भारत के विभाजन की त्रासदी केवल जमीन के बंटवारे और सीमाओं के खिंच जाने की कहानी नहीं थी, बल्कि इसने सदियों पुरानी आस्था, विरासत और सांस्कृतिक स्मृतियों को भी गहरे जख्म दिए। 1947 के विभाजन की विभीषिका में मुल्तान का प्रह्लादपुरी मंदिर भी उन ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल रहा, जिनसे हिंदू समाज की आस्था और भावनाएं गहराई से जुड़ी थीं। मान्यता है कि इसी पवित्र स्थल पर भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे। यह प्राचीन मंदिर समय की मार और सांप्रदायिक हिंसा के बीच अपना मूल स्वरूप खोता चला गया।
विभाजन के दौरान मुल्तान से हिंदुओं के बड़े पैमाने पर पलायन के साथ इस मंदिर की जीवंत परंपरा भी टूट गई। मंदिर की प्रतिमा को तो भारत लाया जा सका, लेकिन वह धरोहर, जिसकी स्मृतियां सदियों से मुल्तान की धरती से जुड़ी थीं, वहीं पीछे छूट गई। बाद के दशकों में हुए सांप्रदायिक तनाव और 1992 के दंगों ने इस ऐतिहासिक मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। आज प्रह्लादपुरी मंदिर के अवशेष केवल एक इमारत के ढह जाने की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे विभाजन की उस पीड़ा और सांस्कृतिक विरासत के बिछड़ने की याद दिलाते हैं, जिसे पीढ़ियों ने अपने भीतर संजोकर रखा है।
हमने खोया
मुल्तान स्थित प्रह्लादपुरी मंदिर
जहाँ प्रकट हुए थे भगवान नरसिंह
पौराणिक मान्यता के अनुसार, यही वह पवित्र स्थल है जहाँ भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण किया और अधर्म का अंत किया। सनातन आस्था का यह केंद्र सदियों तक श्रद्धा का प्रतीक रहा।
बार-बार टूटा, बार-बार खड़ा हुआ
आक्रमणों और दंगों में मंदिर कई बार ध्वस्त हुआ, लेकिन हर बार हिंदू समाज ने उसे पुनः खड़ा किया। 1861 में महंत बावलराम दास ने जनसहयोग से जुटाए ₹11,000 से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, जबकि 1872 में ठाकुर फतेह चंद टकसालिया और मुल्तान के हिंदुओं के सहयोग से इसे पुनः भव्य रूप दिया गया।
प्रतिमा बच गई, मंदिर नहीं
1947 के विभाजन के दौरान अधिकांश हिंदुओं को मुल्तान छोड़ना पड़ा। बाबा नारायण दास बत्रा भगवान नरसिंह की प्रतिमा को सुरक्षित भारत लेकर आए, जो आज हरिद्वार में स्थापित है। किंतु मुल्तान स्थित मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में रह गया।

विभाजन और 1992 के साम्प्रदयिक दंगे
1992 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान प्रह्लादपुरी मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया। आज वहाँ केवल अवशेष शेष हैं। वर्ष 2006 में मंदिर के अवशेष वाले स्थान पर वजू की व्यवस्था की अनुमति दिए जाने के बाद इस प्राचीन धरोहर के मूल स्वरूप के चिह्न भी और धूमिल हो गए।

















