भारतीय संस्कृति का समस्त आध्यात्मिक इतिहास एक ही शाश्वत सत्य का उद्घोष करता है कि श्रद्धा का आधार परमात्मा है, व्यक्ति नहीं; धर्म है, किसी व्यवस्था का बाह्य स्वरूप नहीं; सत्य है, किसी कालविशेष की परिस्थितियां नहीं। व्यक्ति सीमित है, संस्था परिवर्तनशील है, व्यवस्था समय के साथ परिमार्जित होती रहती है; किंतु भगवान, धर्म और सत्य नित्य हैं। यही कारण है कि सनातन धर्म ने कभी किसी मनुष्य या संस्था को अंतिम सत्य नहीं माना; उसने सदैव परमब्रह्म को ही सत्य का आधार स्वीकार किया।
उपनिषद् उद्घोष करते हैं- सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। और श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।’ अर्थात् असत्य का कभी स्थायी अस्तित्व नहीं होता और सत्य का कभी अभाव नहीं होता। इसलिए सनातन संस्कृति में श्रद्धा किसी व्यक्ति के कारण उत्पन्न नहीं होती और न किसी व्यक्ति की त्रुटि से समाप्त होती है। श्रद्धा का केंद्र भगवान हैं, जिनका स्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।
जगत की आधारशिला धर्म
संसार की प्रत्येक व्यवस्था मनुष्यों द्वारा संचालित होती है। जहां मनुष्य है, वहां भूल की संभावना भी है। भारतीय मनीषा ने इसी कारण धर्म और व्यवस्था में स्पष्ट भेद किया है। धर्म शाश्वत है, व्यवस्था उसका व्यवहारिक माध्यम है। यदि माध्यम में कभी दोष उत्पन्न हो जाए, तो उसका शोधन होना चाहिए; किंतु धर्म पर संशय करना भारतीय दृष्टि नहीं है।
महाभारत में कहा गया है- धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा। धर्म सम्पूर्ण जगत् की आधारशिला है। व्यवस्था उस धर्म को समाज में प्रतिष्ठित करने का माध्यम है। यदि किसी चिकित्सक की भूल से चिकित्सा-विज्ञान असत्य नहीं हो जाता, किसी न्यायाधीश की त्रुटि से न्याय का आदर्श समाप्त नहीं हो जाता, उसी प्रकार किसी व्यक्ति अथवा संस्था की दुर्बलता से भगवान की महिमा अथवा धर्म की पवित्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
शाश्वत सम्राट हैं राम
भगवान श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं। महर्षि वाल्मीकि ने कहा— रामो विग्रहवान् धर्मः। श्रीराम का मूल्यांकन किसी व्यवस्था की सीमाओं से नहीं किया जा सकता। वे भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च नैतिक आदर्श हैं। उन्होंने राज्य से अधिक सत्य को, अधिकार से अधिक मर्यादा को और सुख से अधिक लोककल्याण को महत्व दिया। इसीलिए राम केवल अयोध्या के राजा नहीं, भारतीय आत्मा के शाश्वत सम्राट हैं। विश्व के इतिहास में यदि कोई ऐसी संस्कृति है जिसने सहस्राब्दियों तक असंख्य आक्रमणों, विपत्तियों और विघटनकारी प्रयासों के बीच भी अपनी आत्मा को अक्षुण्ण रखा है, तो वह भारत की सनातन संस्कृति है।
इस संस्कृति ने केवल युद्ध नहीं देखे; इसने ग्रंथों के दहन, विश्वविद्यालयों के विनाश, मंदिरों के ध्वंस, संतों के बलिदान और सामाजिक संकटों का भी सामना किया है। किंतु प्रत्येक बार भारत पुनः उठ खड़ा हुआ। सोमनाथ का मंदिर अनेक बार ध्वस्त हुआ, किंतु श्रद्धा नहीं टूटी। काशी विश्वनाथ पर बार-बार आघात हुए, किंतु काशी आज भी शिव की नगरी है। अयोध्या ने दीर्घ संघर्ष देखा, किंतु राम करोड़ों हृदयों से कभी विस्थापित नहीं हुए। यही कारण है कि भारत की संस्कृति को मृत्युंजय संस्कृति कहा गया है। ऋग्वेद का मंत्र आज भी राष्ट्रीय चेतना को प्रेरित करता है- संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
