विश्लेषण

कौन थे मौलाना मुहम्मद अली जौहर? रामपुर में जिनके नाम पर बनी यूनिवर्सिटी पर बरपा विवाद

मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली के अखिल-इस्लामवाद, कॉमरेड पत्रिका, कानपुर मस्जिद कांड, खिलाफत आंदोलन और गांधीजी के सहयोग की विस्तृत समीक्षा। विभाजन पूर्व मुस्लिम पृथकतावाद की जड़ें जानें।

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डॉ. महावीर प्रसाद जैन

पाकिस्तान के इतिहासकार मोहम्मदअली जौहर को विभाजन पूर्व के महानतम अखिल-इस्लामवादियों में गिनते हैं, जिसकी उत्तेजना से आपूरित पत्रकारिता और मुसलमानों की राजनैतिक पहचान के लिए संघर्ष ने इस्लामी पृथकतावाद से, जन सामान्य को आवेशित कर दिया। दुर्भाग्य से विभाजन के बाद भी उसके कथनों और कृत्यों का मुसलमानों के प्रभावशाली वर्ग पर इतना प्रभाव है कि उसके नाम से एक मुस्लिम विश्वविद्यालय का निर्माण किया गया है। दुर्भाग्य यह भी है कि समाज में इस में सम्बन्ध पर्याप्त जानकारी और प्रतिक्रिया का अभाव है।

शौकतअली और मोहम्मदअली जौहर, अली भाइयों के नाम से विख्यात हैं। इनका जन्म क्रमशः 1873 और 1878 में रामपुर के सम्भ्रान्त पठान परिवार में हुआ था। शौकत ने 1895 और जौहर ने 1896 में अलीगढ़ कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली। इसके पश्चात जौहर ने ऑक्सफ़ोर्ड से एम.ए. करके 1910 तक बड़ौदा राज्य में सेवा की और मुसलमानों को कट्टर अखिल-इस्लामवाद से आप्लावित करने के लिए 1911 में अंग्रेजी साप्ताहिक ‘कॉमरेड’ प्रारम्भ किया।

तुर्क साम्राज्य के पक्ष में अभियान

कॉमरेड द्वारा 1911 में तुर्क साम्राज्य के ट्रिपॉली पर इटली और 1912-13 के बाल्कन क्षेत्र पर बलगेरिया आदि द्वारा आक्रमण करने और इस दौरान इंग्लैंड के तटस्थ रहने की घोर आलोचना की गई तथा वहाँ के मुसलमानों की सहायतार्थ अभियान चलाया गया।

कानपुर मस्ज़िद काण्ड

जुलाई 1913 के प्रारम्भ में कानपुर के मछली बाजार में सड़क चौड़ी करने के लिए वहां स्थित मस्जिद के वज़ू-स्थल को खंडित किये जाने को लेकर कॉमरेड में उग्र प्रचार किया गया। इससे देश भर के मुसलमानों में कट्टरता को बढ़ावा मिला।

जौहर हाउस-अरेस्ट में और बंदी के रूप में

अली भाइयों ने सितंबर-अक्टूबर 1914 में मुसलमानों में जन-जागरण के लिए अनेक नगरों की यात्राएँ की और दारुल-उलूम देवबंद, लखनऊ के नदवात-उल-उलामा और फ़िरंगी महल के उलमाओं में राजनैतिक चेतना भरने के प्रयास किये। इससे उन्हें अलीगढ़ कॉलेज से निकले द्वि-राष्ट्रवादियों और रूढ़िवादी उलमाओं को निकट लाने  में सफ़लता मिली।

नवंबर 1914 में रुस, फ्रांस और ब्रिटन ने तुर्क साम्राज्य के विरुद्ध युद्ध घोषित किया। इसके पहले जौहर ने 26 सितम्बर 1914 को  कॉमरेड में “चॉइस ऑफ़ दी टर्क्स” शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। यह लेख लंदन टाइम्स में प्रकाशित एक लेख के उत्तर में लिखा गया था जिसमे तुर्की को युद्ध में ब्रिटन के पक्ष में भाग लेने अथवा तटस्थ रहने को कहा गया था। जौहर ने यूरोपीय देशों के तुर्की के प्रति  रवैये की भर्तस्ना  की और  लिखा कि उनके दोगलेपन के कारण तुर्की के पास युद्ध में जर्मनी का पक्ष लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। इस लेख के कारण जौहर को मई 1915 में अपने भाई और परिवार सहित हाउस-अरेस्ट के लिए रांची भेज दिया गया और वह जनवरी 1918 से दिसंबर 1919 तक बैतूल जैल में बंदी के रूप में रहा।

