मैडिसन स्क्वायर गार्डन से मोहन भागवत का संदेश: विविधता, सह-अस्तित्व और भारतीयता के मूल्यों से अमेरिका में बंधा नया सूत्र
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मैडिसन स्क्वायर से श्री मोहन भागवत का संदेश: विविधता, सह-अस्तित्व और भारतीय मूल्यों से अमेरिका में बंधा नया सूत्र

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत का भाषण सुनकर अमेरिका की एक प्रचलित कहावत स्मरण हो आई “E Pluribus Unum” अर्थात अनेक से एक। भागवत जी ने कई ऐसे बिंदु चिह्नित किए जहां, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और अमेरिकी “E Pluribus Unum” परस्पर पूरक और पर्याय सिद्ध होते हैं।

Written byप्रवीण गुगनानीप्रवीण गुगनानी
Sep 3, 2026, 06:59 pm IST
inसंघ @100
श्री मोहनराव भागवत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक

श्री मोहनराव भागवत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक

न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत का भाषण सुनकर अमेरिका की एक प्रचलित कहावत स्मरण हो आई “E Pluribus Unum” (ई प्लूरिबस यूनम) अर्थात अनेक से एक। भागवत जी ने कई ऐसे बिंदु चिह्नित किए जहां, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और अमेरिकी “E Pluribus Unum” परस्पर पूरक और पर्याय सिद्ध होते हैं। सबसे बड़ी बात, उनका संदेश केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए नहीं था; उसमें भारत, भारतीयता, विविधता, सह-अस्तित्व और विश्व-मानवता के प्रति एक व्यापक दृष्टि का विकास क्रम था।

भागवत जी ने अपने प्रबोधन में विविधता को भारत की शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि भारत की एकता विविधताओं से सजती है और विविधता में केवल परस्पर एडजस्ट करना पर्याप्त नहीं है। विविधता को स्वीकार कर उसे सम्मान और संरक्षण भी देना होगा। यही भारतीय दर्शन है। धार्मिक, नस्लीय और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण के चक्र में फंसे वर्तमान विश्व हेतु यही आवश्यक है।

हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट वक्तव्य

सरसंघचालक जी के न्यूयॉर्क प्रबोधन से निकला सबसे महत्वपूर्ण संदेश हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर स्पष्ट वक्तव्य था। उन्होंने दो-टूक उस सोच को नकारा कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समाज को साझा पूर्वजों से जोड़ते हुए “समान डीएनए” की बात भी दोहराई। भारतीय-अमेरिकी समुदाय आज अमेरिका के सर्वाधिक सफल और प्रभावी प्रवासी समुदाय में से एक है। उसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अनेक भाषाई-सांस्कृतिक समूह शामिल हैं। यदि भारतीय मूल के लोग अपनी भारतीय पहचान को किसी एक धार्मिक पहचान तक सीमित न करके एक साझा सभ्यतागत पहचान के रूप में देखते हैं, तो अमेरिकी समाज में भारतीय समुदाय की एकता और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं।

अमेरिका में भारतीय मूल की पीढ़ी के लिए संदेश

भागवत जी का संदेश अमेरिका में भारतीय मूल की नई पीढ़ी के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। पहली पीढ़ी के प्रवासी प्रायः भारत से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, जबकि दूसरी और तीसरी पीढ़ी अमेरिकी सामाजिक परिवेश में पली-बढ़ी है। उनके सामने प्रश्न रहता है कि वे अपनी भारतीय सांस्कृतिक पहचान को अमेरिकी नागरिकता के साथ किस प्रकार संतुलित करें। भागवत जी का दृष्टिकोण इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर देता है, अमेरिका के प्रति पूर्ण निष्ठा और भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रति सम्मान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ‘अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहो’ विदेशी भूमि पर जाकर अपनों से यह कहने का सामर्थ्य, साहस और सहजता एक स्वयंसेवक या ‘संघ विचार’ के पास ही हो सकती है।

यह विचार भारतीय-अमेरिकी समुदाय को “Hyphenated Identity” (मिश्रित पहचान) की समस्या से मुक्ति देकर एक आत्मविश्वासी नागरिक की पहचान देता है। मोहन भागवत जी के कहे पर चलें तो अमेरिकी भारतीय युवा श्रेष्ठ अमेरिकी होते हुए भी अपनी भारतीय जड़ों पर गर्व कर सकते हैं। भागवत जी ने भारतीयता को केवल धार्मिक आग्रह के रूप में नहीं बल्कि साझा सांस्कृतिक और मानवीय विरासत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया। विश्व में अमेरिका अब एक सर्वाधिक विविधता भरा समाज बन गया है। अमेरीका को सौजन्यशाली विविधता देने में भारत का सबसे बड़ा योगदान है। अमेरिका में बसे अनेक प्रकार के भारतीय समुदाय आज अमेरिकी समाज को एक इंद्रधनुष का रूप देते हैं। यह हमारे लिए गौरवान्वित करने वाला विषय है।

