क्या है हेरा पंचमी? रथयात्रा के दौरान माता लक्ष्मी का दिव्य रोष...जगन्नाथ मंदिर की ये परंपरा अनोखी
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क्या है हेरा पंचमी? रथयात्रा के दौरान माता लक्ष्मी का दिव्य रोष…जगन्नाथ मंदिर की ये परंपरा अनोखी

पुरी की रथयात्रा अपने विविध धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है। इन्हीं में से एक अत्यंत भावनात्मक और प्रतीकात्मक अनुष्ठान है हेरा पंचमी, जो भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के दिव्य संबंधों को दर्शाता है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Jul 21, 2026, 02:45 pm IST
inओडिशा

भुवनेश्वर: पुरी की रथयात्रा अपने विविध धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है। इन्हीं में से एक अत्यंत भावनात्मक और प्रतीकात्मक अनुष्ठान है हेरा पंचमी, जो भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी के दिव्य संबंधों को दर्शाता है। यह अनुष्ठान आध्यात्मिक आस्था और मानवीय भावनाओं का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

रथयात्रा के आरंभ में महाप्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ श्रीगुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं, जिसे उनकी मौसी का घर माना जाता है। किंतु इस यात्रा में वे माता लक्ष्मी को साथ नहीं ले जाते और न ही उन्हें इसकी सूचना देते हैं। यही प्रसंग हेरा पंचमी के आयोजन का आधार बनता है।

माता लक्ष्मी का रोष
माता लक्ष्मी, जो स्वाभिमान और गरिमा की प्रतीक मानी जाती हैं, महाप्रभु के इस व्यवहार से आहत होती हैं। रथयात्रा के पांचवें दिन मनाया जाने वाला हेरा पंचमी अनुष्ठान उनके इसी भाव को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाता है।

इस दिन माता लक्ष्मी भव्य श्रृंगार में, सेवायतों और अनुयायियों के साथ श्रीजगन्नाथ मंदिर से श्रीगुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करती हैं। इस दिव्य यात्रा को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु बड़दांड (ग्रैंड रोड) पर एकत्रित होते हैं। परंपरा के अनुसार, प्रस्थान से पूर्व माता लक्ष्मी, माता विमला के पास जाकर परामर्श लेती हैं। मान्यता है कि माता विमला उन्हें मोहनचूर्ण प्रदान करती हैं, जिसे लेकर वे गुंडिचा मंदिर जाती हैं।

गुंडिचा मंदिर में अनुष्ठान और नंदीघोष रथ का प्रतीकात्मक क्षतिग्रस्त होना
गुंडिचा मंदिर के समीप सरधाबाली क्षेत्र में पहुंचने के बाद विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं। यहां प्रसाद, बंदापना, चामर सेवा और आलता जैसे अनुष्ठानों के साथ देवी का स्वागत किया जाता है। साथ ही विभिन्न प्रकार के पारंपरिक भोग भी अर्पित किए जाते हैं।

माता लक्ष्मी, गुंडिचा मंदिर के जगमोहन स्थित जय-विजय द्वार तक पहुंचती हैं, जहां सेवायत उन्हें महाप्रभु जगन्नाथ की आज्ञामाला अर्पित करते हैं, जो एक प्रकार से संवाद और स्वीकार्यता का प्रतीक है। इसके बाद मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। हेरा पंचमी का सबसे प्रमुख आकर्षण वह क्षण होता है जब माता लक्ष्मी के रोष को दर्शाते हुए सेवायत नंदीघोष रथ के हंसपट (सजावटी भाग) को प्रतीकात्मक रूप से तोड़ते हैं। यह क्रिया माता लक्ष्मी के उस आक्रोश को दर्शाती है, जो उन्हें रथयात्रा में साथ न ले जाने के कारण उत्पन्न हुआ।

नाकचणा द्वार से वापसी यात्रा
प्रतीकात्मक संवाद के बाद भी माता लक्ष्मी का रोष पूरी तरह शांत नहीं होता। वे गुंडिचा मंदिर से नाकचणा द्वार के माध्यम से बाहर निकलती हैं और पुनः श्रीजगन्नाथ मंदिर की ओर प्रस्थान करती हैं।

वापसी के दौरान बंदापना और दहीपाटी मनोही जैसे अनुष्ठान पुनः संपन्न होते हैं। नंदीघोष रथ के एक हिस्से को तोड़ने की यह परंपरा भक्तों के लिए अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है, जो इस अनुष्ठान की विशिष्टता को और अधिक गहराई प्रदान करती है।

अनुष्ठानों में विलंब, फिर भी भक्तों का उत्साह अटूट
इस वर्ष हेरा पंचमी के पावन अनुष्ठानों में तीन घंटे से अधिक की देरी देखने को मिली, जिसका मुख्य कारण श्रीगुंडिचा मंदिर में महाप्रभु जगन्नाथ से जुड़े विस्तारित अनुष्ठान रहे। परिणामस्वरूप माता लक्ष्मी की पारंपरिक शोभायात्रा देर रात संपन्न हुई, जिसने इस दिव्य आयोजन को और अधिक विशिष्ट बना दिया।