गांधीजी द्वारा जौहर की मुक्ति के प्रयास

गांधीजी ने अली भाइयों के 1918 में बंदी बनाये जाने के बाद अपने प्रमुख सहयोगियों को कई पत्र लिखे, जिनमें लिखा कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए वे जौहर पर निर्भर करते हैं, इससे गौ रक्षा और अहिंसा दोनों उद्देश्य पूरे हो सकेंगे। उन्हें जौहर के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। उन्होंने अली भाइयों की समस्या को “क्रशिंग बर्डन” बताया। गांधीजी ने वायसराय के निज़ी सचिव मेफी को भी इस हेतु कई पत्र लिखे और उनके वकील घाटे से भी संपर्क रखा। 18 नवम्बर 1918 को गांधीजी ने जौहर को लिखा, “तुम्हारी मुक्ति में मेरी रुचि अपने स्वार्थ के कारण है…..मुस्लिम समस्या के हल से ही स्वराज्य की प्राप्ति संभव है”।

गांधीजी और खिलाफत आन्दोलन

कहने की आवश्यकता नहीं कि 1919 से 1924 तक चले ख़िलाफ़त आंदोलन में गांधीजी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही। गांधीजी इस में सहयोग के लिए तर्क देते रहते थे कि खिलाफत की रक्षा मुसलमानों के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी हिन्दुओं के लिए गौरक्षा और इस कारण यदि हिन्दू मुसलमानों के अभीष्ट में सहयोग देंगे तो मुसलमान गौहत्या से परहेज़ करने को तैयार हो जाएंगे और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द स्थापित हो जायगा।

मार्च 1919 में ख़िलाफ़त समिति के प्रारंभ से ही गांधीजी इससे सम्बंधित रहे। आंदोलन का प्रारम्भ 1 अगस्त 1920 को हुआ। महात्मा गाँधी और शौकतअली ने इस हेतु भारत भ्रमण प्रारम्भ किया। मार्च 1920 में तमिलनाडु में इरोड में उलमाओं का सम्मलेन आयोजित किया गया। इसके बाद अप्रैल से अगस्त तक गांधीजी ने शौकत के साथ यात्राएँ करते हुए उत्तर भारत के अनेक नगरों में भाषण दिए। 6 महीने के इंग्लैंड प्रवास के बाद जौहर के लौटने के पश्चात् गांधीजी ने 1921 के प्रारम्भ से सितम्बर तक उसके साथ भ्रमण किया।

गांधी जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा

अप्रैल 1920 में गांधीजी अपने एक अंग्रेज मित्र को लिखा, “मैं यह नहीं कह सकता कि मुसलमानों में घृणा नहीं है, किन्तु मुझे विश्वास है कि उनकी घृणा को प्रेम के बल पर जीत सकूंगा।”

लाहौर के अख़बार ट्रिब्यून ने 20 जुलाई 1920 लिखा, “बहुत से लोग कहते हैं की खिलाफत कि समस्या के निस्तारण के पश्चात मुसलमान हिन्दुओं का साथ छोड़ देंगे…. किन्तु गांधीजी अपने अपने 20 वर्ष के अनुभव के आधार पर कहते हैं कि यह बात गलत है”।

गांधीजी ने अप्रैल 1920 में अपने साप्ताहिक नवजीवन में लिखा, “में यह सच मानता हूँ की मुसलमान जिस बात के लिए संघर्ष-रत हैं वह उनके पवित्र ग्रंथो पर आधारित है। ऐसी स्थिति में हिन्दुओं का उन्हें सहयोग नहीं देना भाईचारे का कायरतापूर्ण उल्लंघन होगा और वे उनसे किसी तरह की अपेक्षा नहीं रख सकेंगे”।

सगे भाइयों से बढ़कर हैं अली भाई

गांधीजी अक्सर सार्वजनिक मंचों से कहते थे कि अली भाई उनके लिए एक माता से उत्पन्न भाइयों से भी बढ़ कर हैं। वे इस्लाम से सम्बंधित किसी भी मसले में शौकतअली को मार्ग दर्शक और मित्र मानते थे। 1921 में एक पत्रकार ने गांधीजी से प्रश्न किया कि गैर-भारतीय मुसलमान खिलाफत के बारे में इतने मुखर क्यों नहीं हैं, जितने भारतीय मुसलमान। इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि भारत के मुसलमानों में अन्य देशों के मुसलमानों की अपेक्षा इस्लाम के प्रति अधिक चेतना है। तुर्की की संसद ने 3 मार्च 1924 को खलीफा का पद समाप्त कर दिया। इसके पश्चात गांधीजी ने 5 मार्च को जौहर को लिखा, “प्रत्येक बात का भविष्य अल्लाह के हाथों में है किन्तु इस्लाम का भविष्य भारत के मुसलमानों के हाथों में है”।

