पाकिस्तान में कई सरकारें आई और गईं, लेकिन बलूचिस्तान के लोगों पर अत्याचार नहीं थमें। इस अत्याचार के खिलाफ दशकों से बलोच आर्मी लगातार सशस्त्र संघर्ष कर रही है। हाल ही में खुद को आजाद घोषित करने के बाद अब वहां के लोगों ने पाकिस्तान से जुड़ी हर पहटान को खत्म करना शुरू कर दिया है।
इसके तहत बलोच लोग सड़कों, संस्थानों औऱ उन सभी सार्वजनिक जगहों का नाम बदलकर अपने बलिदानी लोगों के नाम पर करने का फैसला किया है, जो कि अंग्रेजी शासन या पाकिस्तान से जुड़े हैं। इसके तहत क्वेटा की सड़कों से जिन्ना, फातिमा और इकबाल का नाम मिटाने की तैयारी है।
क्षेत्र के नेताओं ने हर उस प्रतीक को मिटाने का फैसला किया है जो बलूच जनता की मूल पहचान से मेल नहीं खाता। यह केवल नामों को बदलने का प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि सदियों के संघर्ष के बाद अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपने शहीदों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक भावनात्मक प्रयास है।
क्वेटा की सड़कों से मिटेगा जिन्ना, फातिमा और इकबाल का नाम
बलूचिस्तान के प्रमुख शहरों, विशेषकर क्वेटा में सड़कों, अस्पतालों, हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक स्थलों के नाम अब उन महान हस्तियों और शहीदों के नाम पर रखे जा रहे हैं, जिन्होंने इस धरती के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। जिन्ना रोड को बदलकर ‘नवाब मेहराब खान रोड’ और फातिमा जिन्ना रोड को ‘दोस्त मोहम्मद बलूच रोड’ और इकबाल रोड का नाम बदलकर ‘गुलाम मोहम्मद बलूच रोड’ करने के प्रस्ताव इसी सांस्कृतिक स्वाभिमान का हिस्सा हैं। ब्रिटिश अस्पताल को ‘खैर बख्श मारी अस्पताल’ और पाकिस्तान हाईवे को ‘हरबयार हाईवे’ का नाम देने की तैयारी है।
पहचान की तलाश
बलोच नेता मीर यार बलोच के अनुसार, इस पूरी कवायद का उद्देश्य किसी राष्ट्र या उसकी जनता के प्रति दुर्भावना रखना बिल्कुल नहीं है, बल्कि अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी स्वतंत्र करना है। यह बदलाव बलूचिस्तान के उन अनगिनत लोगों के प्रति न्याय का भाव है जिनकी गौरवशाली गाथाएं इतिहास के पन्नों में दब गई थीं। यह कदम एक ऐसे भविष्य की नींव रखता है जहां आने वाली पीढ़ियां अपनी खुद की मिट्टी की खुशबू, उसके नायकों के बलिदान और उसकी संस्कृति पर गर्व महसूस कर सकेंगी।
बलूचों से शांति वार्ता की पहल
पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा बलूच विद्रोहियों से बातचीत की हालिया पेशकश सैन्य दमन की विफलता और प्रांतीय असंतोष को दबाने में असमर्थता को दर्शाती है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं, जहां इस वर्ष की दूसरी तिमाही में 96 प्रतिशत मौतें इनसे जुड़ी हैं। अकेले बलूचिस्तान में 265 मौतें हुईं। इस्लामाबाद लंबे समय से राजनीतिक समाधान से बचता रहा है और पारंपरिक रूप से सैन्य अभियानों पर निर्भर रहा है।
हालांकि, इस महीने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा वार्ता का आह्वान सैन्य दमन के रुख से बड़ा बदलाव या ध्यान भटकाने की कोशिश है, क्योंकि प्रांतीय स्तर पर सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक शिकायतों को दूर करने में सैन्य कार्रवाई विफल साबित हुई है। इससे पाक सरकार ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।











