सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥ सभी उपनिषद गाय हैं, गोपालनंदन कृष्ण उनके दुग्धदाता हैं, अर्जुन बछड़ा है और गीता उस ज्ञानरूपी दूध का अमृत है जिसे बुद्धिमान लोग ग्रहण करते हैं। कृष्णा कभी परमात्मा है, कभी अर्जुन के सखा है , कभी नंद बाबा के दुलारे कन्हैया, कभी गोपियों के माखन चोर और कभी ब्रज की गलियों में गायों के पीछे-पीछे चलता हुआ एक साधारण से ग्वाल बाल भी है। कृष्ण के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह जितने विराट है, उतने आत्मीय भी है। वह वेदांत के परम ब्रह्म है, तो ब्रज के कन्हैया भी है, अर्जुन के योगेश्वर है, उनका एक रूप संसार को गीता का ज्ञान देता है दूसरा रूप गायों के जीवन के सहज आनंद प्रेम और सह अस्तित्व का संदेश देता है। कृष्ण के इसी ब्रज रूप को समझने के लिए गोपाल नाम ब्रज की पूरी जीवन पद्धति का परिचायक है, जिसमें मनुष्य, पशु, ग्राम और प्रकृति एक दूसरे से अलग नहीं है।
कृष्ण का गोपाल स्वरूप
गोपाल शब्द संस्कृत के गो और पाल से बना अर्थात गायों का पालन करने वाला एवं गोविंदा का अर्थ है गाय की रक्षा और उसका पालन करने वाला। कृष्ण का यह नाम ब्रज के ग्रामीण पशुपालक समाज की पहचान है, कि वह राजमहलों के वैभव से कहीं अधिक गोकुल, वृंदावन, यमुना के तट, गोवर्धन और गोचरण से जुड़े दिखाई देते हैं। कृष्ण की बाल लीलाओं में ग्वालबालों के साथ गायों को चराने जाना, उन्हें वन और गोचर भूमि में ले जाना तथा उनकी देखभाल करना उनके जीवन का हिस् रहा है। यही कारण है कि ब्रज में कृष्ण की कल्पना राजसी वैभव में बैठे देवता की अपेक्षा ग्वाल-बाल, मुरलीधर और गोपाल के रूप में अधिक आत्मीय रही। कृष्ण के गोपाल नाम और ब्रज की संस्कृति को अलग-अलग नहीं कह सकते है। वे राजकुमार होने से पहले ब्रज के ग्वाल-बाल हैं; उनके हाथ में बांसुरी है, साथ में ग्वालसखा हैं और चारों ओर गायों के झुंड है । उनका यह गोपाल स्वरूप बज के पारंपरिक जीवन की गहरी सांस्कृतिक स्मृति है।
भारतीय परंपरा में गो शब्द के अनेक अर्थ मिलते हैं, जैसे गाय, पृथ्वी, इंद्रिय, प्रकाश या ज्ञान। गोपाल वह है जो ज्ञान की रक्षा करते है , उसका पोषण करते है और उसे लोक कल्याण के लिए उपलब्ध कराते है। वैष्णव परंपरा में कृष्ण का गोपाल नाम गोपालक के साथ-साथ, गोपाल वह जो मनुष्य की चंचल इंद्रियों एवं मन को संयमित करने में मार्गदर्शन देता है। भगवत गीता में कृष्ण का कर्म योग, ध्यान योग और समत्व का संदेश अंतत : मन और इंद्रियों की विजय की ओर ले जाता है। इसलिए कृष्ण मनुष्य के आंतरिक संस्कार के संसार के भी गोपाल है। एक अन्य अर्थ में गोपाल भूमि और ब्रजभूमि के संरक्षक है। कृष्ण का गोवर्धन से संबंध, वृंदावन के वन ,यमुना का तट, गोचर भूमि और बृजवासियों के साथ उनका संबंध बताता है। इसका इसका अर्थ है कि गोपाल वह है जो बाहर जीवन का पालन करें भीतर चेतना का संरक्षण करें और चारों ओर प्रकृति एवं लोक जीवन की रक्षा करे।
