पंजाब

पंजाब में गैंगस्टरों का राजनीति में प्रवेश, सेखों के अलावा भी हैं कई नाम

गैंगस्टर रहे गुरप्रीत सिंह सेखों को आम आदमी पार्टी में शामिल करते हुए पंजाब CM भगवंत मान ने कहा कि कोई जन्म से बुरा नहीं होता। नाभा जेल ब्रेक आरोपी सेखों और पंजाब राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले चेहरों की पूरी कहानी।

Published by
राकेश सैन

फिरोजपुर में आयोजित एक कार्यक्रम गैंगस्टर रहे गुरप्रीत सिंह सेखों को आम आदमी पार्टी में शामिल करवाते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने ज्ञान दिया कि कोई व्यक्ति जन्म से बुरा नहीं होता, हालात उसे ऐसा बना देते हैं। मुख्यमंत्री के इस बयान को गैंगस्टरवाद के सम्मुख राजनीतिक मजबूरी का राजनीतिकरण माना जा रहा है। पंजाब की राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले चेहरों की सक्रियता एक बार फिर चर्चा में है।

पंजाब के कई अंडरवर्ल्ड चेहरे हैं, जिन्होंने अपराध की दुनिया से निकलकर मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा है। हालांकि, इनमें से कोई भी पंजाब विधानसभा का सदस्य बनने के लिए चुनाव नहीं जीत पाया है। लक्खा सिधाना, जयपाल भुल्लर का परिवार, कुलबीर नरुआना और अमृतपाल बाठ-कंचनप्रीत कौर प्रकरण इसी व्यापक चर्चा के उदाहरण हैं।

पंजाब में गैंगस्टरों से लेकर राजनीति तक का यह सिलसिला कहीं अधिक पुराना है। फरीदकोट के चंदभान गांव के प्रभजिंदर सिंह बराड़ उर्फ डिम्पी चंदभान, जिन्हें व्यापक रूप से पंजाब का पहला बड़ा डॉन माना जाता है। उसके शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) से घनिष्ठ संबंध थे, जिसका नेतृत्व सिमरनजीत सिंह मान कर रहे थे और जिनकी पार्टी ने 1989 के लोकसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था। लेकिन पंजाब में चुनावों को रद्द करने और उग्रवाद पर पुलिस की व्यापक कार्रवाई ने चंदभान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को खत्म कर दिया, जिससे उन्हें राज्य छोडक़र उत्तर प्रदेश भागने के लिए मजबूर होना पड़ा, जहां उसने मुख्तार अंसारी जैसे लोगों के साथ संबंध बनाए। 2006 में चंडीगढ़ के लेक क्लब के बाहर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

रॉकी ने भी आजमाई थी किस्मत

जसविंदर सिंह भुल्लर उर्फ रॉकी फाजिल्का, जो कभी डिम्पी चांदभान का सहयोगी था। उसने बाद में चुनावी राजनीति में खुद हाथ आजमाया। 2012 के विधानसभा चुनाव में फाजिल्का से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, जिसमें उसे शिअद का मौन समर्थन प्राप्त था और भाजपा के सुरजीत कुमार ज्यानी से 1,700 से भी कम वोटों से हारा। रॉकी को 2016 में हिमाचल प्रदेश के परवानू के पास कथित तौर पर एक अन्य गैंगस्टर जयपाल भुल्लर ने गोली मार दी थी। उसकी बहन राजदीप कौर ने परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाया और कांग्रेस का टिकट न मिलने के बाद फाजिल्का से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा। उन्हें 38,000 से अधिक वोट मिले, लेकिन वे हार गईं। उन्होंने 2018 में सुखबीर सिंह बादल द्वारा संबोधित एक पोल खोल रैली में एसएडी में शामिल हुईं और इस अवसर पर उन्हें सिरोपा भेंट किया गया।

कई गैंगस्टरों ने आजमाई किस्मत

40 से अधिक आपराधिक मामलों में कुख्यात और सबसे वांछित गैंगस्टर जयपाल भुल्लर खुद 2021 में कोलकाता में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। उसके पिता, पंजाब पुलिस के सेवानिवृत्त निरीक्षक हरपाल भुल्लर ने एक समय चुनाव लड़ने की अपनी मंशा की घोषणा की थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। इसी तरह गुरदासपुर में जेल में बंद गैंगस्टर जग्गू भगवानपुरिया की मौसी राजविंदर कौर, जिसे इलाके में मासी के नाम से जाना जाता है, डेरा बाबा नानक क्षेत्र में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी हैं। वह पहले से ही डेरा बाबा नानक ब्लॉक समिति की चेयरपर्सन हैं और विधानसभा चुनाव में डेरा बाबा नानक सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा भी जाहिर कर दी है।

नाभा जेल ब्रेक का आरोपी है सेखों

गुरप्रीत सिंह सेखों का नाम पंजाब के कुख्यात गैंगस्टरों में लिया जाता है। साल 2016 में उसने साथियों के साथ पंजाब की हाई सिक्योरिटी जेल नाभा पर हमला कर 6 अपराधियों को फरार करवाया था। अगले साल उसे मोगा से गिरफ्तार कर लिया गया और वर्तमान में वह जमानत पर बाहर है। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक उस पर विभिन्न थानों में 47 केस लंबित हैं।

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