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‘BRICS में पाकिस्तान को जगह क्यों नहीं?’ अभिजीत अय्यर मित्रा ने बताया भारत का पूरा गेमप्लान

पाकिस्तान के भीतर से यह सवाल उठता रहा है कि जब सऊदी अरब और ईरान जैसे देश इस मंच पर आ सकते हैं, भारत और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देश एक ही मंच पर बैठ सकते हैं, तो पाकिस्तान क्यों नहीं?

Written byMahak SinghMahak Singh
Sep 13, 2026, 01:49 pm IST
inगुजरात, पाञ्चजन्य इवेंट
श्री अभिजीत अय्यर मित्रा जी- लेखक एवं टिप्पणीकार

श्री अभिजीत अय्यर मित्रा जी- लेखक एवं टिप्पणीकार

अहमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ में भारत की आर्थिक प्रगति, वैश्विक भूमिका और गुजरात के विकास पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी क्रम में पाञ्चजन्य की कंसल्टिंग एडिटर तृप्ति श्रीवास्तव ने लेखक एवं टिप्पणीकार श्री अभिजीत अय्यर मित्रा से अंतरराष्ट्रीय राजनीति के कई ज्वलंत मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की। चर्चा में ब्रिक्स के विस्तार, नई दिल्ली घोषणा और पहलगाम आतंकी हमले की निंदा से लेकर पाकिस्तान की ब्रिक्स में संभावित भूमिका, ग्लोबल साउथ और पश्चिम के बदलते संबंध, चीन के साथ भारत के समीकरण तथा रूस से तेल खरीदने के मुद्दे तक कई महत्वपूर्ण विषय शामिल रहे।

प्रश्न: ब्रिक्स के पहले दिन नई दिल्ली घोषणा में पहलगाम आतंकी हमले की निंदा हुई। क्या इसे पाकिस्तान के लिए एक अप्रत्यक्ष संदेश के तौर पर देखा जा सकता है?

उत्तर: इसे समझने के लिए पहले भारत के ब्रिक्स में होने के उद्देश्य को समझना जरूरी है। भारत के लिए ब्रिक्स केवल एक संगठन नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपने हितों को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच है। अमेरिका कई बार यह कहता है कि आप रूस से तेल मत खरीदिए या कुछ विशेष नीतियों का पालन कीजिए। ऐसे में ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंच पर भारत यह कह सकता है कि हम कोई काम अकेले नहीं कर रहे हैं; कई देश समान आर्थिक और रणनीतिक हितों के आधार पर ऐसा कर रहे हैं। दूसरा पहलू चीन के साथ हमारे संबंधों का है। भारत और चीन के बीच कई मुद्दों पर तनाव है। ऐसे में हर मुद्दे पर द्विपक्षीय बातचीत आसान नहीं होती, लेकिन बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देशों को साथ बैठना पड़ता है। यह संवाद के अवसर पैदा करता है।

मान लीजिए किसी परिवार में किसी रिश्तेदार का आपके पिता से संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा है। इसके बावजूद परिवार में शादी होती है तो उसे बुलाना पड़ता है। शादी में आने के बाद बातचीत का रास्ता भी खुलता है- आप कह सकते हैं, “देखिए, अब इस विवाद को भी सुलझा लेते हैं।” ब्रिक्स भारत के लिए कुछ वैसा ही मंच है। इसलिए पाकिस्तान के संदर्भ में नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद की निंदा को निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि इसे केवल पाकिस्तान के खिलाफ घोषणा कहना उचित नहीं होगा; आतंकवाद के विरुद्ध सामूहिक प्रतिबद्धता इसका व्यापक संदेश है।

प्रश्न: पाकिस्तान लंबे समय से ब्रिक्स का हिस्सा बनने की इच्छा जताता रहा है। उसे अब तक इसमें जगह न मिलने के पीछे क्या कारण दिखाई देते हैं?

उत्तर: पाकिस्तान के भीतर से यह सवाल उठता रहा है कि जब सऊदी अरब और ईरान जैसे देश इस मंच पर आ सकते हैं, भारत और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देश एक ही मंच पर बैठ सकते हैं, तो पाकिस्तान क्यों नहीं? लेकिन यहां सवाल केवल यह नहीं है कि कोई देश ब्रिक्स में आना चाहता है या नहीं। सवाल यह है कि वह देश इस समूह में योगदान क्या कर सकता है? ब्रिक्स के विस्तार के पीछे अलग-अलग देशों के आर्थिक, रणनीतिक और संसाधन संबंधी महत्व को देखा गया है। उदाहरण के लिए, वियतनाम को देखें। वह एक महत्वपूर्ण विनिर्माण केंद्र बन चुका है। कजाखस्तान जैसे देशों के पास ऊर्जा और खनिज संसाधनों का रणनीतिक महत्व है। दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था भले ही कई चुनौतियों का सामना कर रही हो, लेकिन उसके पास सोना, हीरा और यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण संसाधन हैं और अफ्रीकी महाद्वीप में उसका रणनीतिक महत्व है।इसलिए किसी देश को केवल उसकी जनसंख्या या राजनीतिक इच्छा के आधार पर नहीं, बल्कि उसके आर्थिक, संसाधन, रणनीतिक और क्षेत्रीय महत्व के आधार पर भी देखा जाता है। यही वह जगह है जहां पाकिस्तान को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी कि वह ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स को क्या दे सकता है।