ब्रज की अर्थव्यवस्था और संस्कृति में गाय
ब्रज में गाय का महत्व आर्थिक रूप से दूध और दुग्ध उत्पाद ग्रामीण परिवारों के भोजन तथा आय के महत्वपूर्ण साधन थे। सामाजिक रूप से पशुपालन में समुदाय के जीवन, श्रम विभाजन और पारस्परिक सहयोग प्राप्त किया। वही सांस्कृतिक रूप से गए मातृत्व, समृद्धि, करुणा और संरक्षण का प्रतीक बन गई .गाय ग्रामीण परिवार की संपत्ति, पोषण और आय तीनों का आधार है। गाय से दूध -दही के साथ गोबर अन्य पशु उत्पाद ग्रामीण जीवन में उपयोगी है। गाय कृषि और पशुपालन के बीच एक प्राकृतिक सेतु का कार्य करते हैं क्योंकि गोबर का प्रयोग ईंधन, घरेलू उपयोग और खेतों के खाद के लिए प्रयोग किया जाता है। यही से गाय के आर्थिक महत्व से सांस्कृतिक महत्व भी जुड़ता चला गया और गौ माता की व्यापक सांस्कृतिक अवधारणा ब्रज में दिखाई देती है।
गोवर्धन और गोवंश: ब्रज की जीवनरेखा
कृष्ण के जीवन में गोवर्धन पर्वत का विशेष महत्व है। गोवर्धन बृजवासियों को चारा, जल और प्राकृतिक संसाधनों से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण भू-आकृति है। इसलिए गोवर्धन की पूजा स्थानीय प्रकृति और जीवन स्रोतों के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति मानी जाती है। वही ब्रज में गोपाष्टमी का विशेष सांस्कृतिक महत्व जब गायों को सजाना, उनकी पूजा करना और उनकी सेवा करना, कृष्ण के गोपाल स्वरूप से जुड़ी ब्रज की जीवंत परंपरा है। पौराणिक साहित्य में सुरभि और कामधेनु जैसी दिव्य गायों का उल्लेख मिलता है। भगवद्गीता के विभूति योग में कृष्ण कहते हैं “धेनूनामस्मि कामधुक्।” अर्थात् गायो में, मैं कामधेनु हूं, जो इच्छित वस्तु प्रदान करती है। लोक व्याख्या और आधुनिक सांस्कृतिक लेखन में कृष्ण और कंस के संघर्ष को कभी-कभी ब्रज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मथुरा की नगरीय सत्ता के बीच संसाधनों के नियंत्रण के रूप में भी देखा जाता है। ब्रज का गोधन और दुग्ध उत्पादन ग्रामीण समुदाय की आर्थिक शक्ति था, यदि उत्पादों का नियंत्रण गांव से निकलकर नगर या सत्त्ता के केंद्र के हाथ में चला जाए, तो ग्रामीण समुदाय की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती थी। इसी भाव को लोग काव्य में अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है गोकुलवासी क्यों गये, अर्थशास्त्र में भूल, माखन दुग्ध नगर चला, गाँव में उड़ती धूल। यहां की भक्ति परंपरा ने गाय को केवल पशु नहीं ममता, पोषण और करुणा के प्रतीक के रूप में देखा। रसखान ने भी लिखा मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
