
सुख-सुविधाओं से भरे महल में मूर्खों के साथ रहने से बेहतर है कि एकांत में रहें। जीवन की दिशा भौतिक सुखों से नहीं, बल्कि वैचारिक संगति से तय होती है। इस पर पढ़ें आज का श्लोक
वरं पर्वत-दुर्गेषु भ्रन्तं वनचरैः सह।
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि ।।
पहाड़ों के स्थानों में वनचरों (जंगली जानवरों) के साथ घूमना अच्छा है, किन्तु मूर्खों के साथ इन्द्र के महलों में भी रहना अच्छा नहीं है।
आज के डिजिटल,आभासी और कॉरपोरेट के युग में यह श्लोक प्रासंगिक है। सोशल मीडिया की ट्रोलरों की भीड़ (वर्चुअल मूर्खता) और दफ्तरों के टॉक्सिक वर्क कल्चर में घिरे रहने से बेहतर है कि एकांत चुनें और प्रकृति के करीब रहें। इससे मानसिक शांति तो मिलेगी ही, नए विचार भी आएंगे। भोग-विलास कभी भी कुसंगति का जहर कम नहीं कर सकता है।