लंदन (यूनाइटेड किंगडम)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी यूनाइटेड किंगडम (UK) के प्रवास पर हैं. लंदन में हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS UK) के 60 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक विशेष प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान सरसंघचालक जी ने ‘हिंदू’, ‘राष्ट्र’, और ‘कर्मभूमि के प्रति निष्ठा’ जैसे मौलिक विषयों पर अत्यंत सारगर्भित विचार रखे. उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी एक पंथ, संप्रदाय या उपासना पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि यह वह मानवीय प्रकृति है जो हर प्रकार की विविधता को स्वीकार करती है और उसका सम्मान करती है.
प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान जब उनसे पूछा गया कि समाज में सर्वाधिक उपयोग होने वाले लेकिन सबसे कम समझे जाने वाले शब्द ‘हिंदू’ और ‘राष्ट्र’ की वास्तविक परिभाषा क्या है, तो सरसंघचालक जी ने भारतीय दर्शन के गहरे सूत्रों से इन दोनों अवधारणाओं को स्पष्ट किया.
“हिंदू कोई मत-पंथ नहीं, यह सभी मार्गों को सत्य मानने वाली प्रकृति है”
सरसंघचालक जी ने कहा कि हिंदू को किसी एक धार्मिक अभ्यास, खान-पान या जीवन शैली के आधार पर नहीं समझा जा सकता. हिंदू वास्तव में एक ऐसी प्रकृति और समाज है जो यह मानता है कि सत्य तक पहुँचने के सभी रास्ते एक ही परम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं.

“जिस तरह आकाश से बरसने वाला सारा जल अंततः समुद्र में जाकर मिलता है, उसी प्रकार विभिन्न रुचियों और स्वाभावों के कारण रास्ते अलग हो सकते हैं, लेकिन गंतव्य एक ही है। एकता के लिए सबका एक समान (Uniform) होना जरूरी नहीं है। सभी विविधताएं वास्तव में एकता की ही विविध सजावटें हैं। भारत में नास्तिक से लेकर बहुदेववादी तक हर विचार का स्वागत हुआ है। हिंदू दृष्टि कहती है—’हम भी सही हैं और आप भी सही हैं’, इसलिए हमें एक-दूसरे को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है।” – सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी
‘राष्ट्र’ और पश्चिमी ‘नेशन-स्टेट’ का मूलभूत अंतर
सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि भारतीय चिंतन में ‘राष्ट्र’ शब्द पश्चिमी अवधारणा के ‘नेशन-स्टेट’ (Nation-State) का अनुवाद नहीं है. पश्चिम में राज्य (State) पहले बनता है, जहाँ लोग किसी भाषा, साझा भय, शासन प्रणाली या आर्थिक मजबूरी के चलते नियमों के तहत एक समूह में संगठित होते हैं. इसके विपरीत, भारत में राष्ट्र का विचार एक आध्यात्मिक और कल्याणकारी उद्देश्य से उत्पन्न हुआ.
- परोपकारी ऋषियों का तप: भारतीय राष्ट्र का निर्माण भद्र ऋषियों के कठोर तप, ज्ञान और लोक-कल्याण के संकल्प से हुआ. इसका उद्देश्य विश्व को यह सत्य बताना था कि विविधता स्वाभाविक है और एकात्मता ही शाश्वत सत्य है.
- राज्य व्यवस्था गौण, राष्ट्र शाश्वत: प्राचीन काल में धर्म के अनुशासन से समाज संचालित होता था, तब राजा या राज्य की आवश्यकता नहीं थी. कालान्तर में व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य और शासक आए. शासक, साम्राज्य और राजनीतिक व्यवस्थाएं समय के साथ बदलती रहीं—कभी चक्रवर्ती सम्राट रहे, कभी गणराज्य रहे, तो कभी विदेशी आक्रमण—परंतु सांस्कृतिक इकाई के रूप में भारत सदैव एक ‘राष्ट्र’ रहा.