प्रश्न: क्या ब्रिक्स वास्तव में “ग्लोबल साउथ बनाम पश्चिम” का नया ध्रुव बन रहा है?

उत्तर: मुझे नहीं लगता कि इसे सीधे-सीधे “ग्लोबल साउथ बनाम पश्चिम” के रूप में देखना चाहिए। असल में यह देशों के बीच सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाने का प्रयास है। मान लीजिए आपको एक साड़ी खरीदनी है और आप अकेले दुकान पर जाते हैं। दुकानदार कहता है कि दस हजार रुपये से कम में नहीं दूंगा। लेकिन अगर दस लोग एक साथ जाएं और कहें कि हम दस साड़ियां खरीद रहे हैं, हमें बेहतर कीमत दीजिए, तो दुकानदार को कीमत कम करनी पड़ सकती है। यही सामूहिक सौदेबाजी है। ब्रिक्स भारत को ऐसी ही सामूहिक बातचीत की शक्ति देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम पश्चिम के खिलाफ हैं। इसका अर्थ यह है कि हम अपने राष्ट्रीय हितों को बेहतर तरीके से सामने रखना चाहते हैं।

प्रश्न: क्या इस सामूहिक रणनीति में चीन पर भरोसा करना भारत के लिए जोखिम भरा नहीं है?

उत्तर: बिल्कुल जोखिम है और भारत ने अतीत में इसका अनुभव किया है। जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं के दौरान भारत और चीन कई मुद्दों पर एक जैसी स्थिति में दिखाई देते थे। लेकिन बाद में चीन ने अपने हितों के अनुसार अलग समझौते किए। इससे भारत को यह सीख मिली कि सामूहिक मंच पर साथ खड़ा होना अलग बात है और राष्ट्रीय हितों पर समझौता करना अलग। इसलिए भारत को इस बार ज्यादा सावधान रहना होगा। हमें चीन के साथ सहयोग भी करना है, लेकिन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखनी है। ब्रिक्स भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि यहां हम रूस, चीन, सऊदी अरब, यूएई और दूसरे देशों के साथ एक ही मंच पर बैठकर अपने हितों की सामूहिक बातचीत कर सकते हैं।

प्रश्न : रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भी क्या ब्रिक्स भारत के लिए एक रणनीतिक सुरक्षा कवच जैसा काम करता है?

उत्तर: अगर भारत रूस से तेल खरीदता है और उस पर सवाल उठते हैं, तो भारत यह कह सकता है कि रूस के साथ आर्थिक संबंध केवल भारत के नहीं हैं। चीन भी रूस से ऊर्जा खरीदता है, दूसरे देश भी रूस के साथ व्यापार करते हैं। ब्रिक्स में रूस के साथ-साथ सऊदी अरब और यूएई जैसे ऊर्जा उत्पादक देशों की मौजूदगी भी है। इसलिए यह मंच भारत को केवल एक देश के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े बहुपक्षीय समूह के हिस्से के रूप में बातचीत करने का अवसर देता है। यानी सामूहिक मंच का फायदा यह है कि किसी एक देश पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव कुछ हद तक साझा बातचीत का विषय बन सकता है।

प्रश्न: भारत में जब ऐसे बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होते हैं तो कुछ समूह विरोध-प्रदर्शन की कोशिश करते हैं। क्या यह भारत के लिए अब भी बड़ी चुनौती है?

उत्तर: बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन किसी भी देश के लिए संवेदनशील होते हैं। जब दुनिया के बड़े नेता किसी देश में आते हैं तो सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक विरोध- तीनों का महत्व बढ़ जाता है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार होना चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि विरोध का तरीका क्या है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन अगर विरोध हिंसा, धमकी या अंतरराष्ट्रीय आयोजन को बाधित करने के प्रयास में बदल जाए तो सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती आती है। भारत को एक साथ दो चीजें सुनिश्चित करनी होती हैं- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बनी रहे और राष्ट्रीय सुरक्षा भी प्रभावित न हो।

प्रश्न: अक्सर विकास परियोजनाओं के विरोध को लेकर भी राजनीति होती है। क्या पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन संभव है?