आत्मसमर्पण की साधना
यह केवल सामाजिक एकता का संदेश नहीं, सांस्कृतिक अमरता का घोष है। इतिहास में अनेक साम्राज्य आए और चले गए; किंतु भारत का आध्यात्मिक प्रवाह अविच्छिन्न बना रहा। कुंभ के विराट आयोजन, चारधाम की यात्राएं, ज्योतिर्लिंगों की आराधना, शक्ति-पीठों की उपासना, गंगातट की आरती और गांव-गांव के देवालय यह प्रमाणित करते हैं कि सनातन संस्कृति की शक्ति किसी सत्ता से नहीं, समाज की श्रद्धा से संचालित होती है। भारतीय संस्कृति में दान आर्थिक लेन-देन नहीं, आत्मसमर्पण की साधना है। तैत्तिरीयोपनिषद् का आदेश है-‘श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।’ दान श्रद्धा से दो; बिना श्रद्धा के मत दो। दान का मूल्य उसकी राशि में नहीं, उसके भाव में है। इसी से गीता कहती है-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
वास्तविक धन त्याग
भारतीय समाज ने मंदिरों का निर्माण केवल पत्थरों से नहीं किया; उसने उन्हें अपनी श्रद्धा, श्रम, त्याग और प्रेम से बनाया है। सम्राट विक्रमादित्य ने उज्जयिनी और अनेक तीर्थों का पुनरुत्थान किया। सम्राट हर्षवर्धन ने धर्म, विद्या और दान को राज्य का प्राण बनाया। पुण्यश्लोका महारानी अहिल्याबाई होलकर ने काशी, सोमनाथ, गया, उज्जैन, द्वारका, बदरीनाथ, रामेश्वरम् और अनेक तीर्थों का जीर्णोद्धार कराया। उन्होंने केवल मंदिरों का पुनर्निर्माण नहीं किया; उन्होंने भारतीय आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित किया। छत्रपति शिवाजी महाराज ने धर्म संरक्षण को स्वराज्य का अनिवार्य अंग माना। गुरु गोविन्द सिंह ने धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां दे दीं, राजा शिवि ने अपना शरीर दे दिया, सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने सत्य के लिए सब कुछ त्याग दिया।
इन महापुरुषों ने सिखाया कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक धन स्वर्ण नहीं, त्याग है; भवन नहीं, श्रद्धा है; सम्पत्ति नहीं, धर्म है। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं- श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। श्रद्धा ज्ञान का द्वार है। जिसके भीतर श्रद्धा नहीं, वह न धर्म को समझ सकता है और न संस्कृति को। इसी भाव को गीता पुनः स्पष्ट करती है- ‘श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।’ मनुष्य जैसी श्रद्धा से युक्त होता है, वैसा ही बन जाता है। यह सिद्धांत व्यक्ति पर भी लागू होता है और राष्ट्र पर भी। किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल उसके संसाधनों, आर्थिक वैभव या राजनीतिक शक्ति में नहीं होती; उसका सबसे बड़ा धन उसकी आस्था, आदर्श, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्य होते हैं।
अडिग रहे विश्वास विष्णु पुराण भारतभूमि का गौरवगान करते हुए कहता है-
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
