Hariyali Teej: शिव-पार्वती के दिव्य झूले से जुड़ी अनसुनी पौराणिक कथा
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Hariyali Teej: शिव-पार्वती के दिव्य झूले से जुड़ी अनसुनी पौराणिक कथा

हमारी संस्कृति में सावन में हरियाली तीज के दिन झूला झूलने की परंपरा बहुत पुरानी है। कहा जाता है कि सर्वप्रथम भगवान शिव ने अपने हाथों से झूला बनाकर श्रावणी तीज के दिन माता पार्वती को झूला झुलाया था।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
Jul 26, 2025, 12:40 pm IST
inधर्म-संस्कृति
hariyali teej 2025

hariyali teej 2025

श्रावण मास की हरियाली से हरी-भरी ऋतु में रिमझिम फुहारों के मध्य इस ऋतु पर्व के आत्मिक आनंद का एक अभिन्न प्रतीक है झूला। झूले की पींगे मन के पंख खोलकर मानव के अंतस में उत्साह, उमंग, उल्लास, प्रसन्नता और नवोन्मेष का संचार कर देती हैं। हमारी आराध्य शक्तियों के झूला उत्सव के दिव्य राग-रंग हमारी इसी आस्था को पुष्पित-पल्लवित और प्रगाढ़ करते हैं। सावन में जब बारिश की बूंदें धरती को भिगोती हैं, तब हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया) का उत्सव शुरू होता है। यह पर्व, जिसे ‘सिंधारा तीज’ व ‘श्रावणी तीज’ भी कहते हैं; समूचे उत्तर भारत में खूब धूमधाम से मनाया जाता है। हमारी संस्कृति में सावन में हरियाली तीज के दिन झूला झूलने की परंपरा बहुत पुरानी है। कहा जाता है कि सर्वप्रथम भगवान शिव ने अपने हाथों से झूला बनाकर श्रावणी तीज के दिन माता पार्वती को झूला झुलाया था। सावन के झूलनोत्सव की शुरुआत तभी से मानी जाती है।

भगवान शिव ने माता पार्वती के लिए बनाया था पुष्पों का झूला

पौराणिक कथानक के अनुसार विवाह के उपरांत एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से झूला झूलने की इच्छा जतायी। किन्तु प्रायः ध्यान में लीन रहने के कारण भगवान शिव ने उस बात पर विशेष ध्यान नहीं दिया। इस पर माता पार्वती उनसे रुष्ट हो गयीं और उन्होंने महादेव से बात करना बंद कर दिया। यह देख कर नंदी भगवान शिव के पास गये और नमन करके बोले- प्रभु! माता सदैव आपका कितना ख्याल रखती हैं, कितनी चिंता करती हैं। हमेशा आपकी हर सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखती हैं और आपकी हर इच्छा को पूरा करने में पूर्ण मनोयोग से जुटी रहती हैं। परंतु कुछ दिनों से माता कुछ उदास और अनमनी सी दिख रही हैं। प्रभु! मुझे प्रतीत होता है कि शायद माता इसलिए नाराज हैं कि आपने उनके कहने पर उनके लिए झूला नहीं बनाया। नंदी के कहने पर भगवान शिव को अपनी भूल समझ में आ गयी। उन्होंने तत्काल अपने सभी गणों को बुलाया और उन्हें झूला बनाने के लिए सामग्री एकत्रित करने का निर्देश दिया। कुछ ही समय में कैलाश पर्वत के उपवन में सुंदर फूलों से सजा एक दिव्य व भव्य झूला बनकर तैयार हो गया। झूला दिव्य व भव्य होता भी क्यों न!

