जिस तरह युद्ध के संकटकाल में दुर्ग में रहने वाले लोग सुरक्षित बच जाते हैं; ठीक उसी तरह माँ दुर्गा की शरण में आये हुए की दुर्गति कदापि नहीं हो सकती। ‘दुर्गा’ शब्द का यही निहितार्थ है। इसीलिए वे दुर्गतिनाशिनी कहलाती हैं। हमारे वैदिक मनीषियों ने इन्हीं माँ दुर्गा के अर्चन वंदन के लिए ऋतुओं की संधिबेला में नवरात्र पर्वों की संकल्पना की थी। चैत्र नवरात्र पर्व से तो हमारे नवसंवत्सर ( हिन्दू नववर्ष ) का सुखद संयोग भी जुड़ा हुआ है। विचार करके तो देखिए ! माँ शक्ति के वंदन के साथ नववर्ष का अभिनन्दन ; क्या ही उत्कृष्ट परिकल्पना है हमारी महान ऋषि मनीषा की। नवरात्र की प्रासंगिकता उसकी सदुपयोगिता में निहित है। नवरात्र के नौ दिन मन, वाणी, कर्म तीनों में शुद्धता लाते हैं। इसकी साधना आत्मा, मन और शरीर का शोधन करती है। ऋग्वेद के देवी सूक्त तथा सामवेद के रात्रि सूक्त में शक्ति की साधना का वर्णन है।
आध्यात्मिक, आत्मिक, मानसिक, बौद्धिक सभी प्रकार की शक्ति प्राप्त करने हेतु उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन, साधना आदि का विधान हमारे पूर्वजों ने किया था। संतुलित-सात्विक भोजन, ध्यान-चिंतन-मनन से मनुष्य उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि आदि प्राप्त कर सकता है। यही नवरात्र साधना का मूल संदेश है।
माँ दुर्गा के नौ स्वरूप और स्त्री जीवन
नवरात्र काल में देशभर के देवीभक्त आदिशक्ति माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) का श्रद्धा-भक्ति से पूजन करते हैं। वैदिक परम्परा के अनुसार के माँ दुर्गा के यह नौ स्वरूप स्त्री जीवन ने विविध पड़ावों को परिलक्षित करते हैं। माँ दुर्गा का प्रथम “शैलपुत्री” स्वरूप स्त्री के कन्या रूप का, दूसरा “ब्रह्मचारिणी” स्वरूप स्त्री की कौमार्य अवस्था का, तीसरा “चंद्रघंटा” स्वरूप विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने का, चौथा “कूष्मांडा” स्वरूप नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भधारण की क्षमता का, पांचवा “स्कन्दमाता” स्वरूप संतान को जन्म देने वाली जननी का, छठा “कात्यायनी” स्वरूप संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री का, सातवां “कालरात्रि” स्वरूप अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने वाली स्त्री का, आठवां “महागौरी” स्वरूप संसार का उपकार करने वाली शक्ति का तथा नवां “सिद्धिदात्री” स्वरूप स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार में अपनी संतान को सिद्धि (समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली महाशक्ति का होता है।
कन्या पूजन के बिना नवरात्र अनुष्ठान अधूरा
अष्टमी या नवमी को कन्या भोज के उपरांत ही देवीभक्त अपना नवरात्र अनुष्ठान संपन्न करते हैं। कारण कि हमारी सनातन संस्कृति में कन्याओं को माँ दुर्गा का साक्षात स्वरूप माना जाता है। देवीभागवत पुराण में कन्या पूजन का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस वर्णन के अनुसार नवरात्र का पर्व कन्या भोज के बिना अधूरा है। कन्या पूजन के बिना नवरात्र अनुष्ठान सम्पूर्ण नहीं माना जाता। कन्या पूजन अर्थात स्त्रीशक्ति के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति। शास्त्रीय मान्यता है कि कन्याओं का सम्मान और पूजन से देवी माँ बहुत प्रसन्न होती हैं और मनोकामनाएं पूरी करती हैं। देवी पुराण में कहा गया है कि माँ शक्ति को जितनी प्रसन्नता कन्या भोज से मिलती है, उतनी प्रसन्नता हवन और दान से भी नहीं मिलती। यही कारण है कि सनातन धर्म के लोग सदियों से ही कन्या पूजन की परंपरा का निर्वाह करते आ रहे हैं। विशेषकर कलश स्थापना करने वालों और नौ दिन का व्रत रखने वालों को लिए कन्या भोज को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
आयु के अनुसार कन्या पूजन का महत्व
