विभाजन की विभीषिका : सिंध छूटा, संकल्प नहीं
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विभाजन की विभीषिका : सिंध छूटा, संकल्प नहीं

विभाजन की त्रासदी ने सिंधी समाज से उसकी पूरी जन्मभूमि छीन ली, लेकिन उसकी जीवटता और राष्ट्रनिष्ठा को नहीं छीन सकी। अपनी जड़ों से उजड़ने के बाद भी इस समुदाय ने शून्य से शुरुआत कर भारत के विभिन्न हिस्सों में नई पहचान बनाई और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया

Written byवासुदेव देवनानीवासुदेव देवनानी
Aug 18, 2026, 08:12 am IST
inभारत
राहत शिविरों में निवास करते शरणार्थी

राहत शिविरों में निवास करते शरणार्थी

आजादी मिलने के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी विभाजन से उपजी वह व्यथा है, जिसे सिंधी समुदाय आज भी अपने दिलो-दिमाग में बसाए हुए है। मैं स्वयं सिंधी समाज से हूं, इसलिए अनुभूत करता हूं कि देश का बंटवारा जमीन का विभाजन नहीं था, बल्कि अपनी पूरी जन्मभूमि, संस्कृति और सदियों पुरानी पहचान को हमेशा के लिए खो देने जैसा है। विभाजन के बाद सिंधी समुदाय के पास कुछ भी तो नहीं बचा था। पंजाब या बंगाल की तरह सिंध का आधा हिस्सा नहीं बांटा गया, बल्कि पूरा का पूरा सिंध प्रांत पाकिस्तान में चला गया।

इसी से सिंधी हिंदू बिना किसी अपने भू-भाग के शरणार्थी बनने को मजबूर हुए। पर, यह सिंधी समाज की जीवटता और राष्ट्रप्रेम से अगाध प्रेम रहा है कि शून्य से शुरुआत कर आज इस समुदाय ने अपने अथक परिश्रम, साहस एवं व्यापारिक कौशल के बल पर भारत में अपनी नई जमीन तैयार की। भारतीयता में रच-बसकर विभाजन से मिली त्रासदी को झेलते हुए भी राष्ट्र प्रेम को सर्वोच्च स्थान पर रखा। यह बहुत कम स्तरों पर जानकारी है कि सिंधी शरणार्थियों को सिंध में छोड़ी गई अपनी मूल्यवान संपत्तियों के बदले भारत में बहुत कम मुआवजा मिला। पर, यह भी सच है कि इस समुदाय ने सरकारी भत्ते या खैरात पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत छोटे-मोटे व्यापार, फेरी लगाने और मैन्युफैक्चरिंग जैसे काम शुरू कर अपनी अलग पहचान बनाई।पंजाब और बंगाल की तरह सिंध का भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ, बल्कि पूरा प्रांत पाकिस्तान में चला गया। इसी से देश में सिंधियों के लिए तो कहीं जमीन ही नहीं बची। विभाजन से 12 लाख से अधिक हिंदू सिंधी अल्पसंख्यकों को अपनी जन्मभूमि व पुश्तैनी घर छोड़ने पड़े। भारत आने वाले सिंधियों को देश के विभिन्न हिस्सों में बने  में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में रहना पड़ा। भारत में कोई विशेष भू-भाग न होने के कारण सिंधी भाषा और संस्कृति के संरक्षण की भी बड़ी चुनौती थी, पर सिंधी समुदाय विलाप करने मेंशरणार्थी शिविरों विश्वास नहीं करता, इसलिए अपने आपको उसने स्वयं संभाला ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के विभिन्न भागों में बसकर स्वयं के साथ राष्ट्र को सशक्त करने का बड़ा काम किया।

हम सभी इस बात को जानते हैं कि मुंबई के पास कल्याण के सैन्य कैंप को ‘उल्हासनगर’ नाम दिया गया। विभाजन के बाद यही भारत का सबसे बड़ा सिंधी पुनर्वास केंद्र बना। आज यह सिंधी समुदाय के अथक परिश्रम से कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र है। इसी तरह मध्य प्रदेश में भोपाल के पास बैरागढ़, जिसे इस समय संत हिरदाराम नगर के नाम से जाना जाता है, सबसे बड़ा सिंधी कैंप था।

पूज्य संत हिरदाराम जी के मार्गदर्शन में यह क्षेत्र शिक्षा, चिकित्सा और व्यापार का एक प्रमुख केंद्र बना। कच्छ, गुजरात में गांधीधाम और आदिपुर को भाई प्रताप दी आलदास ने बसाया। सिंध के कराची बंदरगाह की कमी को पूरा करने के लिए इस क्षेत्र का विकास किया गया। मूल मकसद यह भी था कि पाकिस्तान में रह गए सिंधियों को घरों के स्थान पर नया घर मिल जाए। अहमदाबाद के कुबेरनगर और लखनऊ के राजाजीपुरम भी देश के वह भाग बने, जहां सिंधी शरणार्थियों ने कड़े संघर्ष के बाद खुद को स्थापित किया।

विभाजन से सिंधी संस्कृति को बड़ा नुकसान पहुंचा, पर सिंधी समुदाय ने अपनी संस्कृति, लोकगीतों, मेलों और त्योहारों को जीवित रखने के लिए देश भर में सिंधी पंचायतें और धार्मिक-सांस्कृतिक संगठन बनाए। भारत के विभाजन की विभीषिका देश, भूमि या सीमा का बंटवारा मात्र नहीं है। यह मनुष्य की भावनाओं और रिश्तों के साथ ही अखंड राष्ट्र की विचारधारा को खंडित करने का वह षडयंत्र है, जिसका दंश अभी भी देश भोग रहा है। सिंधी समुदाय नहीं, भारत की संस्कृति है।

बंटवारे का सर्वाधिक दंश झेलने के बावजूद अपनी जीवटता से मां भारती के लिए समर्पित इस समुदाय ने जिस तरह से राष्ट्र के लिए समर्पित होकर कार्य किया है, उससे प्रेरणा ली जा सकती है। विभाजन बहुत बड़ी त्रासदी थी। इससे दिलों में जो दरारें पड़ीं, उनके जख्म बहुत गहरे हैं। आइए, अतीत से प्रेरणा लेते हुए आने वाले कल को संवारे। संस्कृति के साथ राष्ट्र प्रथम की भावना से हम निरंतर आगे बढ़ें।

Topics: त्रासदी विभाजनसिंधी संस्कृतिराष्ट्र निर्माणविभाजन की विभीषिकाशरणार्थी शिविरसिंधसिंधी समाजवासुदेव देवनानीपाञ्चजन्य विशेषउल्हासनगर
वासुदेव देवनानी
वासुदेव देवनानी
लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष हैं। [Read more]
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