“पाकिस्तान क्या है, आखिर अलीगढ़ के लौंडों की शरारत भर है।”
यह शब्द किसी और के नहीं, बल्कि पाकिस्तान के मशहूर शायर और विचारक जॉन एलिया के हैं, जो जन्मे तो भारत में, लेकिन आखिरी सांस कराची की गलियों में ली। इंटरनेट मीडिया से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन ने अचानक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उन लौंडों (विद्यार्थियों) की याद दिलवा दी, जिन्होंने पाकिस्तान का विचार पैदा किया और बाद में इस विषाक्त विचार ने देश का विभाजन भी करवा दिया।
दिल्ली में प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को जिस तरह देश के युवा व जेनजी आदि विश्लेषणों से सम्मानित किया जा रहा है, वे चाहे अभी वैसे न हों, परंतु उनके आसपास जुटने वाले लोग ऐसे जरूर हैं, जो देश को फिर से बांटना चाहते हैं। देश विभाजन का विचार पैदा करने वाले अलीगढ़ के वे लौंडे भी उस समय इसी तरह युवा थे, परंतु उन्हें बढ़ने दिया गया और इसका परिणाम देश के बंटवारे के रूप में निकला।
आंदोलन के मंच पर विवादित और विभाजनकारी चेहरों की मौजूदगी पर सवाल
कॉकरोच जनता पार्टी के मंच का उपयोग न केवल विपक्षी दलों के नेता कर रहे हैं, बल्कि विवादित व विभाजनकारी लोग भी यहां पहुंच रहे हैं। दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद के पिता और प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के संस्थापक सैयद कासिम रसूल इलियास यहां पहुंच चुके हैं। बड़ी संख्या में खालिद के समर्थक भी प्रदर्शन स्थल पर डटे हुए हैं।
कई वीडियो बताते हैं कि इनका एजेंडा न तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार है और न ही पेपर लीक, बल्कि देश को बांटना है। केवल इतना ही नहीं, विवादित लेखिका अरुंधति राय भी इस मंच का उपयोग कर चुकी हैं। उन्होंने 21 अक्टूबर, 2010 को दिल्ली में कहा था कि “कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था और भारतीय सशस्त्र बलों ने इस पर जबरन कब्जा किया हुआ है।” दो वर्ष पहले दिल्ली के उपराज्यपाल ने इस मामले में उनके विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी।
कुणाल कामरा के बयान और मंच पर उठे विवाद
हिंदू विरोधी कुंठा से ग्रस्त कुणाल कामरा ने मंच से देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के किसी पदाधिकारी ने उन्हें नहीं रोका। रोकना तो दूर, लोग ताली बजाकर उनका साथ देते रहे। इसका कई संगठनों ने विरोध किया है।
इसी तरह के कई अन्य विवादित लोग भी यहां पहुंच रहे हैं। इनमें से कुछ को मंच मिल रहा है, तो कुछ भीड़ में शामिल होकर अपमानजनक नारेबाजी कर रहे हैं। इसे लेकर इंटरनेट मीडिया पर भारी विरोध हो रहा है।
प्रदर्शन में अश्लील नारेबाजी और विरोध की आवाजें
वहां का माहौल देखकर कई छात्र व उनके स्वजन प्रदर्शन से दूरी बना रहे हैं। प्रदर्शन में युवतियां जिस तरह न केवल मौखिक रूप से अश्लील गाली-गलौज कर रही हैं, बल्कि गालियों को पोस्टरों पर लिखकर उनका प्रदर्शन भी कर रही हैं। इसके बावजूद कुछ लोग इन उपद्रवियों को आंदोलनकारी बता रहे हैं।
प्रदर्शन के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल
लोगों के अनुसार, कहने को तो जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन नीट पेपर लीक के विरोध में है, लेकिन इसका भरपूर राजनीतिक और देश विरोधी इस्तेमाल हो रहा है।
कई विपक्षी दलों के नेता यहां से अपना राजनीतिक भविष्य संवारने का मौका तलाश रहे हैं। वहीं, राष्ट्र की एकता व अखंडता को नुकसान पहुंचाने और हिंदू देवी-देवताओं पर अपमानजनक टिप्पणी करने वालों को अपना एजेंडा चलाने का अवसर मिल रहा है।
इनकी उपस्थिति के कारण प्रदर्शन में असामाजिक तत्वों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी घुसने का मौका मिल रहा है, जिससे प्रदर्शन के नाम पर हिंसा के मामले सामने आ रहे हैं।
हिंसा, पुलिस पर हमले और आयोजकों पर सवाल
ये असामाजिक तत्व छात्रों को हिंसा के लिए भड़का रहे हैं और पुलिस पर हमले भी हुए हैं। जब हर तरफ से आलोचना शुरू हुई, तो प्रदर्शन के आयोजकों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि प्रदर्शन में कुछ असामाजिक तत्वों को भेजा गया है।
संस्था के संस्थापक व पदाधिकारियों पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। संस्था के सर्वेसर्वा अभिजीत दीपके के पुराने ट्वीट्स इंटरनेट मीडिया पर साझा कर विरोध जताया जा रहा है। उन ट्वीट्स में उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया था।
अर्पित शर्मा और विदेशी कनेक्शन को लेकर दावे
लंदन में रहने वाले उनके एक अन्य साथी अर्पित शर्मा के खिलाफ पिछले वर्ष सितंबर में बुलंदशहर में मामला दर्ज हुआ था। उसने अपने यूट्यूब चैनल पर नेपाल के जेन-जी आंदोलन को भारत से जोड़ते हुए वीडियो बनाया था।
रही-सही कसर खालिस्तानी तत्वों ने पूरी कर दी। पिछले दिनों प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो जारी कर यह दावा किया कि उसकी कॉकरोच जनता पार्टी के पदाधिकारियों के साथ ऑनलाइन बैठक हुई है। उसने इस संस्था को आर्थिक मदद देने की भी घोषणा की है।
इसे लेकर भी कई लोग इस प्रदर्शन के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ होने का आरोप लगा रहे हैं। आखिर देश विभाजन से पहले के अलीगढ़ के उन लौंडों और इन आंदोलनकारियों में क्या अंतर है?
देश विभाजन और इतिहास से सीख लेने की जरूरत
देश को विभाजित करने की इच्छा रखने वाले याद रखें, जब देश बंटता है तो केवल जमीन ही नहीं बंटती, बल्कि दिल भी विभाजित हो जाते हैं। समय गुजरने के बाद जब अपनी मिट्टी की खुशबू याद आती है, तो उस समय पछतावे के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता।
उक्त पाकिस्तानी शायर जॉन एलिया विभाजन के बाद एक बार भारत आए तो उन्होंने इसी पछतावे को यूं बयां किया था—
हम आंधियों के बन में किसी कारवां के थे,
जाने कहां से आए हैं, जाने कहां के थे।
ऐ जान-ए-दास्तां तुझे आया कभी ख्याल,
वह लोग क्या हुए जो तेरी दास्तां के थे।
मिलकर तपाक से हमें न कीजिए उदास,
खातिर न कीजिए, कभी हम भी यहां के थे।
क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए मुसाफिरो,
हिंदोस्तां में आए हैं, हिंदोस्तां के थे।















