श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन का पर्व भारत के विभिन्न राज्यों में स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुसार अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। यह पर्व सिर्फ भाई-बहन के प्यार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका जुड़ाव कृषि, धार्मिक अनुष्ठान, समुद्र और प्रकृति से भी है। देश के विभिन्न राज्यों में इसे मनाने की परंपराएं भी अलग-अलग हैं।
उत्तर भारत में ‘रक्षाबंधन’ का पर्व ‘राखी पूर्णिमा’ और ‘सलूनो’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रंग-बिरंगी राखी बांध कर, माथे पर तिलक लगाकर और आरती उतार कर उसका मुंह मीठा कराकर उनके सुखी, स्वस्थ व दीर्घ जीवन की कामना करती हैं और प्रतिदान में भाई अपनी बहनों को शगुन व उपहार देकर उनकी सुरक्षा का वचन देते हैं। उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली ब्रजधाम में रक्षाबंधन का उत्साह देखते ही बनता है। इस दिन यहाँ मंदिरों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। सावन मास में हरियाली तीज यानी श्रावण शुक्ल तृतीया से शुरू होने वाला ठाकुर जी का झूला-उत्सव श्रावणी पूर्णिमा को कृष्ण प्रतिमा को रक्षासूत्र अर्पित के साथ संपन्न होता है। इसके पीछे ब्रज वासियों का दिव्य भाव यह होता है कि द्रौपदी के समान प्रभु उनकी भी सदैव रक्षा करते रहें।
कजरी पूर्णिमा में भाई की मंगलकामना
बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पर यह पर्व ‘कजरी पूर्णिमा’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस उत्सव की तैयारी श्रावण अमावस्या के दिन से शुरू हो जाती है। ‘नवमी’ तिथि को इन क्षेत्रों में महिलाएँ देवी गीत गाते हुए नदी, तालाब व पवित्र पेड़ों के पास की मिट्टी घर लाकर उनमें जौ बोती हैं और श्रावणी (कजरी) पूर्णिमा के दिन जौ के नवांकुरों को घर परिवार, विशेष रूप से भाई की मंगलकामना की प्रार्थना के साथ किसी तालाब या नदी में विसर्जित करती हैं। विवाहित महिलाएं इस दिन अच्छी फसल के लिए देवी भगवती से प्रार्थना करती हैं। लोकगीत और लोक नृत्य इस पर्व को मनभावन बना देते हैं। छत्तीसगढ़ के वैद्यनाथ धाम में लगने वाले एक माह के श्रावणी मेले का समापन भी भगवान भोलेनाथ के अभिषेक के साथ इसी दिन होता है। दक्षिण भारत की बात करें तो इस क्षेत्र के केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व तेलंगाना के पारंपरिक हिन्दू परिवारों में श्रावण पूर्णिमा का पर्व ‘अवनि अवित्तम’ नाम से मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन इन राज्यों में ब्राह्मण पुरुष अपनी पवित्र जनेऊ (यज्ञोपवीत ) बदलते हैं और विशेष पूजा-पाठ करते हैं। माना जाता है कि इससे भगवान और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
उत्तराखंड में ‘जनेऊ पूर्णिमा’ और बग्वाल की परंपरा
उत्तराखंड के लोगों के बीच यह त्योहार रक्षाबंधन बंधन के साथ ‘जनेऊ पूर्णिमा’ के नाम से भी लोकप्रिय है। दक्षिण भारत की तरह यहाँ भी इस दिन यज्ञोपवीत बदलने की प्राचीन परंपरा है। पर्वतीय अंचल के लोग इस दिन प्रातः काल पवित्र नदियों या कुंडों पर जाकर स्नान करते हैं और अपना पुराना जनेऊ बदलकर नया जनेऊ धारण करते हैं। इसे ही स्थानीय भाषा में ‘जन्यू-पुन्यू’ कहा जाता है। गढ़वाल के चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध बंसी नारायण मंदिर साल में केवल एक दिन यानी श्रावणी पूर्णिमा के दिन आम भक्तों के लिए खुलता है। इस दिन यहाँ भगवान विष्णु की पूजा होती है और सबसे पहले महिलाएं उन्हें राखी बांधती हैं। इसी तरह कुमाऊं के चंपावत जिले के देवीधूरा में माता वाराही देवी के मंदिर में रक्षाबंधन के दिन प्रसिद्ध ‘बग्वाल’ (मेला) लगता है। पौराणिक काल से चले आ रहे इस मेले में पहले दो पक्षों के बीच पाषण युद्ध होता था और लोगों की देह से निकले रक्त से देवी का अभिषेक होता था। इसके पीछे देवी माँ को जीवन अर्पित करने का भाव था। किन्तु कुछ वर्ष पूर्व इस ‘बग्वाल’ में दोनों पक्षों के बीच विवाद होने के बाद से उच्च न्यायालय के आदेश के बाद अब यह सांकेतिक युद्ध फूलों और फलों से खेला जाने लगा है।
बंगाल में ‘झूलन पूर्णिमा’ और आजादी का संकल्प
