नई दिल्ली । नक्सली हिंसा को अक्सर केवल मुठभेड़, गोलीबारी और बारूदी सुरंगों के आधिकारिक आंकड़ों तक सीमित करके देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे उन परिवारों की अनगिनत और असहनीय पीड़ाएं छिपी हैं, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया है, अपनों को जीवनभर के लिए दिव्यांग होते देखा है और वर्षों बाद भी उस बर्बर हिंसा के जख्मों को अपने शरीर और आत्मा पर ढो रहे हैं.
नक्सली हिंसा केवल सुरक्षा बलों पर हमला नहीं, बल्कि निर्दोष ग्रामीणों, वनवासियों और आम नागरिकों पर मानवता के विरुद्ध किया गया जघन्य अपराध है.
हाल के दिनों में पी. चिदंबरम, अरविंद केजरीवाल और महबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं द्वारा ‘दिमागी नक्सल’ (अर्बन नक्सल) होने को लेकर दिए गए बयानों से आहत होकर बस्तर और कांकेर के पीड़ित, दिव्यांग जवान व शहीद परिवारों के सदस्य देश की राजधानी दिल्ली पहुंचे हैं.
वे यह बताने आए हैं कि जिस नक्सलवाद को कुछ लोग बौद्धिक जामा पहनाते हैं, उसकी असली कीमत बस्तर के निर्दोष नागरिकों और वीर जवानों ने अपना खून देकर चुकाई है.
बस्तर के 11 पीड़ितों और परिवारों की आपबीती: जख्म जो कभी नहीं भरते
| क्र. | नाम एवं क्षेत्र | श्रेणी / पहचान | नक्सली हिंसा का दर्दनाक ब्योरा |
|---|---|---|---|
| 1 | श्री गौतरीराम विश्वकर्मा (कांकेर) | नक्सली हिंसा पीड़ित (दिव्यांग) | 22 सितंबर 2009 को घर से अगवा कर सीने-पेट में 3 गोलियां मारीं; मलेरिया के दौरान इलाज तक नहीं कराने दिया. |
| 2 | श्री सियाराम रामटेके (कांकेर) | नक्सली हिंसा पीड़ित (दिव्यांग) | 9 अक्टूबर 2022 को खेत में 4-5 गोलियां व पत्थरों से हमला; आज व्हीलचेयर और वॉकर के सहारे जीने को मजबूर. |
| 3 | श्रीमती आरती उडके (कांकेर) | बलिदानी आरक्षक मोहन उडके की पत्नी | 11 अप्रैल 2015 को सुकमा के पिडमेल मुठभेड़ में पति ने दिया सर्वोच्च बलिदान; परिवार ढो रहा जीवनभर का दर्द. |
| 4 | तामेश्वर सिन्हा ‘मोनू’ (कांकेर) | बलिदानी सालिक राम सिन्हा के पुत्र | 20 मई 2008 को दंतेवाड़ा के चोलनार में आईईडी विस्फोट में पिता का बलिदान; परिवार का सहारा छिन गया. |
| 5 | आर. 712 अमर सिंह कुमेटी (कांकेर) | घायल सीजी पुलिस जवान | 19 मई 2006 को छिंदपाल में प्रेशर बम विस्फोट में एक पैर पूरी तरह क्षतिग्रस्त, आजीवन दिव्यांगता. |
| 6 | प्र.आर. 381 तरुण कलाकार (कांकेर) | घायल सीजी पुलिस जवान | 26 अप्रैल 2007 को लैंडमाइन ब्लास्ट व अंधाधुंध फायरिंग में रीढ़ की हड्डी में गंभीर फ्रैक्चर; चलने-फिरने में असमर्थ. |
| 7 | नंदलाल मुड़ामी (दंतेवाड़ा) | नक्सल हिंसा में गंभीर घायल ग्रामीण | 28 अक्टूबर 2018 को घर में खाना खाते वक्त कुल्हाड़ी-बंडा से प्राणघातक हमला; एयरलिफ्ट कर रायपुर ले जाया गया. |
| 8 | मुन्ना मरकाम (दंतेवाड़ा) | मृतक लक्ष्मण मरकाम के भाई | 22 जुलाई 2011 को गांव में नक्सलियों ने भाई की गोली मारकर हत्या कर दी; परिवार का भविष्य अंधकारमय. |