उत्तर: किसी औद्योगिक परियोजना या परमाणु संयंत्र को केवल इसलिए बंद नहीं किया जा सकता कि उसके खिलाफ विरोध हो रहा है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी नहीं कहा जा सकता कि विकास के नाम पर पर्यावरण, स्थानीय लोगों या समुदायों के हितों को नजरअंदाज कर दिया जाए। सही तरीका यह है कि वैज्ञानिक जांच हो, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाए, जहां समस्या मिले वहां सुधारात्मक उपाय किए जाएं और निगरानी की व्यवस्था हो। किसी परियोजना में प्रदूषण की आशंका है तो एफ्लुएंट ट्रीटमेंट, पर्यावरणीय मानकों और निगरानी जैसे उपाय किए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र जांच भी होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का दुश्मन बनाना सही रास्ता नहीं है।

प्रश्न: अब पाकिस्तान और पश्चिम एशिया की ओर लौटते हैं। सऊदी अरब और तुर्की के बीच जिस “मक्का पैक्ट” की चर्चा हो रही है, क्या इससे किसी तरह के इस्लामिक नाटो की संभावना दिखाई देती है?

उत्तर: मुझे फिलहाल ऐसी किसी स्थायी सैन्य व्यवस्था की संभावना बहुत मजबूत नहीं दिखाई देती। पश्चिम एशिया की राजनीति बहुत जटिल है। वहां देश स्थायी मित्रता से ज्यादा अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर रिश्तों को संतुलित करते हैं। यमन इसका उदाहरण है। लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदेब का सामरिक महत्व बहुत बड़ा है। वहां अस्थिरता का प्रभाव केवल यमन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक व्यापार और समुद्री मार्गों पर भी पड़ता है। ऐसे में सऊदी अरब को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए दूसरे देशों की मदद की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी देश हमेशा एक ही रणनीति पर चलेंगे।

प्रश्न: सऊदी अरब, तुर्की और यूएई के बीच इतने बदलते समीकरणों को कैसे समझा जाए?

उत्तर: पश्चिम एशिया की राजनीति की सबसे खास बात यही है कि वहां गठबंधन बहुत स्थायी नहीं होते। सऊदी अरब और यूएई के बीच भी कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं। तुर्की के अपने क्षेत्रीय हित हैं। ईरान के अपने हित हैं। मिस्र के अपने हित हैं। यमन और सीरिया के उदाहरणों से यह समझ आता है कि किसी देश का आज का सहयोगी कल किसी दूसरे मुद्दे पर उसका प्रतिद्वंद्वी हो सकता है। इसे “माइक्रो-बैलेंसिंग” कह सकते हैं- यानी हर देश अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग साझेदारी करता है। भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण सीख है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी हमेशा स्थायी श्रेणियां नहीं होतीं। राष्ट्रीय हित बदलते हैं और उसके साथ साझेदारियां भी बदलती हैं।

प्रश्न: अगर पश्चिम एशिया में इतने बदलते समीकरण हैं तो इब्राहिम अकॉर्ड्स का भविष्य क्या होगा?

उत्तर: इब्राहिम अकॉर्ड्स को पश्चिम एशिया के व्यापक आर्थिक और रणनीतिक पुनर्संयोजन के संदर्भ में देखना चाहिए। कई अरब देश यह महसूस करते हैं कि यदि वे लगातार केवल फिलिस्तीन मुद्दे के कारण अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को रोकते रहेंगे तो उन्हें भी नुकसान होगा। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि फिलिस्तीन का मुद्दा महत्वहीन हो गया है। बल्कि यह है कि कई अरब देश अब अपने राष्ट्रीय हितों, आर्थिक विकास, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को भी समान महत्व दे रहे हैं। फिलिस्तीन प्रश्न का समाधान अभी भी पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न: क्या फिलिस्तीन की समस्या के लिए केवल फिलिस्तीनियों को जिम्मेदार ठहराना उचित है?

उत्तर: नहीं, इसे इतना सरल बनाना उचित नहीं होगा। फिलिस्तीन समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बहुत जटिल है। इसमें इजरायल की नीतियां, फिलिस्तीनी नेतृत्व, अरब देशों की राजनीति, क्षेत्रीय शक्तियां और अंतरराष्ट्रीय शक्तियां- सभी की भूमिका रही है। अतीत में कई शांति प्रस्ताव आए, लेकिन उन पर सहमति नहीं बन सकी। दूसरी ओर, इजरायल की नीतियों और उसकी सैन्य कार्रवाइयों को लेकर भी गंभीर विवाद और आलोचनाएं रही हैं। इसलिए यह कहना कि पूरी समस्या की जिम्मेदारी केवल एक पक्ष की है, ऐतिहासिक वास्तविकता को बहुत सरल बना देना होगा।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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