सनातनधर्म में नवरात्र उपासना की पूर्णाहुति पर अष्टमी या नवमी को नौ कन्याओं और एक लंगूर छोटे बालक के पूजन भोज की प्राचीन परंपरा है। इस बालक को भैरव बाबा का स्वरूप माना जाता है। आचार्य पंडित इन्दु प्रकाश मिश्र कन्या पूजन की इस प्राचीन परंपरा से जुड़ी रोचक जानकारी देते हैं। उनके अनुसार दो वर्ष से लेकर नौ वर्ष तक की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं। दो वर्ष की कन्या ‘कुमारी’ कहलाती है। इसके पूजन से प्रसन्न होकर माँ भक्त के जीवन की दु:ख और दरिद्रता दूर करती हैं। तीन वर्ष की कन्या ‘त्रिमूर्ति’ कहलाती है। इनके पूजन से धन-धान्य और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। चार वर्ष की कन्या को ‘कल्याणी’ माना जाता है। इनकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है।
पांच वर्ष की कन्या ‘रोहिणी’ कहलाती है। इसे पूजने से व्यक्ति रोगमुक्त हो जाता है। छह वर्ष की कन्या को ‘कालिका’ का रूप कहा गया है। इसके पूजन से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है। सात वर्ष की कन्या का रूप ‘चंडिका’ का है। इसकी पूजा करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। आठ वर्ष की कन्या ‘शाम्भवी’ कहलाती है। इनका पूजन करने से वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है। नौ वर्ष की कन्या ‘दुर्गा’ कहलाती है। इनका पूजन करने से शत्रुओं का नाश होता है तथा असाध्य कार्य पूर्ण होते हैं। ज्योतिष विज्ञान में भी कन्या पूजन को बहुत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि नवरात्र के दिनों में कन्याओं को देवी का रूप मानकर आदर-सत्कार करने एवं भोजन कराने से घर का वास्तुदोष दूर होता है।
कन्या पूजन का शास्त्रीय विधान
शास्त्रीय विधान के अनुसार नवरात्र अनुष्ठान की पूर्णाहुति पर यज्ञ हवन के उपरांत कन्याओं को आमंत्रित करने के बाद शुद्ध जल में हल्दी मिलाकर उनके चरण धोने चाहिए और श्रद्धा व सम्मानपूर्वक उन्हें सुन्दर आसन पर बैठाएं। उन्हें टीका लगाएं और कलाई पर रक्षासूत्र बांधें व माता की चुनरी आदि पहनाएं। फिर कच्चा नारियल, खीर, पूरी, चने, हलवा, केला आदि फलों का सात्विक भोजन प्रसाद प्रेम से परोसें। दुर्गा स्वरूप इन कन्याओं को कन्याओं को सुमधुर भोजन कराने के बाद प्रदक्षिणा कर उनके चरण स्पर्श करते हुए यथाशक्ति वस्त्र, फल और दक्षिणा देकर आदर से विदा करें।
वास्तविक कन्या पूजन या सिर्फ चिह्न पूजा
स्वस्थ पराम्पराएँ किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती हैं; किन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसा प्रतीत होता है कि हम अपनी भारतभूमि की कन्या पूजन की इस दिव्य पुरातन परम्परा को केवल चिह्नपूजा के रूप में अपनाए हुए हैं। जिस मूलभूत उद्देश्य से इसकी शुरुआत की गई होगी, उससे अब हमारा कोई मतलब ही नहीं रह गया है। यह स्थिति वास्तव में ढोने की ही है, निभाने की नहीं। इसका प्रमाण है – समाज में दिनों-दिन बढ़ता नारी का अपमान-शोषण। यह अत्यंत खेद का विषय है कि नारी के विविध रूपों कन्या, युवती, पुत्रवधू, पत्नी, माता, बहन, सहकर्मी आदि की आज हमारा समाज हर प्रकार से उपेक्षा, प्रताड़ना तथा हत्या तक कर रहा है। आज कन्या भ्रूण हत्या, छेड़छाड़, एसिड हमले, यौन शोषण, दुष्कर्म, दहेज उत्पीड़न, ऑनर किलिंग, घरेलू हिंसा जैसे घृणित पापकर्म किए जा रहे हैं और दूसरी ओर कन्या पूजन का दिखावा भी किया जा रहा है।
यह प्रश्न स्वयं से करना होगा कि क्या अपने परिवार में कन्या के जन्म लेने पर हम सचमुच खुशी मनाते हैं? क्या हम घर में लड़के- लड़की में भेदभाव नहीं करते? स्त्री को केवल पूजा या प्रताड़ना का केंद्र बनाकर हम उसे उचित सम्मान दे पा रहे हैं? क्या हमारे समाज में स्त्री को उसके नैसर्गिक अधिकार सहज ही प्राप्त हो रहे हैं? क्या हम एक विकसित, सभ्य, सुसंस्कृत समाज का हिस्सा कहलाने के अधिकारी हैं? वाकई गंभीर चिंतन का विषय है यह। आइये मिलकर भूल सुधारें और नवरात्र के इस शक्तिपर्व पर कन्या पूजन मूल तत्वदर्शन को हृदयंगम करने का संकल्प लें ताकि माँ शक्ति की आराधना का यह मंगल पर्व सही अर्थों में सार्थक हो सके।

