| 9 | अवलम मारा (बीजापुर) | नक्सल पीड़ित घायल ग्रामीण | 22 फरवरी 2017 को जंगल में बांस काटने जाते समय प्रेशर बम की चपेट में आए; बायां पैर गंवाना पड़ा. |
| 10 | रुद्रेश सिंह | घायल सीआरपीएफ कोबरा जवान | 25 जनवरी 2026 को आईईडी विस्फोट और फायरिंग में दोनों घुटनों के नीचे से पैर काटने पड़े (एम्स दिल्ली में उपचार). |
| 11 | श्रीमती कर्मावती | बलिदानी सहायक कमांडेंट रामपाल सिंह की पत्नी | 10 जून 2009 को बीजापुर के करशूली में 85वीं बटालियन सीआरपीएफ के सहायक कमांडेंट अदम्य साहस दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. |
एक-एक पीड़ितों का दर्दनाक ब्योरा: जानिए क्या बीती इन परिवारों पर
1. श्री गौतरीराम विश्वकर्मा (निवास: कांकेर) – गोलियों से छलनी हुआ जीवन
22 सितंबर 2009 को नक्सलियों ने उन्हें घर से अगवा कर ग्राम माटका (थाना दुर्गकोंदल) के जंगल में ले जाकर सीने और पेट में तीन गोलियां मारीं. मृत समझकर उन्हें वहीं छोड़ दिया गया. किसी तरह उनकी जान बची, लेकिन वे दोबारा सामान्य जीवन नहीं जी सके. मलेरिया से पीड़ित होने के बावजूद नक्सलियों ने उन्हें इलाज तक नहीं कराने दिया. एक गोली ने शरीर घायल किया, लेकिन हिंसा ने पूरी जिंदगी अपंग बना दी.
2. श्री सियाराम रामटेके (निवास: कांकेर) – आज भी सहारे के मोहताज
9 अक्टूबर 2022 को ग्राम चारगांव (थाना सिकसोड़) में अपने खेत का हाल जानने गए सियाराम रामटेके पर नक्सलियों ने 4 से 5 गोलियां चला दीं. एक गोली पीठ के आरपार हो गई, दूसरी कमर में धंस गई और पत्थरों से सिर व पैरों पर वार किया गया. ग्रामीणों के पहुंचने से जान तो बच गई, लेकिन आज वे जीवनभर के लिए व्हीलचेयर और वॉकर के मोहताज हो चुके हैं.
3. श्रीमती आरती उडके (निवास: कांकेर) – पति के बलिदान का दर्द
11 अप्रैल 2015 को सुकमा जिले के चिंतागुफा क्षेत्र स्थित पिडमेल के जंगलों में मुठभेड़ के दौरान आरक्षक मोहन उडके ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए. बलिदान देश के लिए गौरव बना, लेकिन पत्नी और परिवार के लिए यह जीवनभर का असहनीय दर्द छोड़ गई.
4. तामेश्वर सिन्हा ‘मोनू’ (निवास: कांकेर) – बारूदी सुरंग ने छीना पिता का साया
20 मई 2008 को दंतेवाड़ा के चोलनार, परपा चौक और मडई नाला पुलिया के पास नक्सलियों द्वारा बिछाई गई आईईडी विस्फोट में सहायक आरक्षक सालिक राम सिन्हा बलिदान हो गए. इस आघात ने पूरे परिवार का भविष्य अंधकारमय कर दिया.
5. आर. 712 अमर सिंह कुमेटी (निवास: कांकेर) – जीवनभर की दिव्यांगता
19 मई 2006 को ग्राम छिंदपाल (थाना बड़गांव) में पुलिस पार्टी को निशाना बनाकर किए गए प्रेशर बम ब्लास्ट में उनका एक पैर पूरी तरह उड़ गया और दूसरा पैर भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया. सुरक्षा का फर्ज निभाते हुए यह जवान जीवनभर के लिए दिव्यांग हो गया.
