बात बासठ बरस पुरानी है।
मुंबई की एक जन्माष्टमी। शहर में उस दिन भी कान्हा के जन्म की तैयारियां रही होंगी। किसी घर में पालना सज रहा होगा, किसी मंदिर में माखन-मिश्री का भोग लग रहा होगा। माताएं अपने लड्डू गोपाल के लिए नन्हे वस्त्र निकाल रही होंगी और भक्त आधी रात की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
लेकिन उसी मुंबई के पवई में कुछ लोग एक दूसरी प्रतीक्षा में बैठे थे। वे उस चेतना के पुनर्जागरण की चिंता कर रहे थे, जो सदियों के संघर्षों के बाद भी इस देश की मिट्टी में जीवित थी। सांदीपनि साधनालय में संत बैठे थे। मनीषी बैठे थे। अलग-अलग मत-पंथ और परंपराओं से आए लोग बैठे थे। पूज्य सरसंघचालक श्री गुरुजी जी की प्रेरणा थी। दादा साहब आप्टे की संगठन-दृष्टि थी। स्वामी चिन्मयानंद जी का सान्निध्य था। राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज, मास्टर तारा सिंह, सुशील मुनि, के.एम. मुंशी जैसे अनेक मनीषी उस मंथन के सहभागी थे।
और प्रश्न बहुत सीधा था कि जिस हिंदू समाज को हजारों वर्षों की यात्रा मिटा नहीं सकी, उसे बिखरा हुआ क्यों रहने दिया जाए?
कोई शैव था। कोई वैष्णव। कोई जैन। कोई सिख। किसी की भाषा उत्तर की थी, किसी की दक्षिण की। उपासना के मार्ग अलग थे, लेकिन पुरखों की स्मृतियों में बहती सभ्यता की नदी एक थी।
उस दिन उसी नदी को अपनी धाराओं का परिचय कराया गया। और नाम रखा गया… विश्व हिन्दू परिषद।
जन्माष्टमी पर विश्व हिन्दू परिषद की नीव
कितना अद्भुत संयोग है!
जिस जन्माष्टमी पर कारागार के अंधकार में कृष्ण ने जन्म लेकर अन्याय के विरुद्ध धर्म की आशा जगाई थी, उसी जन्माष्टमी पर सदियों के संघर्षों से गुजरे हिंदू समाज को संगठित करने का एक संकल्प भी आकार ले रहा था।
तब कौन जानता था कि पवई में बोया गया यह छोटा-सा बीज एक दिन प्रयाग के संगम पर विराट दिखाई देगा।
संगम भी विचित्र जगह है। गंगा वहां अपना नाम लेकर आती हैं। यमुना अपना। सरस्वती की उपस्थिति अदृश्य मानी जाती है। लेकिन मिल जाने के बाद कोई नदी दूसरी से यह नहीं पूछती कि तुम्हारी धारा मेरी जैसी क्यों नहीं है।
संगम समानता नहीं, मांगता है आत्मीयता
संगम समानता नहीं मांगता, आत्मीयता मांगता है। शायद हिंदू समाज भी ऐसा ही है। और इसीलिए 1966 में जब प्रयाग की पुण्यभूमि पर प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन हुआ, तो अलग-अलग मत-पंथों के धर्माचार्यों को एक मंच पर देखकर लगा होगा जैसे भारत की बिखरी हुई आध्यात्मिक धाराएं स्वयं अपने संगम पर आ पहुंची हों।
लेकिन यात्रा केवल दूसरों को जोड़ने की नहीं थी। अपने भीतर झांकने की भी थी। अगर हम एक हैं तो फिर हमारे बीच कोई अस्पृश्य कैसे?
यदि हम एक ही भारत माता की संतान हैं तो जन्म के कारण कोई ऊंचा और कोई नीचा कैसे?
