संघ @100

“सेवा किसी पर उपकार नहीं” : लंदन में RSS सरसंघचालक जी ने बताया- ‘शिव भावे जीव सेवा’ और ‘पंच परिवर्तन’ का महत्व

लंदन में RSS शताब्दी वर्ष पर आयोजित एक प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 'शिव भावे जीव सेवा', निस्वार्थ कार्य, पंच परिवर्तन और हिंदू समाज के संगठन पर प्रेरक विचार रखे।

Published by
Shivam Dixit

लंदन (यूनाइटेड किंगडम)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के पावन अवसर पर पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी 2 से 7 सितंबर 2026 तक यूनाइटेड किंगडम के महत्वपूर्ण प्रवास पर हैं. इस दौरान लंदन में आयोजित एक विस्तृत प्रश्नोत्तर एवं संवाद सत्र में सरसंघचालक जी ने सेवा के वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप, समाज संगठन के लक्ष्य, नई पीढ़ी के उत्तरदायित्व और संघ के ‘पंच परिवर्तन’ के संकल्प पर गहरा प्रकाश डाला.

सत्र को संबोधित करते हुए सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि जब हम किसी की सेवा करते हैं, तो हमें यह भ्रम बिल्कुल नहीं पालना चाहिए कि हम किसी पर अहसान कर रहे हैं. वास्तव में पीड़ित या जरूरतमंद व्यक्ति हमें अपनी सेवा का अवसर देकर हम पर उपकार कर रहा होता है.

“शिव भावे जीव सेवा”: सेवा ऐसी हो जो लेने वाले को भी दाता बना दे

स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस के ऐतिहासिक संवाद का स्मरण कराते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि सेवा में अहंकार का कोई स्थान नहीं हो सकता.

लंदन में आरएसएस सरसंघचालक जी के कार्यक्रम में उपस्थित लोग

“जब स्वामी विवेकानंद ने भारतीय समाज की दुर्दशा पर बात की, तो रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें टोकते हुए कहा था कि आप ऐसे बात कर रहे हैं जैसे आप उनके लिए बहुत बड़ा काम कर रहे हैं और आप किसी उच्च स्तर पर हैं! यह गलत है।

सामने वाले में भगवान को देखिए। वह आपको अपने पाप धोने का अवसर दे रहे हैं—’शिव भावे जीव सेवा’। सेवा ऐसी होनी चाहिए जो लेने वाले को भी भविष्य में देने वाला (दाता) बना दे।”

– सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

उन्होंने मराठी की एक प्रसिद्ध कविता का भाव साझा करते हुए कहा कि एक हाथ से देने वाला देता रहे और लेने वाला लेता रहे, लेकिन लेते-लेते लेने वाले के हाथ ऐसे बन जाएं कि वह भी दूसरों को देने योग्य हो जाए. यही सच्ची और स्वावलंबी सेवा का सार है.

लंदन कार्यक्रम में संबोधन करते हुए आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

अगले 20-30 वर्षों में पूरा करना है समाज संगठन का लक्ष्य

संघ के 100 वर्षों की यात्रा और आगामी शताब्दी की कार्ययोजना पर चर्चा करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि हिंदू समाज के संपूर्ण संगठन के कार्य में अब और 100 वर्ष नहीं लगने चाहिए. उन्होंने कहा कि यह कार्य अगले 20 से 30 वर्षों में पूरा हो जाना चाहिए और इसके लिए अनुकूल परिस्थितियां बन चुकी हैं.

  • व्यापक सामाजिक स्वीकृति: आज संघ की प्रामाणिकता और उपयोगिता को वे लोग भी भली-भांति स्वीकार करते हैं जो राजनीतिक रूप से मतभेद रखते हैं. संकट या आवश्यकता के समय सभी संघ की भूमिका की सराहना करते हैं.
  • बिना बैनर और बिना श्रेय का कार्य: स्वयंसेवक कश्मीर से कन्याकुमारी और पूर्वोत्तर से लद्दाख तक हर क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे बिना किसी प्रचार की भूख या श्रेय लिए जहाँ भी आवश्यकता होती है, सेवा कार्य में जुट जाते हैं.
  • निस्वार्थ भाव ही स्वयंसेवक की पहचान: यदि कोई व्यक्ति संघ का नाम या पूर्ण रूप (फुल फॉर्म) भी न जानता हो, लेकिन समाज के भले के लिए निस्वार्थ और ईमानदारी से कार्य कर रहा है, तो संघ उसे अपना ही स्वयंसेवक मानता है.
  • संगठित समाज का स्वरूप: पूरे समाज को मैदान में शाखा लगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि पूरा समाज एक ही दिशा में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, बिना किसी को धक्का दिए साथ चले—यही संगठित समाज की वास्तविक संकल्पना है.

आचरण में बदलाव के लिए ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान

सरसंघचालक जी ने कहा कि कानून और नीतियां समय के साथ बदलती रहती हैं, लेकिन वास्तविक और स्थायी प्रगति तभी संभव है जब समाज का दृष्टिकोण और आचरण बदले. इसके लिए संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ की पहल को आगे बढ़ाया है:

  • 1. सामाजिक समरसता: आपसी भेदभाव, जातिगत विषमता को मिटाकर सौहार्दपूर्ण समाज बनाना.
  • 2. कुटुंब प्रबोधन: परिवार में सांस्कृतिक संस्कारों, जीवन मूल्यों और परस्पर संवाद का संचार करना.
  • 3. पर्यावरण संरक्षण: इसके अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को तीन सरल कार्य अपनी आदत में शामिल करने होंगे—पानी बचाओ, प्लास्टिक हटाओ और पेड़ लगाओ.
  • 4. स्वबोध (स्वदेशी): अपनी पहचान और संस्कृति पर गर्व करना. स्वदेशी का अर्थ अलगाव नहीं है; अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आपसी निर्भरता के बीच भी देश को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाना ही सच्चा स्वदेशी है.
  • 5. नागरिक अनुशासन: नागरिक कर्तव्यों और नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना.
लंदन कार्यक्रम में संबोधन समापन के बाद आए हुए सभी लोगों का अभिवादन करते हुए RSS सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

विविधता में एकता का सूत्र: “जो जोड़ता है, उस पर बल दें”

सत्र के समापन पर जब यह सवाल उठा कि हिंदुओं में अनेक प्रकार की विविधताएं हैं तो एकता का सार क्या है? इस पर सरसंघचालक जी ने अत्यंत मार्मिक उत्तर दिया.

उन्होंने कहा कि समाज में विविधता पूरी तरह से स्वाभाविक है, लेकिन हमारी दृष्टि इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि वह कौन सा तत्व है जो हमें आपस में जोड़ता है, न कि उस पर जो हमें अलग करता है. जब समाज जोड़ने वाले बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करेगा, तब समाज समृद्ध होगा और संपूर्ण विश्व शांति व बंधुत्व के पथ पर आगे बढ़ेगा.

Share