दुराचारी मुसलमानों से भी निकृष्ट कहा था गांधी को

जौहर ने महात्मा गाँधी को दुराचारी मुसलमान से भी निकृष्ट बताया था। इस सम्बन्ध में गांधीजी ने 10 अप्रैल 1924 को सफाई देते हुए लिखा, “वास्तव उनका आशय यह है कि उनका पंथ मेरे पंथ से श्रेष्ठ है। क्या इस कथन में कोई बुरा मानने की बात है? जब तक दुनिया में मत-वैभिन्य है, क्या मौलाना के कथन को तार्किक और सत्य पर आधारित नहीं माना जाएगा?”

8 सितम्बर 1924 को गांधीजी ने जौहर को हमदर्द और ‘कॉमरेड’ के प्रेस के लिए आर्थिक सहयोग और स्वामी आनंदानंद नामक सहयोगी को भेजने के सन्दर्भ में लिखा, “जो मेरा है वह आनंदानंद समेत तुम्हारा है”। इसी दिन उन्होंने आनंदानंद को लिखा कि उसे रुद्र (विनाशक) नहीं विष्णु (पालन कर्ता) के रूप में मोहम्मद अली के सहयोग के लिए जाना है। जौहर का क्या रुख है इसकी परवाह किये बिना हमें उसकी सहायता करनी है। “यदि तुम्हारी अनुपस्थिति से यंग इंडिया और नवजीवन को हानि भी होती हो तो नहीं सोचना है।“

हिन्दू नरसंहार पर गांधीजी का बयान

कोहट के हिन्दुओं के सामूहिक हत्याकांड और मतान्तरण के पश्चात गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा, “हमें तपस्या करनी होगी, यदि हम मुसलमानों का ह्रदय जीतना चाहते हैं…यदि वे हम पर हमला करें तो हमें प्रतिरोध नहीं करना है अपितु बहादुरी से मृत्यु का वरण करना है”।

अली भाइयों का अखिल इस्लामवाद

1919 के मुस्लिम लीग के अमृतसर अधिवेशन में अपने भाषण में जौहर ने अल्लाह और इस्लाम के लिए अपने जीवन समेत सर्वस्व अर्पण करने की भावना व्यक्त की। शौकत अली गांधीजी के दृष्टिकोण से असहज था। उसका उद्देश्य अखिल-इस्लामवाद को बढ़ावा देने तक ही सिमित था। मई 1920 में शौकत अली ने बरेली में शाजहांपुर में कहा, “अल्लाह की राह में मारना और मरना दोनों ही सत्याग्रह है”। गांधीजी ने चार्ल्स एन्ड्रूज को जून 1920 में लिखा कि शौकतअली एक सौम्य व्यक्ति है, किन्तु उग्र कट्टरपंथी है।

18 अगस्त 1920 को गांधी जी और शौकतअली ने मालाबार में कोझिकोड में एक विशाल सभा को संबोधित किया। यहाँ शौकतअली ने श्रोताओं को उत्तेजित करने वाली शब्दावली का प्रयोग किया। 21 अगस्त को उसने मद्रास लॉ कॉलेज में आयोजित सभा में हिंसा को निर्णायक सफ़लता प्रदान करने वाली बताया।

27 अगस्त 1920 को गुजरात पॉलिटिकल कांफ्रेंस में गांधीजी ने कहा, “शौकतअली का मानना है कि एक शत्रु की हत्या की जा सकती है, उसे धोखा भी दिया जा सकता है”। चेत्तूर शंकरन नायर (1857-1934) अपनी पुस्तक “गाँधी एंड एनर्की ” (1922) में लिखते हैं कि अली-भाई अहिंसा के सिद्धांत को नहीं मानते थे।

हिन्दू-मुस्लिमों को बांटना चाहते थे जौहर

1923 के काकीनाड़ा कांग्रेस में अध्यक्षीय भाषण में जौहर ने हिन्दुओं के दलित वर्ग को हिन्दुओं और मुसलमानों में बांटे जाने के पक्ष में तर्क दिया। कुछ समय से जबरन मतांतरित होने वाले मलकाना राजपूत घर वापसी के लिए आतुर हो रहे थे। इस पर स्वामी श्रद्धानन्द ने फ़रवरी 1923 में भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का गठन किया था। इस बारे में बोलते हुए जौहर ने कहा, “में बिना लाग-लपेट के कहता हूँ कि में उन दिनों के लिए आह भरता हूँ जब हमारे पूर्वज यह काम सिरों की गिनती करने के बजाय उन्हें काट कर करते थे”।

