जब मैं केवल 15 वर्ष का था, तभी मेरे माता-पिता और परिवार के अन्य लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़कर रातोंरात भागना पड़ा। 75 वर्ष बाद भी मुझे उस वक्त की एक-एक बात याद है। वह बहुत ही बुरा वक्त था। जुलाई, 1947 में माहौल इतना बिगड़ गया कि हमारे गांव लच्छीपुर (जिला गुजरांवाला) के लोगों की नींद उड़ गई। लोग रात में पहरा दिया करते थे। पूरा जुलाई महीना डर के माहौल में ही बीता। कई बार हमले हुए, पर लोगों की सजगता ने उन्हें विफल कर दिया। अगस्त, 1947 के प्रारंभ में तो स्थिति और भी खराब हो गई। इसके बाद गांव के सभी हिंदुओं ने पलायन करना ही ठीक माना।
8 अगस्त, 1947 को हम लोगों ने एक साथ उस गांव को छोड़ दिया। पैदल ही चल पड़े। रास्ते में लाशें ही लाशें नजर आ रही थीं। उनमें कई लाशें अपने परिचितों की भी थीं। हम लोग शवों के बीच से ही गुजर रहे थे। इस मंजर को देखकर बड़े से बड़ा दिल वाला भी हिम्मत हार रहा था। लोग यही सोच रहे थे कि जल्दी से जल्दी गुजरांवाला पहुंच जाएं, ताकि जान बच जाए। यही सब दृश्य देखते हुए हम लोग गुजरांवाला रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां से लाहौर जाने वाली रेलगाड़ी में चढ़े।
अंदर पांव रखने तक की जगह नहीं थी। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे चीख रहे थे। जो जहां था, वहीं पूरी रात एक ही स्थिति में पड़ा रहा। हिलने तक की जगह नहीं थी। भीड़ में फंसे बच्चों को तो लगता था कि जान अब गई कि तब। गाड़ी की छत पर भी लोग बैठे थे। रास्ते में हमले होते थे तो पूरी गाड़ी में चीख-पुकार मच जाती थी। इस हालत में छत पर बैठे लोगों के साथ क्या हुआ होगा, अंदाजा लगा सकते हैं।

इसी हालत में दूसरे दिन सुबह 8 बजे हम लोग लाहौर पहुंचे। पूरे दिन और पूरी रात लाहौर स्टेशन पर हमारी गाड़ी खड़ी रही। बार-बार मुसलमान आते और गाड़ी पर हमला करते। सुरक्षाकर्मियों की संख्या बहुत कम थी इसलिए भीड़ भारी पड़ रही थी। उस रात तो लगा कि अब शायद जिंदा नहीं बचेंगे, लेकिन कहते हैं कि मारने वाले से ज्यादा ताकतवर बचाने वाला होता है।
भगवान की ऐसी कृपा हुई कि सुबह चार बजे तेज वर्षा होने लगी। भीड़ तितर-बितर हो गई और मौका देखकर चालक ने गाड़ी चला दी। सुबह छह बजे हम लोग अटारी पहुंच गए। वहां से लोग अलग-अलग स्थानों के लिए निकल गए। कोई कहीं चला गया, तो कोई कहीं। हमारा परिवार जालंधर पहुंच गया। इसके बाद दिल्ली आ गया। पास में पहने हुए कपड़ों के अलावा और कुछ नहीं।
राहत शिविर में खाना मिल जाता था। हमारे परिवार में सात लोग थे। बाद में हम लोगों ने कुछ काम करना शुरू किया। बरसों बाद ठीक से खाना और कपड़े मिले थे। जब उन दिनों को याद करते हैं, तो आंखें डबडबा जाती हैं और गला रुंध जाता है।
-बद्रीनाथ शर्मा
मूल निवासी: लच्छीपुर, गुजरांवाला, पाकिस्तान
















