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राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि: ISI एजेंट को छिपाने के आरोपी मोहम्मद अशफाक की जमानत खारिज, सेना से जुड़ी गोपनीय सूचनाएं दी

अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को राष्ट्र की सुरक्षा से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

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एजेंसी

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पाकिस्तानी आईएसआई एजेंट को छिपाने तथा भारतीय सेना और वायुसेना से जुड़ी गोपनीय सूचनाएं उपलब्ध कराने के आरोपित मेरठ के मोहम्मद अशफाक अंसारी उर्फ अशफाक अंसारी की दूसरी जमानत अर्जी खारिज कर दी है। अदालत ने माना कि आरोपित 27 नवंबर 2015 से जेल में बंद है और मुकदमे की सुनवाई अब तक शुरू नहीं हो सकी है। इसलिए ट्रायल कोर्ट को छह माह के भीतर मुकदमे का निस्तारण करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का निर्देश दिया गया है।

न्यायमूर्ति अशुतोष श्रीवास्तव ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437(6) के तहत 60 दिनों में विचारण पूरा न होने पर जमानत का प्रावधान आरोपित को पूर्ण एवं अविच्छेद्य अधिकार नहीं देता। मजिस्ट्रेट उचित कारण दर्ज कर जमानत से इनकार कर सकता है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को राष्ट्र की सुरक्षा से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम परितोष कुमार मालवीय ने ज़मानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि आरोपित ने पाकिस्तानी नागरिक एवं कथित आईएसआई एजेंट मोहम्मद एजाज उर्फ मोहम्मद कलाम को करीब 20 माह तक अपने घर में शरण दी। इस दौरान उसे हिंदी, फोटोग्राफी और वीडियो मिक्सिंग का प्रशिक्षण दिलाया तथा भारतीय सेना एवं वायुसेना से संबंधित संवेदनशील सूचनाएं ई-मेल के माध्यम से पाकिस्तान और बांग्लादेश भेजने में सहयोग किया।

कोर्ट ने दलीलें की खारिज

बचाव पक्ष ने लंबी न्यायिक हिरासत, आरोपपत्र दाखिल होने, आरोप तय होने तथा अब तक एक भी गवाह का परीक्षण न होने का हवाला देते हुए जमानत की मांग की थी। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया, लेकिन ट्रायल कोर्ट को छोटी-छोटी तिथियां तय कर गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करते हुए छह माह के भीतर मुकदमे का निष्पादन करने का निर्देश दिया है।

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