पश्चिम बंगाल के मान्यता प्राप्त मदरसा शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका देते हुए आज (सोमवार) करीब 350 मान्यता प्राप्त मदरसों के शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की एक याचिका खारिज कर दी। ये लोग राज्य की ग्रांट-इन-एड स्कीम के तहत वेतन चाहते थे।
कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब नई सरकार ने सत्ता संभालते ही कुछ बड़े बदलाव किए हैं। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली राज्य कैबिनेट ने धार्मिक आधार पर दी जाने वाली मदद को बंद कर दिया है। इससे पहले ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार के समय में ऐसे कई स्कीम चल रहे थे जो खासतौर पर किसी धर्म के आधार पर थे।
नई सरकार के फैसले
बीजेपी सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के मुताबिक राज्य की पुरानी ओबीसी लिस्ट को भी खत्म कर दिया है। अब नई पैनल बनाकर कोटा का फैसला किया जाएगा। कुछ दिन पहले ही सुवेंदु सरकार ने 12 जिलों में अनएडेड मदरसों (जिन्हें सरकारी मदद नहीं मिलती) की जांच का आदेश दिया था। 8 जुलाई को अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग ने यह आदेश जारी किया। जांच 15 जुलाई तक पूरी होनी है और 21 जुलाई तक रिपोर्ट जमा करनी है।
जांच का मकसद
सरकारी अधिकारी के मुताबिक, यह जांच छात्रों की भलाई, शिक्षा योजनाओं के सही अमल, संस्थानों की प्लानिंग और अनएडेड मदरसों के कामकाज की जांच के लिए की जा रही है। मदरसा विभाग के सीनियर अधिकारी और अन्य एजेंसियां जिलेवार जिम्मेदारी संभाल रही हैं। जिन जिलों में स्थित मदरसों की जांच की जा रही है, उनमें कूच बिहार, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, वेस्ट मिदनापुर, ईस्ट मिदनापुर, नदिया, हुगली, हावड़ा, नॉर्थ 24 परगना और साउथ 24 परगना शामिल हैं।
अनएडेड मदरसे क्या हैं?
पश्चिम बंगाल में अनएडेड मदरसे बिना सरकारी आर्थिक मदद के चलते हैं। ये प्राइवेट हो सकते हैं, मान्यता प्राप्त या फिर बिना मान्यता वाले खारिजी मदरसे। खारिजी मदरसे व्यक्तियों, समुदायों या प्राइवेट संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं। अनुमान है कि पूरे राज्य में ऐसे एक हजार से ज्यादा मदरसे हैं, हालांकि कोई आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है।

















