी के ध्वजवाहक मेवाड़ के शासकों के साथ कई राजाओं ने प्रबल शत्रुओं के विरुद्ध साझा युद्ध किए। बप्पा रावल के साथ कश्मीर के महाराजा ललितादित्य मुक्तापीड़ और कर्नाटक के चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय सहित कई राजाओं ने अरबों को पूर्वी ईरान तक खदेड़ा और तक्षशिला की रक्षा के लिए रावलपिंडी में रक्षादुर्ग स्थापित किया।
बप्पा रावल के नाम से ही रावलपिंडी का नामकरण हुआ। इसके बाद रावल खुम्माण सहित मेवाड़ के कई महाराणाओं के साथ भी राजाओं ने साझा युद्ध किए। खिलजी के आक्रमण के समय यह पारस्परिक एकता नहीं थी। रावल रत्नसिंह के शासक बनने के छह माह में ही खिलजी ने आक्रमण कर दिया और 1303 में जौहर व साका हुआ। अन्यथा मेवाड़ के शौर्य के सामने खिलजी का सफल होना कठिन था।