उसने पांच दशक से मुसलमानों कि अंग्रेजों के प्रति मित्रता की नीति का परिस्थिजन्य बताते हुए हुए बचाव किया और सय्यद अहमद खां की अंग्रेज भक्ति के लिए गोल-मोल तर्क प्रस्तुत किया। उसने सय्यद अहमद के 28 दिसंबर 1887 और 16 मार्च 1888 के अंग्रेजों के प्रति चरम-चापलूसी और हिन्दुओं के प्रति घोर नफरत भरे भाषणों का भी परिस्थिति के नाम पर औचित्य सिद्ध किया।

यहाँ उसने कहा कि मुसलमानों के लिए स्वराज्य का अर्थ है भारत की आज़ादी के साथ ही मुसलमानों की आज़ादी और यदि तुर्क कमजोर नहीं हो गए होते तो वे विश्व भर के मुसलमानों की आज़ादी के लिए संघर्ष करते। ऐसे समय जब गांधीजी उसके प्रेस के लिए अत्यधिक सहयोग कर रहे थे उसने राजस्थान में नागौर जिले के एक गांव में अत्यन्त भड़काऊ भाषण दिया, जिसके लिए गांधीजी को लिखना पड़ा, “यदि जौहर ने जैसा प्रकाशित हुआ वैसा बोला है….तो ये वक्तव्य अहिंसा से बहुत दूर हैं।“

उन्होंने लंदन के गोल मेज़ सम्मेलन में इस्लाम और भारत की राष्ट्रीयता के दो वृत्त होने की बात कही, जो संकेंद्रित नहीं हैं पर जो पृथक भी नहीं हैं। अर्थात वे पहले मुसलमान हैं इसके बाद ही कुछ ओर और वे किसी के मातहत नहीं रह सकते। अनेक मुसलमान आज भी उनके इस कथन को दोहराते नहीं थकते हैं।

जौहर के जुनून का अंजाम

जघन्य मोपला काण्ड खिलाफत आंदोलन का ही परिणाम था। अफ़ज़ल इकबाल अपनी 1944 में सम्पादित पुस्तक, “सलेक्ट राइटिंग्स एंड स्पीचेज़ ऑफ़ मौलाना मुहम्मद अली” की भूमिका में लिखता है आज़ादी के लिए उनका जूनून इतना संक्रामक था कि मोपला गरीबी और अज्ञान में डूबे होने के बावज़ूद मलाबार तट पर खिलाफत का राज्य कायम करने को प्रेरित हो गए।

मार्च 1924 में तुर्की की संसद ने खलीफा के पद को ही समाप्त कर दिया तो मुसलमानों के गांधीजी को स्वराज्य प्राप्ति में सशर्त सहयोग के लिए कारण ही समाप्त हो गया। अब जौहर और उसके अनुयायी अशराफ़ वर्ग का लक्ष्य इस्लाम के लिए स्वराज्य प्राप्ति हो गया। इसके बाद मुसलमानों ने किसी भी बहाने दंगे करना प्रारम्भ कर दिया। 9 से 11 सितम्बर 1924 के बीच सीमा प्रान्त में कोहट में हिन्दुओं के सामुहिक हत्याकांड और मतान्तरण की घटनाएं हुईं। इस पर गांधीजी ने देहली में जौहर के घर में तीन सप्ताह का उपवास किया। किन्तु, इसका कोई फल नहीं निकला और देहली, गुलबर्गा, नागपुर, संभल, अलीगढ़ आदि में भी रक्तरंजित घटनाएँ हुईं।

1928 में मोतीलाल नेहरू समिति द्वारा बनाये संविधान को मुसलमानों के बड़े वर्ग द्वारा अस्वीकृत किए जाने में प्रमुख भूमिका जौहर की रही। 1999 के पश्चात भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों में सदियों से मौजूद हिन्दू-विरोध, इस्लामी कट्टरता और अखिल-इस्लामवाद के चरम स्थिति में पहुँचने का बड़ा कारण अली-भाइयों द्वारा गांधीजी के सहयोग से खड़ा किया गया खिलाफत आंदोलन है।

(लेखक ने राजस्थान के सरकारी कॉलेजों में 35 वर्ष तक अध्यापन। 18 वर्ष अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना की केन्द्रीय कार्यकारिणी में विभिन्न पदों पर रहा। कट्टरपंथी (Radical) इस्लाम विशेष रुचि का विषय।)

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