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Explainer: RBI ने शुरू किया प्लास्टिक नोट्स का नया ट्रायल, क्या हैं इसके फायदे?

आरबीआई ने 15 साल बाद प्लास्टिक (पॉलीमर) नोट्स का ट्रायल शुरू करने की तैयारी कर ली है। जानिए 2012 का ट्रायल क्यों रुका, प्लास्टिक नोट्स के फायदे, सुरक्षा, पर्यावरण बचत और दुनिया के 50+ देशों का अनुभव।

Published by
कुलदीप सिंह

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बड़ा कदम उठाते हुए प्लास्टिक यानी पॉलीमर नोट्स का ट्रायल शुरू करने की तैयारी की है। यह कोशिश 15 साल बाद फिर से हो रही है। पेपर नोट्स की जगह प्लास्टिक वाले नोट लाने के कई फायदे हैं। दुनिया भर में 50 से ज्यादा देश पहले से ही इनका इस्तेमाल कर रहे हैं।

2012 का ट्रायल क्या हुआ था?

2009 में आरबीआई ने प्लास्टिक नोट्स के लिए बोलियां मंगाई थीं। 100 करोड़ रुपये के 10 के नोट छापने की योजना थी। इन्हें कोच्चि, मैसूर, शिमला, जयपुर और भुवनेश्वर जैसे अलग-अलग मौसम वाले इलाकों में ट्रायल के लिए भेजा जाना था। लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 2014-15 के आरबीआई रिपोर्ट में कहा गया कि कुछ तकनीकी दिक्कतें आईं, इसलिए प्रक्रिया रुक गई। अब फिर से भारतीया रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने टेंडर निकाला है। इसमें 3.4 करोड़ पॉलीमर शीट्स मांगी गई हैं, जो खास सुरक्षा फीचर्स वाली हैं। अगर ट्रायल सफल रहा तो और ज्यादा खरीद होगी। BRBNMPL और SPMCIL इन शीट्स से नोट छापेंगे।

दुनिया भर में प्लास्टिक नोट्स

ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट जारी किए थे। अब यूके, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे विकसित देश और हमारे पड़ोसी थाईलैंड, वियतनाम, मलेशिया, सिंगापुर भी इनका इस्तेमाल करते हैं। ये नोट पेपर वाले नोट्स से काफी बेहतर माने जाते हैं।

प्लास्टिक नोट्स ज्यादा टिकाऊ क्यों हैं?

पेपर नोट्स 100% कॉटन से बनते हैं। प्लास्टिक नोट्स इनसे 2 से 6 गुना ज्यादा चलते हैं। छोटे नोट ज्यादा हाथों में घूमते हैं, इसलिए जल्दी खराब होते हैं। लंबी उम्र का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कम नोट छापने पड़ते हैं। इससे प्रिंटिंग, बांटने और पुराने नोट्स नष्ट करने का खर्च भी बचता है। पर्यावरण को भी फायदा पहुंचता है। 2013 में आरबीआई ने TERI से स्टडी कराई थी। उसमें पाया गया कि प्लास्टिक नोट्स का पूरा जीवन चक्र देखें तो कार्बन फुटप्रिंट काफी कम होता है। प्लास्टिक नोट्स को रिसाइकल करके कंपोस्ट बिन, पाइप या दूसरे सामान में बदला जा सकता है।

आंकड़े क्या कहते हैं?

पिछले तीन साल में आरबीआई ने 8,270 करोड़ नए नोट जारी किए। उसी दौरान 6,213 करोड़ पुराने नोट नष्ट कर दिए गए। यानी चार नए नोट जारी करने पर तीन पुराने नष्ट करने पड़ते हैं। प्लास्टिक नोट्स से यह रेट काफी कम हो जाएगा। पिछले दस साल में नोट छापने पर आरबीआई ने 52,095 करोड़ रुपये खर्च किए। यह आरबीआई के कुल खर्च का 15 से 44 प्रतिशत तक होता है। प्लास्टिक नोट्स महंगे पड़ते हैं शुरू में, लेकिन लंबे समय में बचत होती है।

सुरक्षा का फायदा

प्लास्टिक नोट्स जालसाजी रोकने में बेहतर हैं। ज्यादातर नकली नोट पेपर पर बनाए जाते हैं। ब्रिटेन की कंपनी डी ला रुए के अनुसार, जहां प्लास्टिक नोट्स शुरू हुए, वहां फेक नोट्स कम हो गए। भारत में 2025-26 में 2.3 लाख नकली नोट पकड़े गए, जो पिछले साल से थोड़े ज्यादा हैं।

कैश की मांग अभी भी बनी हुई है

डिजिटल पेमेंट बढ़ गए हैं, लेकिन कैश की जरूरत कम नहीं हुई। मार्च 2026 में कुल करेंसी सर्कुलेशन 41.7 लाख करोड़ रुपये था, जो 12% ज्यादा है। आरबीआई सर्वे में घरों और छोटे दुकानदारों ने कैश को अभी भी पसंद बताया।

आयात की चिंता

प्लास्टिक शीट्स विदेश से आ सकती हैं। टेंडर में चीन और पाकिस्तान से जुड़े किसी भी रिस्क को रोकने के सख्त नियम हैं। पहले पेपर और इंक के आयात पर भी निर्भर थे, अब धीरे-धीरे घरेलू उत्पादन बढ़ाया गया है। इसलिए प्लास्टिक नोट्स पर भी धीरे-धीरे जाना पड़ेगा, क्योंकि पुरानी मशीनों पर निवेश हो चुका है और नई के लिए भी पैसा लगेगा।

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