Explainer: खाड़ी युद्ध के बीच भारत ने यूरिया संकट कैसे रोका? खरीफ सीजन में किसानों को बड़ी राहत
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Explainer: खाड़ी युद्ध के बीच भारत ने यूरिया संकट कैसे रोका? खरीफ सीजन में किसानों को बड़ी राहत

खाड़ी में अमेरिका-ईरान युद्ध के बावजूद भारत में यूरिया की सप्लाई बनी ठीक। जानें केंद्र सरकार की तैयारी, LNG आयात, डीएपी-कॉम्प्लेक्स खादों की समस्या और एल नीनो के असर पर पूरी रिपोर्ट। खरीफ सीजन 2026 की खाद स्थिति।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Aug 3, 2026, 12:09 pm IST
in भारत
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

खाड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा है, जिससे दुनियाभर में तेल समेत अन्य वस्तुओं की सप्लाई बाधित हुई है। इससे भारत भी अछूता नहीं है। खाड़ी देशों से भारत तेल ही नहीं खाद भी आयात करता है। लेकिन, केंद्र सरकार ने इसका प्रबंधन कुछ इस तरह से किया कि इस बार खरीफ सीजन में खाद की कोई बड़ी कमी नहीं आई, जबकि लोग डर रहे थे। यूरिया की सप्लाई ठीक है। हां, डीएपी और कॉम्प्लेक्स खादों में दिक्कत है।

युद्ध का असर और यूरिया की स्थिति

फरवरी के अंत से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने और अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान युद्ध की वजह से दुनिया भर में ऊर्जा की सबसे बड़ी सप्लाई झटका लगा। भारत में भी इसका असर पड़ा। मार्च 2026 में यूरिया का घरेलू उत्पादन घटकर 17.5 लाख टन रह गया, जबकि पिछले साल मार्च 2025 में 24.7 लाख टन था।

मुख्य वजह एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) की सप्लाई रुकना था। युद्ध से पहले भारत अपना 53-54% एलएनजी कतर और यूएई से लंबे अनुबंधों के तहत आयात करता था। शिपिंग ब्लॉकेज और ईरानी मिसाइल-ड्रोन हमलों से वहां के इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा, इसलिए सप्लाई नहीं हो पाई। अप्रैल में उत्पादन 21 लाख टन पर पहुंचा। मई और जून में यह और बढ़कर 25.2 और 25.4 लाख टन हो गया। कुल मिलाकर अप्रैल-जून 2026 में 71.5 लाख टन यूरिया बना, जो पिछले साल के 67.9 लाख टन से 5.4% ज्यादा है।

सरकार की तैयारी

सरकार ने समय पर कदम उठाए। उसने गेल (इंडिया) और इंडियन ऑयल को एलएनजी के नए स्रोत ढूंढने को कहा। कतर-यूएई की हिस्सेदारी लगभग जीरो हो गई, लेकिन अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया, अंगोला, कांगो, इंडोनेशिया, त्रिनिदाद और नॉर्वे से ज्यादा एलएनजी स्पॉट मार्केट से महंगे दामों पर खरीदा गया। यूरिया आयात में भी यही सक्रियता दिखी। अप्रैल 4 को इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) और नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड ने टेंडर निकाला, जिसमें 25 लाख टन यूरिया $935-959 प्रति टन पर मिला। 27 मई के टेंडर में 17 लाख टन $444.9-449.3 प्रति टन पर सिक्योर हुआ।

इसे भी पढ़ें: पहलगाम हमले के बाद भारत का सख्त एक्शन, सिंधु जल संधि पर लिया बड़ा फैसला

29 जुलाई को राष्ट्रीय रासायनिक और उर्वरक लिमिटेड ने 17 लाख टन के लिए तीसरा टेंडर निकाला (10 लाख टन पश्चिमी तट, 7 लाख टन पूर्वी तट)। बिड 11 अगस्त को खुलेंगी। इससे पहले अप्रैल-जून में कुल 25.1 लाख टन यूरिया आयात हुआ, जबकि पिछले साल इसी अवधि में सिर्फ 8.4 लाख टन था। सरकार ने महंगे आयात का बोझ किसानों पर नहीं डाला, सब्सिडी बढ़ाई ताकि खाद सस्ती रहे।

डीएपी और कॉम्प्लेक्स खादों की समस्या

यूरिया नाइट्रोजन देता है। डीएपी फॉस्फोरस देता है, जबकि एमओपी पोटाश। कॉम्प्लेक्स खादों में N, P, K और सल्फर अलग-अलग मात्रा में होते हैं। डीएपी, कॉम्प्लेक्स और एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट, जो डीएपी का सस्ता विकल्प है) का उत्पादन अप्रैल-जून 2026 में पिछले साल से कम रहा। आयात भी कम हुआ। फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर जैसे कच्चे माल की सप्लाई और कीमतें प्रभावित हुईं।

फॉस्फोरिक एसिड की कीमत जनवरी-मार्च 2025 में $1,055 प्रति टन थी, जो जुलाई-सितंबर 2026 में $1,700 तक पहुंच गई। सल्फर पहले से ही महंगा था ($500-550 बनाम सामान्य $150-250), रूस पर यूक्रेन के हमलों और निर्यात बैन की वजह से। युद्ध से कतर, सऊदी, अबू धाबी और ईरान से सप्लाई और टाइट हो गई — अब सल्फर $1,100 प्रति टन के आसपास है।

अमोनिया (कॉम्प्लेक्स खादों में N का स्रोत) की सप्लाई भी प्रभावित हुई, हालांकि कीमतें मई के $850-900 से घटकर $650-700 रह गई हैं। सल्फर सबसे बड़ी समस्या है। यह सल्फ्यूरिक एसिड बनाने के काम आता है, जो रॉक फॉस्फेट को फॉस्फोरिक एसिड में बदलता है। बिना इनके डीएपी, एसएसपी या कॉम्प्लेक्स नहीं बन सकते। अप्रैल 28 को आईपीएल ने 13.5 लाख टन डीएपी $930-935 पर खरीदा था, उसके बाद कोई बड़ा आयात नहीं हुआ।

एल नीनो का असर

खाद की मांग भी कम रही क्योंकि एल नीनो से मानसून कमजोर रहा। जून-जुलाई में देशभर में बारिश सामान्य से 12.6% कम हुई। खरीफ फसलों की बोआई पिछले साल से 4.7% कम है। पिछले दो साल (2024-2025) अच्छे मानसून वाले थे, इसलिए किसान ज्यादा उत्साह से बोआई करते और खाद खरीदते थे। इस बार मांग धीमी है और सरकार की तैयारी बेहतर रही, इसलिए कोई बड़ी कमी नहीं दिखी।

Topics: भारत यूरिया सप्लाई 2026खाड़ी युद्ध खाद प्रभावयूरिया उत्पादन मार्च 2026डीएपी कमी भारतखरीफ सीजन खाद संकट
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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