पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और उससे जुड़े ऊर्जा संकट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के कई संकेतक मजबूत प्रदर्शन दिखा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण सोमवार, 31 अगस्त को सामने आ सकता है, जब सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) अप्रैल-जून तिमाही (Q1) का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) डेटा जारी करेगा। GDP किसी देश की सीमाओं के अंदर एक निश्चित अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य होता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुसार, इस तिमाही में GDP ग्रोथ करीब 7% रह सकती है। लेकिन कई बैंकों और एजेंसियों के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह आंकड़ा केंद्रीय बैंक के अनुमान से कम से कम आधा प्रतिशत अंक ज्यादा हो सकता है। कुछ तो 8% तक पहुंचने की भी बात कर रहे हैं। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के अर्थशास्त्रियों का अनुमान 7.9% है। उन्होंने कहा कि भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमत औसतन 97 डॉलर प्रति बैरल रहने के बावजूद 8% के करीब ग्रोथ सकारात्मक सरप्राइज होगी।
पिछली तीन तिमाहियों में GDP ग्रोथ क्रमशः 8.3%, 8% और 7.8% रही थी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा ट्रैक किए जाने वाले 50 से ज्यादा आर्थिक संकेतकों में से 86% इस तिमाही में तेज हुए, जो पिछले साल अप्रैल-जून में 69% थे। एसबीआई का अनुमान भी करीब 8% ग्रोथ का है। इस मजबूत प्रदर्शन की मुख्य वजह बैंक लोन की मांग में आई तेजी है।
दशक का सबसे अच्छा लोन ग्रोथ
आमतौर पर नए वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही कॉरपोरेट प्रदर्शन और लोन मांग के मामले में सबसे कमजोर होती है। साल के आखिरी तिमाही की व्यस्तता के बाद गतिविधियां थम जाती हैं और कंपनियां आगे की योजना बनाती रहती हैं। लेकिन 2026-27 की पहली तिमाही बैंक लोन की मांग के मामले में एक दशक से ज्यादा समय में सबसे अच्छी रही।
आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक, जून के अंत तक बैंकों के नॉन-फूड लोन सालाना आधार पर 18.3% बढ़े। इससे पहले पहली तिमाही के अंत में इतनी तेज ग्रोथ जून 2012 में 18.7% रही थी। इसमें डेटा रिपोर्टिंग फॉर्मेट में बदलाव और पश्चिम एशिया युद्ध के कारण थोक महंगाई बढ़ने का भी कुछ असर है, लेकिन मांग के असल कारण भी मजबूत हैं।
जून के अंत तक उद्योग को दिए गए बैंक लोन 19.2%, सेवाओं को 21.4% और व्यक्तिगत लोन 15.8% बढ़े। पिछले साल जून में ये आंकड़े क्रमशः 6.3%, 8.8% और 11.7% थे।
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लोन पैटर्न में बदलाव
बारक्लेज के अर्थशास्त्रियों के अनुसार कोविड के बाद उद्योग से लोन मांग कृषि, सेवा और रिटेल से कम रहती थी। लेकिन 2025 के मध्य से स्थिति बदली। बड़े उद्योगों को बैंक क्रेडिट की ग्रोथ जून 2025 में 2% से बढ़कर जून 2026 में 16.6% हो गई। कोटक महिंद्रा बैंक के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि व्यक्तिगत लोन से उद्योग और सेवाओं की ओर शिफ्ट हो रहा है, जो अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों में मजबूत मांग दिखाता है। पश्चिम एशिया युद्ध की अनिश्चितताओं के बावजूद आर्थिक गतिविधि और क्रेडिट ग्रोथ बनी रही।
सिर्फ भारत में ही नहीं, चीन को छोड़कर एशिया में बैंक क्रेडिट ग्रोथ 8.5% रही, जो 18 साल में सबसे ज्यादा है। मॉर्गन स्टेनली के अनुसार इसमें पूंजीगत खर्च (कैपेक्स), व्यापार में उछाल और उत्पादक मूल्य सूचकांक महंगाई का योगदान है। एआई, डिजिटल इंफ्रा, ऊर्जा, रक्षा और औद्योगिक सप्लाई चेन में खर्च बढ़ने से एशिया अपना सबसे मजबूत औद्योगिक चक्र देख रहा है।
कंपनियों का प्रदर्शन
कंपनियां सिर्फ लोन ही नहीं ले रही हैं, बल्कि अच्छे वित्तीय नतीजे भी दिखा रही हैं। आरबीआई के 3,247 सूचीबद्ध गैर-सरकारी गैर-वित्तीय कंपनियों के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून में इनकी बिक्री सालाना 19.4% बढ़ी। पिछली तिमाही में यह 13.9% और पिछले साल इसी तिमाही में 5.5% थी। ऑपरेटिंग प्रॉफिट 19.3% बढ़ा, जो पिछली तिमाही के 9.8% और पिछले साल के 7.3% से दोगुने से भी ज्यादा है। यह तब हुआ जब कच्चे माल की लागत 25.3% और बिजली-ईंधन खर्च 19.3% बढ़ा। बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री अदिति गुप्ता के अनुसार ऊंची कीमतों के बावजूद बिक्री में मजबूत ग्रोथ बताती है कि असल गति अच्छी बनी हुई है। खपत और मैन्युफैक्चरिंग दोनों इंजन ग्रोथ को सपोर्ट कर रहे हैं।
