आखिर उसे देवाधिदेव महादेव ने स्वयं अपने हाथों से जो बनाया था। वहीं जब माता पार्वती उपवन में सारे गण-प्रेतों का जमघट देखा तो उनके मन में सहज ही कौतुहल उत्पन्न कि ये सारे शिवगण आज एक साथ इस उपवन में क्या कर रहे हैं? और जिज्ञासा के शमन के लिए उनके कदम स्वतः ही उपवन की ओर बढ़ चले। जैसे ही उन्होंने उस उपवन में प्रवेश किया तो सामने एक वृक्ष की डाली पर फूलों और वृक्ष की लताओं से सजा एक बहुत सुंदर झूला पड़ा देखा। उस झूले को देखते ही माँ पार्वती के नेत्र सहज ही आनन्दाश्रुओं से सजल हो उठे और अंतस प्रेम की अनूठी भावनाओं से आपूरित हो उठा। कहते हैं कि महादेव ने मुदित मन से माता पार्वती उस झूले पर बैठाकर बड़े प्रेम से झूला झुलाया। जिस दिन सोलह श्रंगार से अलंकृत जगजननी माता पार्वती ने झूले पर झूली थीं, वह अविस्मरणीय तिथि श्रावण शुक्ल तृतीया यानी हरियाली तीज की थी।

प्रभु राम ने मणि पर्वत पर झूला था सीता माता के साथ झूला

प्रभु राम की नगरी अयोध्या हरियाली तीज के पावन पर्व पर सावन झूला मेला की रौनक में रंगी नजर आती है। अयोध्यात के इस सावन झूला मेले की प्रसिद्धि देश-विदेश तक है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर अयोध्याम के प्रमुख मंदिरों से भगवान राम व माता जानकी के देवविग्रहों को रथों पर बैठाकर मणिपर्वत पर लाकर झूलों पर झुलाने की परम्परा युगों पुरानी है। मणि पर्वत के इस झूला मेले में हिंडोलों में सुशोभित प्रभु राम व माँ सीता के युगल विग्रह के समक्ष विभिन्न मंदिरों के साधु-संत व गायक कजरी व झूला गीतों पर नृत्य गायन करते हैं। यह झूला मेला शाम से जोर पकड़ता है और इस अवसर देर रात तक सांस्कृितिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता रहता है। इस झूला पर्व का आनंद लेने के लिए प्रति वर्ष बड़ी संख्याो में श्रद्धालुओं की भीड़ रामनगरी में जुटती है।

पर्व परंपरा के अनुसार राम जानकी के इन विग्रहों को 12 दिनों तक (रक्षाबंधन तक) झूला झुलाया जाता है। पौराणिक कथानक के अनुसार त्रेता युग में जब माता सीता विवाह के बाद पहली बार अयोध्याौ आयी थीं तो उन्हों ने हरियाली तीज के सुहाग पर्व पर प्रभु राम से मायके की तरह झूला झूलने की इच्छाी जतायी थी। तब प्रभु श्रीराम ने अयोध्या के मणि पर्वत पर झूला डलवा कर न सिर्फ माँ जानकी की झूला झूलने की इच्छा पूरी की बल्कि स्वयं भी उनके साथ झूले का आनंद लिया। तभी से हरियाली तीज से मणि पर्वत के झूलनोत्सझव का शुभारम्भ माना जाता है। बताते चलें कि अयोध्या के इस मणि पर्वत से जुड़ा कथानक भी कम रुचिकर नहीं है। कहा जाता है कि भगवान राम जब विवाह के उपरांत माता सीता को अयोध्या लेकर आये थे; तब पुत्री की विदाई के समय महाराज जनक ने महाराज दशरथ को उपहार स्वरूप भारी मात्रा में विभिन्न प्रकार के मणि-मुक्तक भेंट किये थे। सम्राट दशरथ ने अयोध्या आकर उन मणि-मुक्तकों को विद्याकुंड के पास रखवा दिया था। कहते हैं कि वे मणियां मात्रा में इतनी ज्यादा थीं कि वहां मणियों का पहाड़ बन गया। उसी प्राचीन धरोहर स्थल को अयोध्यावासी आज मणि पर्वत के नाम से पुकारते हैं।