अमेरिका को भी मिलेगा लाभ

भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की अर्थव्यवस्था, तकनीक, चिकित्सा, शिक्षा, उद्यमिता और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि इस समुदाय में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता बढ़ती है तो उसका लाभ अमेरिकी समाज को भी मिलेगा। सरसंघचालक जी ने भारतीय संस्कृति के प्रत्येक के रूप में तीन शब्द कहे “Acceptance, Respect and Protection” (स्वीकृति, सम्मान और संरक्षण)। उनके भाषण से यह पुनः सिद्ध हुआ कि ‘सहिष्णुता’ ‘Tolerance’ भारतीय शब्द है ही नहीं। भारतीयता का मूल स्वर है स्वीकार्यता। ‘Tolerance’ से तो अहम् व्यक्त होता है। ‘सहिष्णुता’ शब्द से स्वर आता है कि “तुम मुझे पसंद नहीं किंतु फिर भी तुम यहाँ रह लो”। Acceptance और Respect का अर्थ है, सभी समुदाय को स्वीकारता हूं और उनका सम्मान करता हूं।

जोहरान ममदानी ने मेयर पद की गरिमा की धूमिल

सरसंघचालक जी के न्यूयार्क प्रवास के विषय में जोहरान ममदानी तो मध्ययुगीन मुस्लिम सिद्ध हो गए हैं। जोहरान ममदानी ने अप्रासंगिक बातें करके न्यूयार्क के मेयर पद की गरिमा को ही ध्वस्त कर दिया। ममदानी को पता ही नहीं कि भारत का दृष्टिकोण “Pluralistic” और “Secular republic” से बहुत आगे बढ़कर “वयं राष्ट्रे जागृयाम” का है। जिस प्रकार के शब्द ममदानी ने कहे हैं, उससे तो लगता है वे अपनी दिमागी हालत की चिंता करें, भारत की नहीं। यदि ममदानी के मूल्य लोकतांत्रिक नहीं हैं। वे इस कार्यक्रम के निजी स्थान, सार्वजनिक स्थान, कार्यक्रम रोकने जैसे शब्दों को प्रयोग करके ‘फासिस्ट’ और ‘मध्ययुगीन मुस्लिम’ सिद्ध हो गए हैं।

जोहरान ममदानी ने अमेरिका के नागरिक और न्यूयार्क के मेयर की गरिमा के विरुद्ध जाकर यह व्यक्त किया कि यदि उनके पास अधिकार होते तो वे संघ प्रमुख को न्यूयार्क में भाषण ही नहीं देने देते। इससे अधिक शर्मनाक और वैचारिक निर्धनता भला और क्या हो सकती है। सरसंघचालक जी के भाषण के पूर्व ही “Exclusionary” जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले ममदानी इस भाषण के बाद अब वैचारिक रूप से कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह गए हैं।

न्यूयॉर्क के मेयर से नहीं किंतु ममदानी के घर जाकर आज उनसे प्रश्न किया जाना चाहिए कि वे अमेरिकी लोकतांत्रिक विचारों से इतने भिन्न क्यों हैं? और यदि वे न्यूयॉर्क नगर की सभ्यता, संस्कृति और सहजता को आत्मसात नहीं कर पा रहें हैं तो वे मेयर पद पर टिके ही क्यों हैं? ममदानी ने तो न्यूयार्क में “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ” के अधिकार पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

अमेरिका में एक नए विमर्श का आरंभ

भागवत जी के न्यूयॉर्क भाषण ने हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय सर्वसमावेशिकता, सर्व स्पर्शिता को बड़ी सहजता से स्थापित किया है। यद्यपि यह पहले भी स्थापित ही थी किंतु अब इसे एक नया आयाम मिल गया है। भारत के संदर्भ में अमेरिका में एक नए विमर्श का आरम्भ है, भागवत जी का यह वैचारिक प्रबोधन। “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और विविधता में एकता की परंपरा को मैडिसन स्क्वेयर से पुनर्परिभाषित करने हेतु मोहन राव जी का अभिनंदन कर रहा है ‘अमेरिकी भारतीय’ समुदाय। अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का अर्थ दूसरे की पहचान से घृणा करना नहीं है, यह सिद्ध करने हेतु भी वे अभिनन्दनीय हैं। अमेरिका कहावत “E Pluribus Unum”, अर्थात् ‘अनेक से एक’, को स्थापित करता और भारतीयता के मूल से जोड़ता यह संघ संवाद एक अद्भुत सार्थकता, स्वीकार्यता, सहजता व सामुदायिकता के भाव को जन्म देता है। कहना ही होगा कि यदि शिकागो से अमेरिका और समूचे विश्व को स्वामी विवेकानंद जी ने एक वैचारिक माला दी थी तो मोहन राव जी भागवत ने इस ‘विवेकानंद माला’ का पुनर्जाप ही किया है।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघश्री मोहन भागवतवसुधैव कुटुम्बकम्संघ के 100 वर्षसांस्कृतिक राष्ट्रवादमोहन भागवत अमेरिका दौराभारतीय-अमेरिकी समुदाय
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