- विश्व को आचरण की सीख: “एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥” अर्थात् भारत का उद्देश्य ऐसा श्रेष्ठ जीवन जीना है जिसे देखकर विश्व भर के लोग अपने-अपने देशों में अपने तरीके से श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा ले सकें. इस राष्ट्र की प्रगति कभी किसी पर तानाशाही थोपने या युद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और आनंद के लिए है.
“कर्मभूमि के प्रति हिंदू पूरी तरह वफादार”
संवाद के दौरान वेलिंगबरो टाउन काउंसिल के प्रतिनिधि द्वारा पूछे गए सवाल—‘यदि कभी ब्रिटिश और भारतीय हितों में टकराव की स्थिति आए, तो संघ एक ब्रिटिश स्वयंसेवक से क्या अपेक्षा रखता है?’—का उत्तर देते हुए सरसंघचालक जी ने दो-टूक और स्पष्ट मार्गदर्शन दिया.
“वास्तव में कोई टकराव नहीं है। लेकिन यदि ऐसी स्थिति कभी बनती है, तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि ब्रिटिश हिंदू को अपनी कर्मभूमि ब्रिटेन के साथ ही खड़ा होना चाहिए। हिंदुत्व का सिद्धांत पूरी तरह स्पष्ट है—आपकी कर्मभूमि वह है जहाँ आपकी निष्ठा है। हिंदुत्व कभी किसी को अपनी कर्मभूमि से गद्दारी करना नहीं सिखाता। मूल्य आपको अपनी जन्मभूमि या पुण्यभूमि से मिलते हैं, और उन मानवीय मूल्यों को आपको अपनी कर्मभूमि में जीना होता है।” – सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी
उन्होंने आगे कहा कि वैश्विक स्तर पर सोचते हुए स्थानीय स्तर पर काम करना (Think Globally, Act Locally) सनातन दृष्टि का ही अंग है. यदि किसी प्रवासी के पास अतिरिक्त समय, साधन और सामर्थ्य है, तो वह ब्रिटेन के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहते हुए भारत और संपूर्ण मानवता की सेवा में योगदान दे सकता है. इसमें कोई अंतर्विरोध नहीं है.
सेवा के लिए केवल ‘इच्छा’ की आवश्यकता: प्रेरक संस्मरण
अपने संबोधन में सरसंघचालक जी ने निस्वार्थ सेवा का एक अत्यंत भावुक और प्रेरक प्रसंग साझा किया. उन्होंने बताया कि वनवासी क्षेत्र में स्वयंसेवकों द्वारा संचालित एक छात्रावास में एक अत्यंत निर्धन, अशिक्षित युवक रोजगार की तलाश में आया. जब उसे कोई काम नहीं मिला, तो उसने छात्रावास में साफ-सफाई और पानी भरने का कार्य इस शर्त पर शुरू किया कि उसे मात्र 30 रुपये महीना दिया जाए ताकि वह अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सके.

सेवा और समर्पण की पराकाष्ठा:
चार महीने बाद जब उसे उसके पारिश्रमिक के 120 रुपये दिए गए, तो उसने वह धन वापस लौटा दिया. जब उससे कारण पूछा गया, तो उसने कहा—‘यहाँ जो संघ के प्रचारक आते हैं, वे उच्च शिक्षित हैं, अच्छे परिवारों से हैं और बिना एक भी पैसा लिए समाज के लिए जीवन दे रहे हैं. मैं तो केवल अपने हस्ताक्षर कर सकता हूँ, लेकिन क्या मैं बिना पैसे लिए अपने समाज और देश की सेवा नहीं कर सकता?’ इसके बाद वह युवक अगले 15 वर्षों तक बिना किसी पारिश्रमिक के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनकर समाज सेवा में समर्पित रहा.
सरसंघचालक जी ने कहा कि सेवा के लिए किसी पद, प्रतिष्ठा या अत्यधिक संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि केवल हृदय में सेवा का पवित्र भाव होना चाहिए. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आज की युवा पीढ़ी अधिक व्यापक सोच रखती है और यदि उन्हें सही दिशा व लक्ष्य दिया जाए, तो वे बिना किसी पूर्वाग्रह के विश्व को अधिक सुंदर और शांत बनाने में सक्षम हैं.
















