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4,000+ कलाकार, 450+ संस्थाएं : कश्मीर से कन्याकुमारी 39 भाषाओं में एक साथ गूंजा वंदेमातरम्

संगीत नाटक अकादमी के राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में जुटे 4000 से अधिक कलाकार; 'क्रांति 1857' और 'मृगतृष्णा' नाटकों ने भरा देशभक्ति का ओज। पढ़ें पूरी रिपोर्ट

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शशिप्रभा तिवारी

नई दिल्ली। देशभर में कश्मीर से कन्याकुमारी तक बुधवार शाम छह बजे एक साथ ‘वंदे मातरम्’ गूंज उठा। मौका था—महाकवि कालिदास की जयंती का। गत 15 जुलाई की शाम राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन किया गया। संगीत नाटक अकादमी का यह आयोजन ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में था।

राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में 4,000 से अधिक कलाकारों ने लिया हिस्सा

संस्कृति मंत्रालय के सचिव विवेक अग्रवाल के अनुसार, इस महोत्सव में देशभर के 4,000 से अधिक कलाकारों और 450 से अधिक संस्थाओं ने भाग लिया। एक ही दिन में देशभर में लगभग 39 भाषाओं में कलाकारों ने ‘वंदे मातरम्’ गाया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में नाटक, मूक नाटक, कठपुतली नाटक और एकल नाट्य प्रस्तुतियां भी शामिल थीं।

राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक एकता का संदेश देने का प्रयास

राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के संदर्भ में संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय रंगमंच के माध्यम से राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक एकता और भारतीय जीवन मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाना है। इस आयोजन ने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और ‘विकसित भारत-2047’ का संदेश दिया। इस अवसर पर राजधानी दिल्ली में तीन प्रस्तुतियां कलाकारों ने प्रस्तुत कीं। इसमें तीन नाटिकाएं—‘क्रांति 1857’, ‘मृगतृष्णा’ और ‘क्रांतिगीत—द स्पिरिट ऑफ वंदे मातरम्’ शामिल थीं।

राजघाट में प्रस्तुत किया गया ‘क्रांति 1857’ नाटक

राजघाट में नाटक ‘क्रांति 1857’ का निर्देशन हिमांशु यादव ने किया। इसे सम्मुख संस्था के कलाकारों ने पेश किया।

‘मृगतृष्णा’ में चापेकर बंधुओं के योगदान और बलिदान को दिखाया

दूसरी प्रस्तुति नाटक ‘मृगतृष्णा’ कथक केंद्र के विवेकानंद सभागार में आयोजित की गई। इस नाटक को आशीष सिंह के निर्देशन में अभिनय सेतु थिएटर के कलाकारों ने पेश किया। नाटक ‘मृगतृष्णा’ में सूत्रधार के रूप में लोकमान्य बाल गंगाधर ‘तिलक’ को मुख्य पात्र बनाया गया था। ‘तिलक’ की स्मृतियों की पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता आंदोलन में चापेकर बंधुओं के योगदान और बलिदान को दर्शाया गया।

युवा कलाकारों की इस प्रस्तुति में महारानी विक्टोरिया की ताजपोशी, चार्ल्स ग्रैंड की हत्या, चापेकर बंधुओं की योजना, न्यायालय में सुनवाई और उनकी फांसी की सजा के माध्यम से कहानी को गूंथा गया था।

‘मृगतृष्णा’ में गीतों और संवादों ने बांधा समां

कोरस के गीत ‘चंद रुपयों के लालच में’ और ‘लोरी गाकर इस गोदी में’ ने कहानी को रस और प्रवाह दिया। वहीं, ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ की घोष से वातावरण और ओजपूर्ण बन गया। अंत में सूत्रधार तिलक का संवाद—‘अभी इस देश में तिलक जिंदा है’—मर्मस्पर्शी था। युवा कलाकारों की यह अच्छी प्रस्तुति थी।

द्वारका में ‘क्रांतिगीत’ की प्रस्तुति

सिली सोल फाउंडेशन के कलाकारों ने ‘क्रांतिगीत’ पेश किया। यह आयोजन द्वारका स्थित भरतमुनि सभागार में किया गया। इस प्रस्तुति का निर्देशन प्रियंका शर्मा ने किया।

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