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वोकिज्म से ग्रस्त ‘हॉलीवुड’: पहचान की राजनीति, विविधता और प्रतिनिधित्व की नई बहस – ‘द ओडिसी’ एक विमर्श

द ओडिसी' प्राचीन यूनानी कवि होमर द्वारा रचित महाकाव्य ''ओडिसी'' पर आधारित है, जिसमें ट्रॉय युद्ध के बाद इथाका के राजा ओडीसियस की लगभग दस वर्षों तक चली कठिन घर-वापसी की रोमांचक यात्रा को दर्शाया गया है।

Published by
माही दुबे

20वीं शताब्दी ने यह सिद्ध कर दिया था कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की चेतना और विचारों को प्रभावित करने का सबसे प्रभावशाली साधन है। इटली में मुसोलिनी, जर्मनी में हिटलर और सोवियत में लेनिन के बाद विकसित हुए साम्यवादी और कम्युनिस्ट तंत्र ने भी सिनेमा को बामी नरेटिव और अपने समकालीन राजनीतिक एजेंडे के प्रसार का प्रभावी टूल बना दिया है।

कभी लेनिन ने कहा था फिल्में विचार के प्रसार का प्रभावी माध्यम होती है, वर्तमान में हॉलीवुड में रिलीज हुई फिल्म ‘द ओडिसी’ ने यह सिद्ध कर दिया। कहने को तो हॉलीवुड को लंबे समय से टेक्निकल एडवांसमेंट और ट्रेडिशनल स्टूडियो सिस्टम का प्रतिनिधि माना जाता रहा है पर पिछले एक दशक में हॉलीवुड के भीतर पहचान की राजनीति, विविधता, समानता और प्रतिनिधित्व जैसे विषयों का प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देने लगा है। आज हॉलीवुड में ‘वोकिज्म, आइडेंटिटी पॉलिटिक्स, रिप्रेजेंटेशन और डीईआई (Diversity, Equity & Inclusion) जैसे विमर्श फिल्मों का कथानक ही नहीं बल्कि पात्रों के चयन और ऐतिहासिक ग्रंथों को भी प्रभावित कर रहे हैं। ऑस्कर अकादमी द्वारा प्रतिनिधित्व और समावेशन से जुड़े नए मानदंड लागू होने के बाद यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगी है। इसका प्रभाव अब केवल हॉलीवुड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्व सिनेमा और भारतीय फिल्म उद्योग में भी इसकी चर्चा होने लगी है। हाल ही में रिलीज हुई ‘द ओडिसी’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

‘द ओडिसी’ प्राचीन यूनानी कवि होमर द्वारा रचित महाकाव्य ”ओडिसी” पर आधारित है, जिसमें ट्रॉय युद्ध के बाद इथाका के राजा ओडीसियस की लगभग दस वर्षों तक चली कठिन घर-वापसी की रोमांचक यात्रा को दर्शाया गया है। फिल्म को पूर्ण रूप से अत्याधुनिक IMAX कमरा पर शूट किया गया जो इसे इतिहास की पहली ऐसी फीचर फिल्म बनाता है जो पूरी तरह से IMAX कैमरों से शूट हुई है। फिल्म का बजट लगभग 250 मिलियन डॉलर है जिसे पांच देशों में शूट किया गया, इसे नोलन के अब तक के सबसे महत्वाकांक्षी और महंगे सिनेमाई प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है।

होमर द्वारा रचित ‘ओडिसी’ केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि पश्चिमी सभ्यता की सांस्कृतिक आधारशिला मानी जाती है। भारत और यूनान की प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन में अनेक वैचारिक और सांस्कृतिक समानताएँ दिखाई देती हैं। हमारे यहाँ रामायण और महाभारत जिस प्रकार सभ्यता के आधारग्रंथ हैं, उसी प्रकार यूनानी परंपरा में Iliad और Odyssey का स्थान है।

जानें क्या है पूरा विवाद?

यूनानी परंपरा में जिस ‘हेलेन ऑफ ट्रॉय’ का वर्णन है उन्हें विश्व के अनुपम सौंदर्य का प्रतीक माना गया है। मूल साहित्य में ‘हेलेन’ का वर्णन जिस श्वेत रंग और सौंदर्य के साथ मिलता है वहीं फिल्म में बिल्कुल विपरीत प्रस्तुति दिखाई देती है। जब दर्शकों ने हेलन की भूमिका में केन्याई-मेक्सिकन मूल की अभिनेत्री लुपिता न्योंगो को पर्दे पर देखा तो यह बहस का विषय बन गया। फिर क्या था सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न हुईं, आलोचक मानते है कि यह रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं है बल्कि हॉलीवुड में बढ़ते वोक एजेंडा और अमेरिका में लंबे समय से चल रही ‘नस्ल और प्रतिनिधित्व’ की ब्लैक और वाइट बहसों का प्रभाव है। यही कारण है कि जब इस महाकाव्य पर नोलन फिल्म बना रहे थे, तब स्वाभाविक रूप से दर्शकों की अपेक्षा रहती है कि मूल साहित्य और उसके पात्रों की आत्मा सुरक्षित रहे ओर क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर मूल साहित्य के साथ कोई छेड़-छाड न हो लेकिन ‘द ओडिसी’ अपनी रिलीज के साथ ही एक अलग कारण से वैश्विक बहस का विषय बन गई। वर्ष 2023 में उनके द्वारा निर्मित फिल्म ओपनहाइमर में फिल्म के नायक को आपत्तिजनक स्थिति में श्रीमत भागवत गीता पढ़ते दिखाया था।

‘द ओडिसी’ का दृश्यांकन और भव्यता निश्चित रूप से आकर्षक है, लेकिन एक बात सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज विश्व की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में भी वैचारिक एजेंडा, सामाजिक, राजनीति, वोक और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित है?

