गत 29 जुलाई को भोपाल में ‘गुरु पूर्णिमा का महत्व एवं गुरु-शिष्य परंपरा’ विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। भारतीय ज्ञान परंपरा विभाग, शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) के सहयोग से दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान एवं शासकीय हमीदिया महाविद्यालय, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस व्याख्यान कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित आचार्य डॉ. रघुवीर गोस्वामी।
उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा सृष्टि के प्रारंभ से चली आ रही जीवन-पद्धति है। गुरु वह है जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। विशिष्ट वक्ता डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि गुरु केवल शिक्षा या दीक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की दिशा और दृष्टि देने वाला गुरुतत्व है।
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विस्तार कर ज्ञान को जनसामान्य तक पहुंचाने का महान कार्य किया। वेदों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऋग्वेद स्तुति, यजुर्वेद यज्ञ एवं संस्कार, सामवेद संगीत तथा अथर्ववेद चिकित्सा विज्ञान का आधार है।
वेदव्यास ने वेदों का विस्तार किया, 18 पुराणों की रचना की तथा महाभारत जैसे महाग्रंथ का प्रणयन किया। उन्होंने कहा कि गुरु केवल दीक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि माता-पिता, दादा-दादी और जीवन का मार्गदर्शन करने वाले सभी श्रेष्ठजन गुरु हैं। गुरु शिष्य के जीवन के ताप और संताप को दूर कर उसे श्रेष्ठ जीवन की दिशा देता है।
दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक और मुख्य अतिथि डॉ. मुकेश कुमार मिश्रा ने कहा कि सांदीपनी गुरु-पर्व केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गुरु की भूमिका को पुनः समझने का अवसर है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान करती है। इसके लिए शिक्षकों को पाठ्यक्रम की सीमाओं से बाहर निकलकर विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला, कर्तव्यबोध और मूल्यपरक दृष्टि प्रदान करनी होगी।

