पश्चिम बंगाल में यह त्योहार सावन मास शुक्ल एकादशी से शुरू होता है और रक्षाबंधन इसका आखिरी दिन होता है। इसे यहां ‘झूलन पूर्णिमा’ के नाम से मनाया जाता है। इस दिन यहां राधा और कृष्ण को झूला झुलाने की प्राचीन परम्परा है। मान्यता है इससे जीवन के हर उतार-चढ़ाव, ऊंच-नीच को सहन करने की शक्ति मिलती है। जानना दिलचस्प हो कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान बंग भूमि में जनजागरण के लिये श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी श्रावणी पूर्णिमा पर्व को आधार बनाया था। रक्षाबंधन के दिन सैकड़ों लोगों ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के साथ सड़क पर उतरकर एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बांध कर ब्रिटिश दासता को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था।
ओडिशा में गम्हा, महाराष्ट्र-गोवा में नारियल पूर्णिमा
ओडिशा राज्य में यह पर्व ‘गम्हा पूर्णिमा’ के नाम से मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के बंधन के साथ मवेशियों को भी समर्पित होता है। इस दिन किसान अपने कृषि सहायक गायों और बैलों को सजाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। इस अवसर पर गुड़-शक्कर, नारियल और चावल के आटे का भोग बनाकर गोवंश को अर्पित करते हैं। महाराष्ट्र और गोवा जैसे तटीय राज्यों में इस पर्व को रक्षाबंधन के साथ ‘नारियल पूर्णिमा’ के रूप में भी मनाया जाता है। यहां के मछुआरों के लिए यह त्योहार सबसे खास होता है। इस अवसर पर मछुआरा समुदाय के लोग समुद्र देवता वरुण की पूजा करते हैं और नारियल अर्पित करते हैं और प्रसाद के रूप में भी नारियल बांटते हैं। जो पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
गुजरात में पवित्रोपना, राजस्थान में लुंबा राखी और पंजाब में रखड़ी
गुजरात में इस त्योहार का स्वरूप ‘पवित्रोपना’ का होता है। श्रावण मास की पूर्णिमा पर इस राज्य में भगवान शिव की पूजा बेहद धूमधाम से की जाती है। सावन के आखिरी दिन पर यहाँ शिवजी के रुद्राभिषेक की खास मान्यता है। रक्षाबंधन के पर्व पर स्थानीय शिव मंदिरों में देव दर्शन कर प्रसाद चढ़ाने के बाद बहनें अपने भाइयों की सफलता और दीर्घायु की प्रार्थना के साथ उनकी कलाई पर राखी सजाती हैं। राजस्थान में रक्षाबंधन को ‘लुंबा राखी’ के नाम से मनाया जाता है। यहां बहनें भाई के साथ-साथ भाभी (भाई की पत्नी) की कलाई पर भी राखी बांधती हैं। इसे यहां लुंबा राखी कहा जाता है। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि भाभी जो कि भाई की अर्द्धांगिनी होती है, उन्हें भी राखी बांधने से ही रक्षाबंधन पूर्ण माना जाता है। इस अवसर पर बनने वाला पारंपरिक मीठा व्यंजन ‘घेवर’ आज रक्षाबंधन की पारंपरिक मिठाई के रूप में पूरे देश में लोकप्रिय हो चुका है। पंजाब में श्रावणी पूर्णिमा को स्थानीय भाषा में ‘रखड़ी’ कहा जाता है। अमृतसर के बाबा बकाला साहिब में इस दिन बहुत बड़ा ऐतिहासिक मेला लगता है।
कश्मीर में छड़ी मुबारक, हिमाचल में शिवपूजन और तर्पण
कश्मीर राज्य में भगवान शिव की पवित्र छड़ी (छड़ी मुबारक) पारंपरिक मार्गों से यात्रा करती हुई श्रावणी पूर्णिमा के दिन अमरनाथ की पवित्र गुफा में पहुँचती है। इस दिन कश्मीरी पंडित और देश भर से आए साधु-संत मिलकर विशेष पूजा-अर्चना और प्रार्थना करते हैं। साथ ही गुरु पूर्णिमा से प्रारम्भ होने वाली बाबा बर्फानी श्री अमरनाथ की विख्यात वार्षिक तीर्थयात्रा श्रावणी पूर्णिमा के दिन संपन्न होती है। इस उपलक्ष्य में इस दिव्य तीर्थ पर प्रत्येक वर्ष एक बड़े धार्मिक मेले का आयोजन होता है। हिमाचल प्रदेश में श्रावणी पूर्णिमा के दिन बड़े पैमाने पर शिवालयों में शिवलिंग पर जलाभिषेक किया जाता है। इस राज्य में भी इस दिन नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इस दिन इस राज्य में भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी का पूजन भी विशेष फलदायी माना जाता है। देव पूजा के बाद बहनों द्वारा भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इस दिन यहाँ देव, ऋषि और पितरों के निमित्त तर्पण तथा गाय को चारा एवं अन्न दान करने की भी परंपरा है।
