हरियाली तीज और ब्रज भूमि के झूला उत्सव

प्रकृति के अप्रतिम सौन्दर्य और उर्वरता के पर्याय श्रावणी तीज के लोकपर्व पर समूचा ब्रजमंडल प्रेम के एक अलग ही रंग में नजर आता है। वर्षा की रिमझिम के मध्य समूचा वृन्दावन राधा-कृष्ण में प्रेमभाव में डूब कर झूमने लगता है। इस पावन भूमि में श्रावण शुक्ल की तीज का अर्थ है- बरसते मेघ, झूले व श्रावणी लोकगीतों में भीगता मन मयूर। हरियाली तीज का उत्सव वस्तुतः श्रीकृष्ण और उनकी आह्लादिनी शक्ति की उन प्रेमलीलाओं का सुन्दरतम प्रतीक माना जाता है जो उन्होंने पवित्र ब्रजभूमि के हरे-भरे वन्य प्रान्तों में सुंदर झूलों पर झूलते हुए की थीं। इस ऋतु पर्व पर ब्रज भूमि के विभिन्न मंदिरों में झूला व हिंडोला उत्सवों के साथ रासलीला, कजरी, मल्हार व सत्संग-प्रवचन आदि की धूम छायी रहती है। प्रत्येक मंदिर में हिंडोले लगाकर उनमें प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) को झूला झुलाया जाता है। ब्रज भूमि में भक्ति के 64 अंगों में हिंडोला उत्सव भी एक माना जाता है। ब्रजमंडल में श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी के झूलनोत्सव (हिंडोला) की शुरुआत हरियाली तीज से होती और यह प्रेमोत्सव श्रावणी पूर्णिमा को संपन्न होता है।

इस अवधि में राधा कृष्ण के देव विग्रहों को सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसज्जित कर स्वर्ण व रजत मंडित भव्य कलात्मक हिंडोलों में झुलाया जाता है। जानकारों की मानें तो सोने-चांदी के अलावा लकड़ी, कांच, हाथी दांत व अन्य धातुओं के ऐसे जड़ाऊ व कलात्मक हिंडोले केवल ब्रजमंडल के मंदिरों में ही दिखाई देते हैं। इस दिन वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर से ठाकुरजी को गर्भ गृह से बाहर निकलकर स्वर्ण-रजत के भव्य हिंडोले में झुलाया जाता है। इस अवसर पर बांके बिहारी जी सोने और चांदी से बने एक विशेष हिंडोले (झूले) में विराजमान होकर भक्तों को विशेष दर्शन देते हैं। बांके बिहारी मंदिर में हरियाली तीज के हिंडोला उत्सव का विशेष महत्व है। इस दिन, मंदिर को हरे रंग के फूलों और गुब्बारों से सजाया जाता है और बांके बिहारी को हरे रंग की विशेष पोशाक पहनायी जाती है। इसके साथ ही, घेवर और फेनी का भोग लगाया जाता है। हर साल हजारों भक्त इस उत्सव में शामिल होने के लिए परम धाम वृंदावन पहुंचते हैं। बांके बिहारी मंदिर के अलावा वृंदावन के विभिन्न मंदिरों में यह ऋतु पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इन मंदिरों में राधावल्लभ, रासबिहारी निकुंज विहारी, राधारमण, गोदाविहार, राधा दामोदर, युगलकिशोर, राधा श्यामसुंदर मंदिर और बरसाना का श्रीजी के मंदिर के झूलन महोत्सव प्रमुख हैं। हरियाली तीज पर ये सभी मंदिर हरे रंग के बेलबूटों और रंग-बिरंगे झूलों से बेहद सुन्दरता से सजाए जाते हैं। वृंदावन के मंदिरों में झूलन पूर्णिमा तक विशेष आयोजन होते हैं और देव प्रतिमाओं को गर्भगृह से बाहर लाया जाता है और हिंडोला लीला का गुणगान करने वाले भजनों की भक्ति धुनों पर झूलाया जाता है।

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