इसी आत्ममंथन की भूमि पर उडुपी से स्वर उठा…
“हिन्दवः सोदराः सर्वे, न हिन्दू पतितो भवेत।”
सभी हिंदू सहोदर हैं। कोई हिंदू पतित नहीं।
ध्यान दीजिए, समाज की वास्तविक शक्ति केवल यह कहने में नहीं है कि हम महान थे। समाज की शक्ति उस साहस में भी है जब वह अपने भीतर देखकर कह सके कि यह हमारी कमजोरी है और हमें इसे बदलना है।
इसीलिए संगठन के साथ समरसता चली। और समरसता जब हृदय में उतरती है तो उसका अगला नाम अपने आप सेवा हो जाता है। फिर परिषद वहां भी पहुंची जहां शायद कोई बड़ा मंच नहीं था।
वनवासी अंचलों में।
गिरिवासी क्षेत्रों में।
अभाव से जूझती बस्तियों में।
कहीं छात्रावास खुला। कहीं शिक्षा का छोटा-सा केंद्र। कहीं चिकित्सा की सेवा पहुंची।
क्योंकि किसी भूखे व्यक्ति के सामने संस्कृति पर भाषण देने से पहले उसके कंधे पर हाथ रखना पड़ता है।
धर्म केवल माथे का तिलक नहीं है। किसी की आंख का आंसू पोंछने के लिए बढ़ा हाथ भी धर्म है।
फिर 1983 आया।
भारत माता और गंगा माता रथों पर निकलीं और एकात्मता यात्रा देश के रास्तों पर चल पड़ी।
उत्तर से दक्षिण तक।
पूर्व से पश्चिम तक।
रास्ते में भाषा बदलती गई।
भोजन बदलता गया।
पहनावा बदलता गया।
लेकिन भारत नहीं बदला।
कहीं कोई वृद्ध आरती की थाली लेकर खड़ा था। कहीं बच्चे रथ देखने दौड़े चले आ रहे थे। कहीं पूरा गांव रास्ते के दोनों ओर खड़ा था।
जैसे भारत माता स्वयं अपने बच्चों के घर पहुंचकर कह रही हों…’तुम्हारी बोली अलग हो सकती है बेटा, तुम्हारी मां अलग नहीं है।’
और फिर इस यात्रा के सामने वह नाम आया जिसने परिषद के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया…
अयोध्या। राम की अयोध्या। कभी-कभी राष्ट्र के जीवन में कुछ प्रश्न जमीन के टुकड़े से बहुत बड़े हो जाते हैं। वे स्मृति के प्रश्न बन जाते हैं। स्वाभिमान के प्रश्न बन जाते हैं। वे यह पूछने लगते हैं कि कोई समाज अपने आराध्य, अपने इतिहास और अपनी सभ्यता को अपनी स्मृति में कितनी जगह देता है।
1984 से श्रीराम जन्मभूमि का संकल्प परिषद की धड़कन में और तेज सुनाई देने लगा। फिर राम का नाम गांव-गांव चला।
कहीं शिला पूजी गई।
कहीं यात्रा निकली।
कहीं किसी बूढ़ी मां ने अपनी कांपती उंगलियों से रामशिला पर रोली लगाई होगी। किसी किसान ने खेत से लौटकर अपनी श्रद्धा का अंश दिया होगा। किसी कार्यकर्ता ने घर में कहा होगा कि ‘जल्दी लौट आऊंगा’ और फिर जीवन के कई वर्ष उसी संकल्प को दे दिए होंगे।
बहुत से लोग मंदिर बनते नहीं देख पाए
सबसे मार्मिक बात यह है कि उनमें से बहुत से लोग मंदिर बनते हुए नहीं देख पाए।
जिन हाथों ने शिलाएं उठाईं, उनमें से कितने हाथ समय ने थाम लिए।
जिन आंखों ने रामलला के मंदिर का स्वप्न देखा, उनमें से कितनी आंखें उस दृश्य से पहले बंद हो गईं।
लेकिन उन्होंने संकल्प छोड़ा नहीं।
क्योंकि श्रद्धा की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि मनुष्य उस फल के लिए भी श्रम करे, जिसे शायद उसकी अपनी आंखें कभी न देख पाएं।
और फिर एक दिन अयोध्या में रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हुए।
कल्पना कीजिए उस क्षण को। मंदिर का शिखर सामने था। लेकिन उसकी नींव में केवल पत्थर नहीं थे। उसमें किसी संत की तपस्या थी।
किसी कार्यकर्ता का यौवन था। किसी मां की प्रार्थना थी। किसी कारसेवक का संकल्प था।
और उन असंख्य अनाम लोगों का विश्वास था, जिनके नाम शायद किसी शिलापट्ट पर कभी नहीं लिखे जाएंगे।