यह केवल भौगोलिक परिभाषा नहीं, उस भूमि का परिचय है जहां धर्म, तप, ज्ञान और लोकमंगल की परम्परा सहस्राब्दियों से प्रवाहित है। आदि शंकराचार्य ने अपने अद्वैत दर्शन में बार-बार स्पष्ट किया कि परम सत्य ब्रह्म है- नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त। संसार की समस्त परिवर्तनशील वस्तुएं अनित्य हैं; किन्तु सत्य का आधार परमात्मा है। इसी दृष्टि से राष्ट्र की स्थायी शक्ति भी उसकी आध्यात्मिक चेतना है, क्षणभंगुर परिस्थितियां नहीं।
मनुस्मृति धर्म के दस लक्षण बताती है-
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
धैर्य, क्षमा, संयम, सत्य, शुद्धता, आत्मनिग्रह, विद्या और अक्रोध- ये धर्म के लक्षण हैं। यदि ये गुण समाज में जीवित हैं, तो राष्ट्र सुरक्षित है। इसलिए किसी क्षणिक विकृति, किसी व्यक्ति की चूक या किसी व्यवस्था की त्रुटि से हमारी आस्था विचलित नहीं होनी चाहिए। जहां सुधार अपेक्षित हो, वहां सुधार अवश्य हो; जहां उत्तरदायित्व निर्धारित करना हो, वहां निष्पक्षता से हो; किंतु भगवान, धर्म और सनातन संस्कृति के प्रति विश्वास अडिग रहना चाहिए।
भारतीय संस्कृति का मार्ग न अंध-आलोचना है और न अंध-समर्थन। जहां दोष हो, वहां सत्य, न्याय और उत्तरदायित्व के साथ सुधार हो; जहां पवित्रता हो, वहां श्रद्धा और समर्पण हो। यही संतुलन सनातन धर्म की विशेषता है।
श्रीराम की मर्यादा, श्रीकृष्ण का गीता-उपदेश, उपनिषदों का सत्य, महाभारत का धर्म, मनुस्मृति का सदाचार और भगवत्पाद आदि शंकराचार्य का अद्वैत सभी एक स्वर से यही कहते हैं कि धर्म शाश्वत है, क्योंकि उसका आधार परमात्मा है; व्यवस्थाएं परिवर्तनशील हैं, क्योंकि उनका संचालन मनुष्य करता है।
अस्त नहीं होगा सनातन का सूर्य
अतः हमें स्मरण रखना चाहिए कि राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी उसके स्वर्ण-भण्डार, उद्योग, प्रौद्योगिकी अथवा राजनीतिक शक्ति नहीं है। राष्ट्र का वास्तविक धन उसकी आस्था, चरित्र, धर्म, संस्कृति और सनातन मूल्य हैं। आस्था वह अदृश्य सूत्र है जो विविध भाषाओं, परंपराओं, प्रांतों और समुदायों को एक राष्ट्रीय परिवार में बांध देता है। यदि यह सूत्र सुरक्षित है, तो भारत सुरक्षित है; यदि यह श्रद्धा जीवित है, तो भारत की आत्मा जीवित है। कभी-कभी समाज में विकृतियां आती हैं। कभी व्यक्ति चूक सकता है। कभी संस्थाएं भी आत्मपरीक्षण की आवश्यकता अनुभव करती हैं। परंतु इन सबके बीच यदि कोई तत्व अक्षुण्ण रहना चाहिए, तो वह है- भगवान के प्रति विश्वास, धर्म के प्रति निष्ठा और संस्कृति के प्रति समर्पण। भगवान श्रीराम किसी काल, संस्था अथवा व्यवस्था के आश्रित नहीं हैं। वे सनातन भारत की आत्मा हैं। वे मर्यादा हैं, सत्य हैं, त्याग हैं, करुणा हैं और लोकमंगल के शाश्वत आदर्श हैं। यही भारत की शक्ति है। यही राम की प्रेरणा है। यही सनातन संस्कृति का अमर संदेश है-
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
आघात आते रहेंगे, युग बदलते रहेंगे, परिस्थितियां परिवर्तित होती रहेंगी; किंतु सनातन धर्म का सूर्य कभी अस्त नहीं होगा, क्योंकि उसका आधार किसी मनुष्य की सामर्थ्य नहीं, स्वयं परमात्मा की शाश्वत सत्ता है। आस्था ही राष्ट्र का अमूल्य धन है; यही उसकी आत्मा है, यही उसकी शक्ति है, और यही उसकी अमरता का आधार है।
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