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सिर्फ भाई-बहन का त्योहार नहीं, जानिए श्रावणी पूर्णिमा का वो रहस्य जो बहुत कम लोग जानते हैं

वैदिक भारत का समाज यदि वर्तमान की अपेक्षा कहीं अधिक उन्नत, व्यवस्थित एवं अनुशासित था तो इसके मूल में था श्रावणी पर्व के माध्यम से राष्ट्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति को जागृत करने का महासंकल्प।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Aug 24, 2026, 01:20 pm IST
inधर्म-संस्कृति
Raksha Bandhan 2026

Raksha Bandhan 2026

श्रावणी रक्षाबंधन हमारी सनातन हिन्दू संस्कृति का ऐसा वैदिक पर्व है जिसका दिव्य तत्वदर्शन आज की सामाजिक परिस्थितियों में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। वैदिक भारत का समाज यदि वर्तमान की अपेक्षा कहीं अधिक उन्नत, व्यवस्थित एवं अनुशासित था तो इसके मूल में था श्रावणी पर्व के माध्यम से राष्ट्र की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति को जागृत करने का महासंकल्प। वेदमंत्र है-तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु। यानी हम शिव (कल्याण) संकल्प वाले बनें क्योंकि शिव संकल्प ही सामाजिक बुराइयों को खत्म कर सकता है। हमारी महान ऋषि मनीषा ने वैदिक काल में इस पर्व का शुभारम्भ जीवनमूल्यों की रक्षा के संकल्प पर्व के रूप में किया था; क्योंकि उन्नत जीवन मूल्य ही किसी भी समाज के सुखी एवं समृद्ध जीवन की आधारशिला होते हैं।

श्रावणी पूर्णिमा को फलित हुआ था “एकोहं बहुस्यामं” का संकल्प

पौराणिक आख्यान है कि श्रावण मास की पूर्णिमा पर परम ब्रह्म का “एकोहं बहुस्यामं” का संकल्प फलित हुआ था। देश के जाने माने संत प्रेमानंद महाराज परम ब्रह्म के “एकोहं बहुस्यामं” के संकल्प की बेहद सुंदर व सरल व्याख्या करते हुए कहते हैं कि इस सृष्टि की रचना के पीछे भगवान की खेलने की इच्छा निहित है। वे शास्त्रोक्त वाक्य एकोहं बहुस्याम (मैं एक हूं, बहुत हो जाऊं) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जब परमात्मा के मन में अकेलेपन के बजाय खेलने का भाव आया, तो उन्होंने स्वयं को ही जड़ और चैतन्य के रूप में विस्तार दे दिया। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन जगत पालक श्रीहरि की नाभि से कमलनाल निकली और उसमें से कमल पुष्प विकसित हुआ। फिर उस कमल पुष्प पर सृष्टि के रचनाकार ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने समूचे विश्व ब्रह्माण्ड का सृजन किया।

श्रावणी उपाकर्म और यज्ञोपवीत का दिव्य तत्वदर्शन

वैदिककाल में ऋषियों ने वेदाध्ययन के शुभारम्भ के लिए श्रावणी पूर्णिमा का दिन निर्धारित किया था। पंडित श्रीरामशर्मा आचार्य लिखते हैं कि वैदिक युग में  गुरुकुल के आचार्यगण इसी शुभ दिन श्रावणी उपाकर्म के उपरांत अपने शिष्यों को अभिमंत्रित रक्षासूत्र बांध कर उन्हें ‘द्विज’ के रूप में स्वीकार कर उन्हें वेदाध्ययन करने की पात्रता देते थे। इसके पीछे वैदिक मनीषियों का मूल चिंतन यह था कि माँ के गर्भ से जीव पूर्व जन्मों के अनेक अच्छे बुरे संस्कार लेकर इस  दुनिया में आता है। वेदों के रूप में ईश्वरीय वाणी को ग्रहण करने के लिये जीव  की अन्तर्वाह्य चित्त शुद्धि अनिवार्य होती है। इसी कारण श्रावणी उपाकर्म के क्रम में दश स्नान, हेमाद्रि संकल्प, प्रायश्चित विधान व यज्ञोपवीत धारण व वैदिक यज्ञ आदि  कर्मकांड अनिवार्य होते हैं।

श्रावणी उपाकर्म के इस कर्मकांड को लेकर  वैदिक मनीषियों की मान्यता है कि अंतस में ब्राह्मी चेतना के अवतरण के लिए साधक में “द्विजत्व” ( दूसरा जन्म ) का जागरण जरूरी होता है। आज भी देश के अनेक प्राचीन गुरुकुलों में ‘द्विजत्व’ धारण के प्रतीक रूप में श्रावणी पर्व पर तीन लड़ों के यज्ञोपवीत धारण की परम्परा कायम है। यज्ञोपवीत (जनेऊ) की तीन-तीन धागों की तीन लड़ें इस बात की प्रतीक होती हैं कि मानव जीवन तीन क्षेत्रों में बंटा है -आत्मिक, बौद्धिक और सांसारिक। इनमें से हर एक में जो तीन-तीन तार होते हैं उनका तात्पर्य उनके तीन-तीन गुणों से है। आत्मिक क्षेत्र के तीन प्रमुख गुण हैं- विवेक, पवित्रता व शान्ति। बौद्धिक क्षेत्र के तीन गुण हैं- साहस, स्थिरता और कर्तव्यनिष्ठा तथा सांसारिक क्षेत्र के तीन गुण हैं -स्वास्थ्य, धन व सहयोग। जरा विचार कीजिए कि जिस जनेऊ को आज की युवा पीढ़ी व तथाकथित सभ्य व उन्नत समाज दकियानूसी सोच का प्रतीक मानता है उसके पीछे कितना गहन तत्वदर्शन निहित है हमारे पूर्वजों का। वैदिक चिंतन के मुताबिक “द्विजत्व” धारण करने का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण कुल में जन्म लेने तक सीमित नहीं है; अपितु ज्ञान और कर्म के संकल्पित समन्वय से प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर यह पात्रता विकसित कर सकता है।

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