भारत ने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइलिंग में नया रिकॉर्ड बना लिया है। महज चार महीने से भी कम समय में 4 करोड़ से ज्यादा रिटर्न फाइल हो चुके हैं। इसके पीछे सरकार की डिजिटल टैक्स सिस्टम है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा एनालिटिक्स और दूसरे डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल हो रहा है। इससे टैक्स जमा करना आसान हो गया है और टैक्स बेस भी बढ़ रहा है।
40 मिलियन ITR का माइलस्टोन क्यों अहम है?
26 जुलाई को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने असेसमेंट ईयर (AY) 2026-27 के लिए 4 करोड़ ITR फाइलिंग का आंकड़ा पार कर लिया। इससे पहले के पांच दिनों में ही 20 लाख से ज्यादा रिटर्न दाखिल हुए, क्योंकि 31 जुलाई की आखिरी तारीख नजदीक थी।
फाइलिंग की रफ्तार हर साल बढ़ रही है। AY 2025-26 में कुल 7 करोड़ 30 लाख से ज्यादा ITR फाइल हुए थे। अधिकारी उम्मीद कर रहे हैं कि इस साल यह संख्या और बढ़ेगी, क्योंकि आखिरी दिनों में लाखों लोग रिटर्न भरते हैं। यह तेजी सिर्फ टैक्स कंप्लायंस बढ़ने की वजह से नहीं है, बल्कि सरकार के डिजिटल टैक्स सिस्टम को मजबूत करने का नतीजा भी है।
AI टैक्स फाइलिंग को कैसे आसान बना रहा है?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब टैक्स विभाग का बड़ा सहारा बन गया है। विभाग AI और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल रिटर्न प्रोसेस करने, गड़बड़ियां पकड़ने, नॉन-फाइलर्स को ढूंढने और कंप्लायंस चेक करने में कर रहा है। इससे मैनुअल काम कम हुआ है और रिस्क असेसमेंट ज्यादा सटीक हो गया है।
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टैक्सपेयर्स के लिए सबसे बड़ा फायदा है प्रि-फिल्ड ITR फॉर्म। सैलरी, ब्याज आय, डिविडेंड, TDS, शेयर ट्रांजेक्शंस और दूसरे फाइनेंशियल डिटेल्स खुद-ब-खुद फॉर्म में भर जाते हैं। इससे कागजी काम कम हो गया है, गलतियां घट गई हैं और फाइलिंग जल्दी हो जाती है। डिजिटल वेरिफिकेशन, ऑनलाइन वैलिडेशन और तेज रिफंड प्रोसेसिंग ने भी टैक्सपेयर्स का अनुभव बेहतर कर दिया है।
डेटा एनालिटिक्स कंप्लायंस कैसे मजबूत कर रहा है?
टैक्स विभाग अब कई फाइनेंशियल डेटाबेस से जानकारी लेकर उसे टैक्सपेयर के रिटर्न से मिलाता है। EY इंडिया की सोनू अय्यर कहती हैं कि टेक्नोलॉजी ने कंप्लायंस को बहुत मजबूत किया है।विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी को जोड़कर विभाग को टैक्सपेयर की गतिविधियों का पूरा नजरिया मिलता है। प्रॉपर्टी खरीद, शेयर निवेश, विदेश यात्रा, बड़े खर्च, बैंक ट्रांजेक्शन और डिजिटल पेमेंट्स जैसी चीजों को रिटर्न से क्रॉस-चेक किया जाता है। इससे टैक्स लायबिलिटी का सही आकलन हो पाता है और मैनुअल जांच की जरूरत कम हो जाती है।
AI टैक्स बेस बढ़ाने में कैसे मदद कर रहा है?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI से अनडिक्लेयर्ड इनकम या गड़बड़ियां पकड़े जाने की संभावना बढ़ गई है, जिससे लोग खुद-ब-खुद सही-सही फाइलिंग करने लगे हैं। सोशल मीडिया, लाइफस्टाइल, पब्लिक रिकॉर्ड्स और फाइनेंशियल ट्रांजेक्शंस को डिक्लेयर्ड इनकम से मिलाकर मैचिंग देखी जाती है।
प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स की मदद से विभाग हाई-रिस्क मामलों पर फोकस कर पाता है और अच्छे टैक्सपेयर्स को अनावश्यक परेशानी नहीं होती।
टैक्सपेयर्स और सरकार, दोनों के लिए AI का मतलब
टैक्सपेयर्स को प्रि-फिल्ड फॉर्म, कम गलतियां, तेज वेरिफिकेशन और जल्दी रिफंड मिल रहा है। सरकार के लिए डेटा प्रोसेसिंग ऑटोमैटिक हो गई है, गड़बड़ियां आसानी से पकड़ी जा रही हैं, नॉन-फाइलर्स ढूंढे जा रहे हैं और मैनुअल काम घटा है। इससे टैक्स प्रशासन ज्यादा कुशल, पारदर्शी और प्रभावी हो गया है।
कंप्लायंस बढ़ाने के और कौन से कारण हैं?
टेक्नोलॉजी के अलावा सरल टैक्स रिजीम और कम टैक्स रेट्स ने भी लोगों को फॉर्मल सिस्टम में आने के लिए प्रोत्साहित किया है। साथ ही CRS और FATCA जैसे अंतरराष्ट्रीय सूचना साझा करने वाले समझौतों से विदेशी आय और एसेट्स की जानकारी अब आसानी से मिल जाती है।











