हाल ही में इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड में सिंगल-सेक्स जगहों से जुड़ा नया गाइडेंस लागू हो गया है। यह इक्वलिटी एंड ह्यूमन राइट्स कमीशन (EHRC) का कोड ऑफ प्रैक्टिस है। इसमें टॉयलेट, चेंजिंग रूम और रिफ्यूज जैसी जगहों को जैविक लिंग के आधार पर चलाने की बात कही गई है। यानी जैविक पुरुष को महिलाओं की जगहों में और जैविक महिला को पुरुषों की जगहों में अनुमति नहीं दी जाएगी। यह गाइडेंस पिछले साल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आया है, जिसमें कानूनी रूप से महिला की परिभाषा जैविक लिंग से जोड़ी गई थी।
लंदन की परिषदों का रुख
लंदन के छह बरो — लैम्बथ, हैकनी, हारिंगे, लुइशम, साउथवार्क और वॉल्टम फॉरेस्ट — ने एक साथ एक बयान जारी किया है। ये लेबर, ग्रीन और लिबरल डेमोक्रेट पार्टियों के नियंत्रण वाले क्षेत्र हैं। उन्होंने कहा है कि वे अपनी सेवाओं को इंक्लूसिव बनाए रखेंगे। उनके अनुसार नए नियम ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी लोगों पर हमले जैसा महसूस होंगे।
संयुक्त पत्र में उन्होंने लिखा, “ट्रांस वुमन वुमन हैं, ट्रांस मेन मेन हैं, और नॉन-बाइनरी पहचानें वैध हैं।” उन्होंने दावा किया कि यह गाइडेंस ट्रांस लोगों के अधिकारों के लिए नुकसानदेह है। उन्होंने यह भी कहा कि वे अपने कर्मचारियों को सार्वजनिक जगहों पर एंट्री चेक करने की मुश्किल स्थिति में नहीं डालेंगे।
अलग-अलग परिषदों की कार्रवाई
लैम्बथ परिषद ने पहले ही इस कोड के विरोध में एक प्रस्ताव पास कर दिया था। इस्लिंगटन ने इसे विरोधाभासी और खराब तरीके से तैयार बताया। हैकनी पर पहले से ही महिलाओं की जगहें न देने को लेकर कानूनी चुनौती आने की खबर है। ब्रिस्टल परिषद ने कहा है कि सेवाएं जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर दे सकते हैं, लेकिन उन्हें “सिंगल-जेंडर” या “ट्रांस-इंक्लूसिव” का लेबल लगाना होगा, न कि सिर्फ महिलाओं के लिए।
कानूनी और अन्य प्रतिक्रियाएं
EHRC की चेयरमेन मैरी-ऐन स्टीफेंसन ने कहा कि परिषदों का विरोध कुछ हद तक दिखावटी हो सकता है। कानूनी विभाग से बात करने के बाद वे कानून मानने को बाध्य होंगे। उन्होंने बताया कि गाइडेंस कानून नहीं है, बल्कि कानून का पालन कैसे करें यह बताता है। अगर कोई कानून नहीं मानना चाहता तो संसद से इक्वलिटी एक्ट बदलवाना पड़ेगा।
बीथनी हचिशन, जिन्होंने पहले डार्लिंगटन अस्पताल में सिंगल-सेक्स चेंजिंग रूम का मामला जीता था, ने कहा कि महिलाओं को खुद कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। सेक्स मैटर्स की माया फॉर्स्टेटर ने भी कहा कि महिलाओं के अधिकार लागू कराने के लिए कानूनी खर्च और व्यक्तिगत नुकसान उठाना गलत है।
कुछ लेबर सांसद और यूनियन भी इस गाइडेंस के खिलाफ हैं। गुड लॉ प्रोजेक्ट ने इसके खिलाफ ज्यूडिशियल रिव्यू दायर किया है। नेशनल यूनियन ऑफ स्टूडेंट्स ने छात्रों को गाइडेंस का विरोध करने में मदद करने वाली सलाह जारी की है। सरकार का कहना है कि सबको कानून मानना चाहिए और सिंगल-सेक्स जगहों के साथ ट्रांस लोगों के अधिकार भी सुरक्षित रखने की प्रतिबद्धता है।