इतिहास की सबसे सुंदर बात यही है। वह बड़े नामों को दर्ज करता है, लेकिन बनता अक्सर अनाम लोगों के छोटे-छोटे त्याग से है।लेकिन अयोध्या परिषद की संघर्ष-यात्रा का अकेला अध्याय नहीं है। अमरनाथ यात्रा से रामसेतु आंदोलन तक, गौ-संरक्षण से धर्मांतरण के विरुद्ध जागरण तक, हिंदू समाज की आस्था, अस्मिता और मान-बिंदुओं से जुड़े प्रत्येक संघर्ष में परिषद ने अग्रणी भूमिका निभाई।
समय बदला और चुनौतियां
बासठ वर्षों में समय बदला है तो चुनौतियों के चेहरे भी बदले हैं। कहीं अवैध घुसपैठ और जनसंख्या-असंतुलन की चिंता है, कहीं आतंकवाद, नक्सलवाद और धर्मांतरण के प्रश्न, कहीं गौ-संरक्षण, गंगा और हिमालय जैसे सांस्कृतिक मानबिंदुओं की रक्षा का आग्रह है, तो कहीं युवाओं में बढ़ता नशा और परिवारों में संस्कारों का क्षरण।
हिंदू घरों में वैभव बढ़ा है, लेकिन उस वैभव की चमक में संस्कारों का दीप धुंधला न पड़ जाए, शायद आज की सबसे बड़ी चिंता यही है।
क्योंकि किसी सभ्यता की रक्षा केवल उसके संकटों का प्रतिकार करने से नहीं होती, अपनी अगली पीढ़ी के भीतर उसके संस्कार जीवित रखने से होती है।
VHP के 62 वर्ष
आज विश्व हिन्दू परिषद को बासठ वर्ष हो गए। पवई का वह छोटा-सा पौधा अब बहुत बड़ा हो चुका है। लेकिन किसी वृक्ष की महानता केवल उसकी ऊंचाई से नहीं मापी जाती। यह भी देखा जाता है कि उसकी छाया कितनों तक पहुंची। इसलिए विहिप की यात्रा केवल अयोध्या में नहीं खोजी जानी चाहिए।
वह उस वनवासी बच्चे की पुस्तक में भी मिलेगी, जिसके पास शिक्षा पहुंची। उस सेवा-कार्यकर्ता के पैरों की धूल में भी मिलेगी, जिसका नाम कोई नहीं जानता। उस संत की वाणी में भी, जिसने समाज से कहा कि कोई अपना अस्पृश्य नहीं।
उस मां की पूजा की थाली में भी, जिसने रामशिला पर अक्षत रखे।
और उस कार्यकर्ता के घर में भी, जिसके बच्चे ने कई त्योहार पिता की प्रतीक्षा करते हुए मनाए होंगे क्योंकि पिता कहीं संगठन के काम से निकले थे।
बासठ वर्ष बाद आज फिर जन्माष्टमी है। समय जैसे घूमकर वहीं आ खड़ा हुआ है।
फिर कान्हा के झूले सज रहे हैं। फिर माखन-मिश्री का भोग लगेगा। फिर आधी रात शंख बजेगा।
लेकिन पवई की उस जन्माष्टमी पर जलाया गया एक छोटा-सा दीप अब बासठ वर्षों की यात्रा देख चुका है।
रामलला का मंदिर बन गया है। पर यात्रा समाप्त नहीं हुई।
क्योंकि मंदिर बना लेना एक उपलब्धि है, राम को अपने आचरण में उतारना साधना है।
हिंदू समाज को संगठित करना उपलब्धि है, उसे समरस बनाना साधना है।
अपनी विरासत पर गर्व करना सहज है, उसे अपने बच्चों के संस्कारों में जीवित छोड़ जाना साधना है।
और संगठन आखिर होता भी क्या है?
कुछ लोग अपना समय देते हैं। कुछ अपना श्रम। कुछ अपनी प्रतिभा। कुछ अपने जीवन के सबसे सुंदर वर्ष।
फिर अगली पीढ़ी आती है और वहीं से ध्वजा उठा लेती है जहां पिछली पीढ़ी ने उसे छोड़ा था।
इसी तरह विचार यात्रा बनता है। यात्रा परंपरा बनती है। और परंपरा इतिहास।
उस जन्माष्टमी पर पवई में कुछ लोगों ने एक दीप जलाया था। बासठ वर्षों से हाथ बदलते रहे… दीप जलता रहा।
अब उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। क्योंकि सभ्यताएं केवल इसलिए अमर नहीं होतीं कि उनका इतिहास बहुत पुराना है।
वे इसलिए अमर होती हैं कि हर पीढ़ी अपने हिस्से का दीप बुझने से पहले अगली पीढ़ी के हाथ में रख देती है।
विश्व हिन्दू परिषद के स्थापना दिवस पर इस दीप को अपने श्रम, साधना और समर्पण से प्रज्वलित रखने वाले सभी संतों, मनीषियों तथा असंख्य ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं को प्रणाम।
संकल्प चलता रहे।
सेवा बढ़ती रहे।
समरसता गहरी होती रहे।
और सनातन का यह दीप पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रकाश देता रहे।

