इससे पूर्व, बनकलागी अनुष्ठान के उपरांत महा स्नान और अन्य प्रातःकालीन विधियां सुबह 7:35 बजे तक पूर्ण हुईं। श्रीगुंडिचा मंदिर में दिन की शुरुआत सुबह 8:15 बजे मंगल आरती से हुई, जिसके बाद अबकाश, गोपाल बल्लव पूजा, सकाल धूप, भोग मंडप, यातरंगी महा स्नान, घंटा छटा तथा नुआ लागी वेश जैसे अनुष्ठान क्रमशः संपन्न हुए। ये सभी विधियां शाम तक चलती रहीं। इसके पश्चात मध्याह्न धूप और द्वितीय भोग मंडप जैसे अनुष्ठानों ने कार्यक्रम को और लंबा कर दिया, जिससे समग्र रूप से देरी हुई।

देर रात तक अनुष्ठान होने के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। हजारों भक्त बड़दांड (ग्रैंड रोड) पर एकत्रित रहे और इस पवित्र अनुष्ठान के साक्षी बनकर आध्यात्मिक संतोष एवं आनंद की अनुभूति की। हेरा पंचमी का एक महत्वपूर्ण पहलू फुलुरी तेल की तैयारी भी है, जो जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। इस तेल का उपयोग अनासर काल के दौरान किया जाता है, जब स्नान पूर्णिमा के बाद महाप्रभु जगन्नाथ और उनके सहोदर देवताओं के अस्वस्थ होने की मान्यता है।

विशेष बात यह है कि हेरा पंचमी के दिन तैयार किया गया यह तेल भूमिगत रखा जाता है, ताकि वह समय के साथ परिपक्व हो सके। इसके बाद इसे अगले वर्ष के अनुष्ठानों में प्रयोग किया जाता है।

दक्षिण मोड़: वापसी यात्रा की तैयारी
हेरा पंचमी के समापन के साथ ही बाहुडा यात्रा, अर्थात देवताओं की श्रीजगन्नाथ मंदिर वापसी, की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं। इस चरण का एक प्रमुख अनुष्ठान दक्षिण मोड़ है, जिसका अर्थ है रथों को दक्षिण दिशा की ओर मोड़ना।
मुख्य रथयात्रा के विपरीत, जिसमें रथों को केवल आगे की दिशा में खींचा जाता है, दक्षिणा मोड़ के दौरान रथों को आगे और पीछे दोनों ओर से रस्सियां बांधकर संचालित किया जाता है। इस प्रक्रिया से रथों को नाकचणा द्वार की दिशा में सुव्यवस्थित किया जाता है, जिससे उनकी वापसी यात्रा सुचारू रूप से आरंभ हो सके।

इस अनुष्ठान की एक विशेषता रथ खींचने के क्रम में परिवर्तन भी है। जहां रथयात्रा के दौरान बलभद्र जी का रथ तलध्वज सबसे पहले चलता है, वहीं दक्षिण मोड़ के समय सबसे पहले सुभद्रा जी का रथ खींचा जाता है। इसके बाद तलध्वज और अंत में नंदीघोष रथ को स्थानांतरित किया जाता है।

परंपरा में बदलाव और आधुनिक सुविधाएं
पूर्वकाल में विशाल रथों को मोड़ने के लिए हाथियों की सहायता ली जाती थी, जो पीछे से धक्का देकर इस कार्य को सरल बनाते थे। समय के साथ यह परंपरा समाप्त हो गई और अब प्रशिक्षित सेवायत रस्सियों और समन्वित प्रयासों के माध्यम से इस कार्य को संपन्न करते हैं।

पहले असमान भूभाग और जलभराव के कारण यह प्रक्रिया दो दिनों तक चलती थी, लेकिन अब बेहतर आधारभूत संरचना के चलते इसे एक ही दिन में पूरा कर लिया जाता है। घंटुआ (घंटी बजाने वाले) और डाहुका (पारंपरिक उद्घोषक) इस अनुष्ठान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो रथों की गति और दिशा को नियंत्रित करते हैं। मुख्य रथयात्रा के विपरीत, इसमें आम श्रद्धालु भाग नहीं लेते।

आस्था, परंपरा और दिव्य लीला का संगम
हेरा पंचमी और दक्षिण मोड़ जैसे अनुष्ठान रथयात्रा की गहरी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को उजागर करते हैं। ये केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं, बल्कि दिव्य लीला का सजीव रूप हैं, जहां देवताओं के माध्यम से मानवीय भावनाओं का भी अनुभव होता है।

जैसे-जैसे बाहुडा यात्रा की तैयारियां तेज हो रही हैं, पुरी में आध्यात्मिक वातावरण और अधिक प्रगाढ़ होता जा रहा है। यह उत्सव न केवल श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी जीवंत प्रमाण है।

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