मेरा जन्म 1943 में सिंध प्रांत के काशमोर शहर में हुआ था। हमारा परिवार सिंध में वर्षों से सुख और शांति के साथ रह रहा था। मेरे पिता गिरधारी लाल चावला और परिवार के बड़े-बुजुर्ग समाज में सम्मानित थे। हमारे पास घर, हवेली, जमीन-जायदाद और कारोबार था। लेकिन 1947 का विभाजन हमारी जिंदगी में ऐसा तूफान लेकर आया, जिसने सब कुछ बदल दिया।
मैं केवल चार वर्ष का था। इसलिए उस समय की हर घटना मुझे शब्दश: याद नहीं है। लेकिन परिवार के बुजुर्गों से सुनी बातें और उन दिनों की स्मृतियां आज भी मेरे मन में बसी हुई हैं। देश के विभाजन के साथ सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। देखते ही देखते वातावरण बदलने लगा। हिंदू परिवारों के सामने भय और असुरक्षा का संकट खड़ा हो गया। वर्षों से जिस जमीन को अपना घर समझकर जिया था, उसे छोड़ने की मजबूरी सामने थी। अपना घर छोड़ना किसी मृत्यु से कम पीड़ा नहीं थी।
मेरे पिता सरपंच थे और कठिन समय में उन्होंने अनेक लोगों की मदद की थी। हमारे पास बहुत कुछ था। कई घोड़े, हवेलियां, दुकानें, मवेशी और कई एकड़ सिंचित भूमि थी। लेकिन विभाजन के बाद संपत्ति, कारोबार और वैभव का कोई अर्थ नहीं रह गया था। सामने केवल एक सवाल था,परिवार की जान कैसे बचे और हम सुरक्षित भारत कैसे पहुंचें? मस्जिदों से हिंदुओं को सब कुछ छोड़कर जाने के एलान की बातें हमारे सामने आ रही थीं।
कहा जा रहा था कि जिंदा रहना है तो भारत भाग जाओ, नहीं तो मुसलमान बनो और कलमा पढ़ो। कई हिंदू घरों से बेटियां और बहुएं उठा लिए जाने की खबरें भी आ रही थीं। हर दिन कोई नई खबर सामने आती और हमारा डर और बढ़ जाता था। ऐसे माहौल में घर, जमीन और संपत्ति की चिंता पीछे छूट गई थी। चिंता केवल परिवार को सुरक्षित रखने की थी। हम किसी तरह लाहौर पहुंचे। वहां से कठिन परिस्थितियों में ट्रेन पकड़कर दिल्ली आए। वह यात्रा आज भी हमारे परिवार की सबसे भयावह स्मृतियों में शामिल है। जिस परिवार ने सिंध में अपना घर, जमीन और कारोबार देखा था, वही परिवार अब अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ रहा था।
भारत पहुंचने के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ। हमें दिल्ली के शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। हजारों परिवारों की तरह हमारे पास भी अपना घर नहीं था। जो परिवार कभी संपन्न था, वह अब एक शिविर में नए जीवन की शुरुआत करने को मजबूर था। पीछे सिंध में सब कुछ छूट चुका था और सामने जीवन को फिर से खड़ा करने की चुनौती थी। कुछ समय बाद हमारे रिश्तेदारों ने हमें हरियाणा बुलाया। लगभग एक वर्ष वहां रहने के बाद हमें मध्य प्रदेश के मुरैना के बारे में जानकारी मिली।
वहां विस्थापित परिवारों को बसाने के लिए कस्टोडियन संपत्तियां उपलब्ध कराई जा रही थीं। हम मुरैना आ गए। यहीं से जिंदगी ने फिर करवट ली। हमने नाश्ते का होटल और ठेला लगाया। धीरे-धीरे फल का काम किया, नौकरी की, गली-गली सामान बेचने का काम किया और बाद में ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय से जुड़े।
जो कुछ छूट गया था, उसकी जगह मेहनत से नया जीवन खड़ा करने की कोशिश शुरू हुई। कठिनाइयां बहुत थीं, लेकिन परिवार साथ था। मेहनत करने का संस्कार साथ था और भारत में नए जीवन की आशा भी थी। सिंध में हमारा घर, जमीन, हवेलियां, दुकानें और कारोबार सब पीछे छूट गए थे। लेकिन हम अपने साथ कुछ ऐसी चीजें लेकर आए थे, जिन्हें कोई छीन नहीं सकता था, मेहनत का संस्कार, परिवार का साथ और आगे बढ़ने का हौसला। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि विभाजन ने हमारा घर जरूर छीना, लेकिन हमारा हौसला नहीं छीन सका।
भारत हमारे लिए केवल शरण लेने की जगह नहीं है। यही वह देश है, जहां हमने फिर से घर बनाया, परिवार को संभाला और आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य खड़ा किया। विभाजन की पीड़ा आज भी स्मृतियों में जीवित है, लेकिन इस बात का संतोष भी है कि कठिनाइयों के बावजूद हम भारत में फिर खड़े हो सके।
-प्रीतम दास चावला
मूल निवासी : काशमोर, पाकिस्तान