क्या हॉलीवुड वैचारिक दबावों से मुक्त है?

‘हॉलीवुड’ अमेरिका के लॉस एंजिल्स में स्थित है जिसे अमेरिकन फिल्म इंडस्ट्री का केंद्र माना जाता है। हॉलीवुड के भीतर वामपंथी प्रभाव बड़ा है, पिछले एक दशक में हॉलीवुड का विमर्श तेजी से बदला, अमेरिका में चल रहे वोक मोवमेंट और हॉलीवुड के #OscarsSoWhite अभियान के बाद अकादमी (ऑस्कर अवॉर्ड्स) ने अपनी सदस्यता में व्यापक बदलाव किए इस बहस को और बल तब मिला जब ‘एकेडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट एंड साइंसेज’ ने अपनी “बेस्ट पिक्चर” श्रेणी के लिए विविधता और प्रतिनिधित्व से जुड़े नए पात्रता मानदंड (Representation and Inclusion Standards) लागू किए।

ऑस्कर्स की क्वालिफिकेशन लिस्ट से डिसक्वालीफाई न होने के कारण आज बड़े-बड़े स्टूडियो को भी विविधता और प्रतिनिधित्व से जुड़े नए पात्रता नियमों को मनना पढता है। उदाहरण के तोर पर: ‘द ओडिसी’ या डिज़्नी द्वारा अपनी कई क्लासिक कहानियों के नए संस्करणों में पात्रों के चयन और प्रस्तुति को लेकर भी विश्वभर में प्रतिक्रिया हुईं। ऐसी ही बहसें ‘द लिटिल मरमेड’, ‘स्नो वाइट’ और अब क्रिस्टोफर नोलन की बहुप्रतीक्षित ‘द ओडिसी’ को लेकर भी देखने को मिल रही हैं। यही कारण है आज कला जगत में “कल्चरल मार्क्सिज्म”, “वोक कल्चर के नाम पर विविधता, समानता और समावेश (DEI (Diversity, Equity & Inclusion)” और प्रतिनिधित्व (representation) जैसे शब्द वैश्विक सांस्कृतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं।

फिल्म रिलीज़ होने के बाद भी द ओडिसी को लेकर सबसे अधिक चर्चा उसके तकनीकी वैभव से अधिक हेलेन ऑफ ट्रॉय के पात्र को लेकर हो रही है। केन्याई-मेक्सिकन मूल की अश्वेत अभिनेत्री लुपिता न्योंगो को इस भूमिका में लेने के निर्णय ने विश्वभर में नई बहस छेड़ दी। सोशल मीडिया पर एलन मस्क, अमेरिकी राजनीतिक टिप्पणीकार मैट वॉल्श सहित कई लोगों ने इस कास्टिंग की आलोचना करते हुए इसे हॉलीवुड के बदलते सांस्कृतिक दृष्टिकोण का प्रभाव बताया है, वहीं ग्रीस सरकार से फिल्म को आर्थिक सहायता मिलने के कारण कुछ यूनानी नागरिकों ने भी यह प्रश्न उठाया कि क्या उनकी सांस्कृतिक धरोहर का मूल स्वरूप सुरक्षित रखा गया है?

‘द ओडिसी’ के बॉक्स ऑफिस पर अव्वल प्रदर्शन में स्पष्ट कर दिया यह एक सफल फिल्म होगी, लेकिन इतना निश्चित है हॉलीवुड में बढ़ रहा “वोक प्रभाव” विश्व सिनेमा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक बहस को जन्म दे चुका है।

एक फिल्मकार होने के नाते मैं हमेशा से ‘नोलन’ की फिल्मों का प्रशंसक रहा हूं, उनकी फिल्में लार्जर दैन लाइफ होती है वे सी.जी.आई की जगह प्रैक्टिकल इफेक्ट्स का जोर देते हैं, नोलन कंप्रोमाइज न करने के लिए प्रसिद्ध है मगर वॉक प्रभाव के चलते उन्हें वैचारिक कंप्रोमाइज करते मजबूर दिखाई देते हैं।

बॉलीवुड में भी वोक विचारधारा का प्रवेश

हॉलीवुड की नकल से बॉलीवुड ओर बॉलीवुड के प्रभाव से ओटीटी प्लेटफॉर्म और हमारे धारावाहिकों में भी यह वोक विचारधारा प्रवेश करने लगी है। आज जिस प्रकार यूनानी ग्रंथों के साथ छेद-छाड़ हो रही है ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि भविष्य में रामायण, महाभारत या अन्य भारतीय सांस्कृतिक ग्रंथों पर फिल्म बनें, क्या वहां भी प्रतिनिधित्व के आधार पर पत्रों का चयन करना होगा? ओर करोड़ों दर्शकों की आस्था और भावनाओं को अनदेखा कर दिया जाएगा? यही प्रश्न इस लेख के केंद्र में है, नोलन की फिल्म ‘द ओडिसी’ भी इस व्यापक वैश्विक बहस का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आई है।

 

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