कृष्ण की बाल लीला में भी गौचारण का विशेष महत्व है। यहां के कभी गायों को उनके रंग रूप, स्वभाव के आधार पर अलग-अलग नाम से बुलाते हैं। सूरदास ने कृष्ण को गायों को पुकारते हुए चित्रित किया है, काँधे कान्ह कमरिया कारी, लकुट लिए कर घेरै हो। बृंदाबन मैं गाइ चरावै, धौरी, धूमरि टेरै हो॥ लै लिवाइ ग्वालनि बुलाइ कै, जहँ-जहँ बन-बन हेरै हो। श्रीकृष्ण का बांसुरी का वादन गोपाल और गाय के बीच बना एक विशिष्ट सम्बन्ध है। ब्रज में गाय धार्मिक मांगलिक कार्य और दान की परंपरा से जुड़ी हुई है। कृष्ण के जन्म के अवसर पर नंद द्वारा गायों का दान का वर्णन भक्ति काव्य में मिलता है। सूरदास जी से अत्यंत सुंदर ढंग से चित्रित करते हैं तहँ गैयाँ गनी न जाहिं, तरुनी बच्छ बढ़ीं। जे चरहिं जमुन कैं तीर, दूनैं दूध चढ़ीं॥ खुर ताँबैं, रूपैं पीठि, सोनैं सींग मढ़ीं। ते दीन्हीं द्विजनि अनेक, हरषि असीस पढ़ीं॥
आज के ब्रज में गाय का महत्व – संस्कृति, धर्म और अर्थव्यवस्था का जीवंत सेतु
आज का ब्रज आधुनिक पर्यटन, तीर्थाटन, शहरीकरण, बढ़ती आबादी और बदलती ग्रामीण व्यवस्था में गोवर्धन, वृंदावन ,बरसाना, नंदगांव और गोकुल के पारंपरिक जीवन को प्रभावित किया है, फिर भी इन परिवर्तनों में गाय की सांस्कृतिक निरंतरता आज भी दिखाई देती है। कृष्ण का गोपाल नाम बिना गाय के अधूरा है। आज बदलती अर्थव्यवस्था में दूध, दही, घी, मावा ,पेड़ा और अन्य दूध उत्पादन भी ब्रज की पहचान है। मथुरा का पेड़ा और ब्रज के दूध उत्पाद यहां की स्थानीय सांस्कृतिक ब्रांड है। गाय का गोबर जैविक खेती के रूप में एवं बायोगैस और जैव ऊर्जा का विकास हो रहा है। वैसे ब्रज की महिलाओं को दुग्ध सहकारी समितियां, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से घी मक्खन निर्माण, पारंपरिक मिठाइयां ,जैविक खाद, गोबर के उत्पाद आदि से जोड़ा जा सकता है, जिससे उनकी आय और आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। ब्रज की अर्थव्यवस्था में को गौ-पर्यटन से जोड़ा सकता है जहां गोवर्धन, गौशाला, जैविक ग्राम , दुग्ध उत्पादन केंद्र , ब्रज भोजन और स्थानीय हस्तशिल्प के अनुभव से पर्यटक जुड़ सके।
गोसेवा से लोककल्याण तक
देसी नस्लों के संरक्षण की आवश्यकता है जिसमें वैज्ञानिक प्रजनन , पशु चिकित्सा, पोषण और बेहतर पशुपालन पद्धतियों को जोड़ा जा सकता है। तीर्थ स्थलों के आसपास घूमती गाय ,मंदिरों के निकट गौ -सेवा एवं गोपाष्टमी का आयोजन आदि ब्रज की सामूहिक स्मृति को जीवित रखते हैं। इसलिए ब्रज की गाय कृष्ण की स्मृति है, ब्रज की संस्कृति है,किसान की आय हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कड़ी है और प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की परंपरा है। गोपाल वह है जो पालन करता है, गाय के पालन से जीवन का पोषण, इंद्रियों के पालन से चरित्र का निर्माण, बुद्धि के पालन से ज्ञान का विकास, भूमि के पालन से प्रकृति का संरक्षण, और समाज के पालन से लोककल्याण और इन सभी को कर्म, ज्ञान, भक्ति और साधना से जोड़ना ही कृष्ण का जीवन-दर्शन है।