6. प्र.आर. 381 तरुण कलाकार (निवास: कांकेर) – अंधाधुंध फायरिंग का शिकार
26 अप्रैल 2007 को ग्राम मुरकी व भटगांव मोड़ (थाना दुर्गकोंदल) में पुलिस बस पर लैंडमाइन ब्लास्ट के बाद अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं. हमले में तरुण कलाकार की रीढ़ की हड्डी में कई फ्रैक्चर हुए और सिर में गंभीर चोट आई. आज भी वे बिना सहारे के उठ-बैठ नहीं सकते.
7. नंदलाल मुड़ामी (ग्राम पालनार, कुआकोंडा, दंतेवाड़ा) – घर में घुसकर जानलेवा हमला
28 अक्टूबर 2018 की रात 8:30 बजे घर में खाना खाते समय नक्सलियों ने कुल्हाड़ी और बंडा से उन पर वार कर दिया. गर्दन और सिर में गंभीर चोटें आईं और उन्हें हेलीकॉप्टर से रायपुर ले जाकर किसी तरह बचाया गया. यह घटना साबित करती है कि नक्सली किसी आम ग्रामीण को भी नहीं बख्शते.
8. मुन्ना मरकाम (ग्राम गंजेनार, कुआकोंडा, दंतेवाड़ा) – परिवार का खोया सहारा
22 जुलाई 2011 को गांव में घुसे 5-6 नक्सलियों ने लक्ष्मण मरकाम की गोली मारकर हत्या कर दी. मुन्ना मरकाम बताते हैं कि एक हत्या के साथ परिवार का भविष्य, सहारा और उम्मीदें हमेशा के लिए खत्म हो जाती हैं.
9. अवलम मारा (ग्राम तिमापुर, बीजापुर) – जंगल जाने की भयानक कीमत
22 फरवरी 2017 को पिता के साथ बांस काटने जा रहे अवलम मारा प्रेशर बम की चपेट में आ गए और उनका बायां पैर पूरी तरह कट गया. आजीविका का साधन जंगल, बारूदी सुरंगों के कारण मौत का जाल बन गया.
10. रुद्रेश सिंह (घायल सीआरपीएफ कोबरा जवान) – दोनों पैर गंवाने के बाद भी अदम्य साहस
25 जनवरी 2026 को आईईडी विस्फोट और भारी फायरिंग में जवान रुद्रेश सिंह गंभीर घायल हुए. रायपुर से एयरलिफ्ट कर दिल्ली एम्स लाया गया, जहाँ उनके दोनों पैर घुटनों के नीचे से काटने पड़े. नक्सल हिंसा उनके पैर तो छीन सकी, लेकिन देश सेवा का जज्बा नहीं.
11. श्रीमती कर्मावती (बलिदानी सहायक कमांडेंट रामपाल सिंह की पत्नी)
1985 से सीआरपीएफ में सेवारत सहायक कमांडेंट रामपाल सिंह (85वीं बटालियन) ने 10 जून 2009 को बीजापुर के करशूली में माओवादियों के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया. लंबी चली मुठभेड़ में गंभीर रक्तस्राव के बावजूद लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए.
“सवाल यह नहीं है कि कितनी गोलियां चलीं, सवाल यह है कि उन गोलियों ने कितने परिवारों की खुशियां छीनीं? कितने बच्चे अनाथ हुए, कितनी पत्नियां अकेलेपन का दंश झेल रही हैं और कितने जवान दूसरों के सहारे खड़े हैं? नक्सलवाद कोई विचार नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध क्रूर अपराध है।” – दिल्ली पहुंचे नक्सल पीड़ित परिवारों की साझा पुकार
बस्तर की स्पष्ट मांग: बंदूक और बारूद नहीं, विकास और शांति चाहिए
दिल्ली पहुंचे पीड़ितों ने दो-टूक कहा कि बंदूक से केवल भय पैदा किया जा सकता है, विश्वास नहीं, और बारूदी सुरंगों से सड़क रोकी जा सकती है, लेकिन विकास की गति नहीं. बस्तर और देश के वनवासी व ग्रामीण समाज को हिंसा नहीं, शांति, सुरक्षा और समृद्धि चाहिए. बलिदानियों के सर्वोच्च बलिदान और घायलों के संघर्ष के प्रति एकजुट होकर ही मानसिक लाल आतंक के समूल विनाश का मार्ग प्रशस्त हो सकता है.











